जयपाल की कविता विस्थापित… और हम शरणार्थी हैं

जयपाल की कविता विस्थापित… और हम शरणार्थी हैं

विस्थापित …

 

उन्हें भाग जाने के लिए कहा जाता है
कपड़े उतार लिए जाते हैं

वे मुट्ठी में जान लेकर भागते हैं
मुट्ठी कुचल दी जाती है

वे कसूर पूछते हैं
जवाब गोली से मिलता है

वे रोने को होते हैं
सरकार हंसने लगती है

हम शरणार्थी हैं !

हम अपने दुःखों को
एक पोटली में छिपा कर रखते हैं
पोटली हमेशा हमारे साथ रहती है
बहुत मुश्किल है इसे संभाल पाना

कभी फुर्सत के पलों में
जब कोई आस-पास न हो
उसे खोल लेते हैं
देख लेते हैं
घर के किसी कोने में बैठकर

हम उजड़े/बिछुड़े /बिखरे
शरण में आए हुए
समेट रहे हैं खुद को बार-बार
उजड़ी खेती सम्भाल रहे हैं

Comments

Your email address will not be published.

0