चुनी हुई स्मृतियों और विचारों को ही ज्ञान परंपरा बनाकर पेश किया जा रहा

विचार

चुनी हुई स्मृतियों और विचारों को ही ज्ञान परंपरा बनाकर पेश किया जा रहा

शंभुनाथ

इंदौर के रवींद्र नाट्य गृह में ’वाणी साहित्य उत्सव’ चल रहा है। आमतौर पर मैं लिटरेरी फेस्टिवल में नहीं जाता, हालांकि जाने वालों के प्रति कोई शिकायत भी नहीं करता। मैं जीवन में पहली बार एक साहित्य उत्सव में आया हूं क्योंकि यह एक पुस्तक –केंद्रित साहित्य उत्सव है जहां केंद्र में पढ़ने की संस्कृति है। और मैं केवल ऐसे ही साहित्य उत्सव में जाऊंगा जो पूरी तरह साहित्य केंद्रित होगा!

यहां कविता पाठ है, पुस्तकों पर चर्चा है, बच्चों का रोचक मौज घर है और वाणी का पुस्तक स्टाल तो है ही! प्रिंट कल्चर पर जो गहरा संकट है, ऐसे साहित्य उत्सव में किसी अखबार वाले को भी पार्टनर बनाया जा सकता है!

भारतीय ज्ञान परंपरा पर चर्चा हो रही थी। मैंने कुछ बातें कहीं :

1) भारतीय ज्ञान परंपरा पर चर्चा तब हो रही है जब भारत सहित विश्व भर में अज्ञानता का भारी विस्फोट हुआ है, चुनी हुई स्मृतियों और विचारों को ही ज्ञान परंपरा बनाकर पेश किया जा रहा है। विश्वविद्यालय और डिजिटल विश्व में ज्ञान की जैसी सुनामी है उसमें सृजनात्मक पुनर्निर्माण की जगह हर तरफ एक सांस्कृतिक उजाड़ है। हमारे हजारों साल के भारतीय कलाओं, साहित्य और चिन्तन का बहुत कुछ उजड़ रहा है जो किसी भी संवेदनशील मन को व्यथित कर सकता है!

कहा जाए तो हिंदी के आधुनिक साहित्य की सारी परंपराएं ही उजड़ रही हैं। आचार्य शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा ने औपनिवेशिक हैंगओवर और अतीतांधता से अपनी सीमाओं में जो संघर्ष किया, उसे आज कोई ध्यान में नहीं रखता है!

2) भारतीय ज्ञान परंपरा बहुवचनात्मक, गतिशील और विविधतापरक है। इसमें सनातन है तो बुद्ध का अनित्य भी है, अर्थात परिवर्तन भी! वाल्मीकि, वेदव्यास, कालिदास, अश्वघोष, भवभूति – इनमें से कोई परंपरावादी नहीं है। प्राचीन ऋषियों– कवियों में कोई उतना रूढ़िवादी न था, जितना आज के अधिकांश शिक्षित लोग हैं।

3) भारतीय ज्ञान परंपरा केवल विरासत नहीं है, वह इसके साथ प्रश्न करने की परंपरा, एक खोज, एक नवोन्मेष भी है! रामायण में सीता पृथ्वी में समाकर आत्महत्या करती है, जबकि भवभूति के ’उत्तररामचरित’ में सीता पृथ्वी से वापस लौटती है और सीता तथा राम का पुनर्मिलन होता है! इसे कल्पना का अधिकार कहते हैं जो रचनात्मक है, विध्वंसात्मक नहीं।

4) भारतीय ज्ञान परंपरा पर जब चर्चा की जाती है, वह 1200 सालों के लोकभाषाओं में आए भक्ति भक्ति आंदोलन को, 19वीं–20वीं सदी के तमाम राष्ट्रीय भाषाओं में आए आधुनिक साहित्य को और दक्षिण भारत के द्रविड़ साहित्य को छोड़ दिया जाता है जो अन्यायपूर्ण है!

भारतीय ज्ञान परंपराएं एक नहीं, दो नहीं, अनगिनत हैं! वे सनातन और परिवर्तन के बहुआयामी द्वंद्वात्मक संबंध की देन हैं, केवल सनातन की देन नहीं! और ऐसी ही कुछ अन्य बातें!

शंभुनाथ के फेसबुक वॉल से साभार

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