जसवीर त्यागी की परीक्षा और अन्य कविताएं
परीक्षा
÷÷÷÷
परीक्षा भवन में बैठे विद्यार्थी
ताक-झाँक की जुगत में है
कहीं से भी, कैसे भी
संकट का हल निकल जाये
विद्यार्थी नहीं जानते
जीवन में एक से बढ़कर एक
जटिल परीक्षाएँ होंगी
जिनका समाधान
किसी उत्तर-पुस्तिका में न होगा
और वे चाहकर भी
परीक्षा-केंद्र से बाहर नहीं जा सकेंगे।
●
बीज
÷÷÷
उन्होंने कहा-
हम तुम्हें मिट्टी में मिला देंगे
शायद वे भूल गये
मैं एक बीज था।
■
गुम हुई चीजों की स्मृति
÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷
जीवन में
समय-समय पर
बहुत कुछ गुम होता है
गुम हुई चीजों की स्मृति
ध्यान के द्वार पर खड़ी हो
संवेदनाओं की साँकल खटखटाती है
गुम हुई चीजें
दोबारा मिलती नहीं
कभी-कभी मिल भी जाती हैं
लेकिन!उस रूप में नहीं
जिस रूप में गुम हुई थीं
उनका आकार-प्रकार
भाव-स्वभाव बदल चुका होता है
हमारा अंतर्मन
बदले रूप को स्वीकार नहीं कर पाता
हम गुम हुई चीजों की स्मृति में जीते हैं।
■
आप भी मेरे जैसे हैं
÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷
उसने कहा-
आप भी मेरे जैसे हैं
वह स्त्री
और मैं पुरुष
अगर किसी पुरुष को
स्त्री अपने जैसा कहे
यह पुरुष कि नहीं
स्त्री की महानता है।
■
उदासी
÷÷÷÷
कई बार उदासी
सामने आकर खड़ी हो जाती है
मैं आँख चुराता हुआ
उसे अनदेखा करता हूँ
वह कोई नयी तरकीब लड़ाती है
कभी मेरे पीछे
तो कभी बगल आकर खड़ी हो जाती है
मैं खुद को संभाले रहता हूँ
वह किसी जिद्दी शरारती बालक की तरह
हार नहीं मानती
मुझे अपनी ओर खींचती है
उदासी निराश नहीं होती
लगातार प्रयास करती है
मैं उदासी से बचना चाहता हूँ
वह मुझे अपनी ओर बुलाती है
मैं उपेक्षा करता हूँ
वह लगातार मेरी ओर देखती है।
■
समय का रथ
÷÷÷÷÷÷÷÷
संसार में
बहुत कुछ सूक्ष्म स्पर्श से पनपता है
कहीं कुछ अचानक नहीं घटता
बहुत कुछ के परिणाम का फल होता है
इंसान के भीतर बहुत कुछ जन्म लेता है
फिर आहिस्ता-आहिस्ता
उपेक्षा के पहियों तले रौंदा जाता है
रोजमर्रा की आपाधापी में
हम अंकुरित होते नये को निहार नहीं पाते
जैसे ख्याल नहीं आता
अपने घर का बच्चा
रोज थोड़ा-थोड़ा बड़ा हो रहा है
और अपनी एक अलग दुनिया बना रहा है
गमले में लगे पौधों के
कुछ पत्ते पीले पड़कर झर गए हैं
हम समझ नहीं पाते
छत पर आने वाली चिड़ियों में
कुछ ने आना छोड़ दिया है
हमें ज्ञात नहीं होता
गली में रेहड़ी-फेरी वाले आदमी की पत्नी
दो बच्चों को छोड़कर स्वर्ग सिधार गयी है
अखबार डालने वाला लड़का,डिलीवरी ब्वॉय
और साफ-सफाई करने वाला कर्मचारी
हमारे ध्यान की दहलीज़ से बाहर होते हैं
हमारे अपने रिश्ते भी
धीरे-धीरे दूर होते जाते हैं
हम गौर नहीं करते
कितने दिनों से हम साथ नहीं बैठे
कब से हमने एक-दूसरे से मन की बात नहीं की है?
कोई अच्छी बात आखिरी बार कब साझा की थी हमने?
इन सबका कोई लेखा-जोखा हमारे पास नहीं होता
हमारे वे सपने कहाँ हैं?
जो हमारी दो से अधिक आँखों ने देखे थे
धीरे-धीरे,हम दुनियादार और आत्मकेंद्रित होते जाते हैं
हमें सत्य का जब पता चलता है
तब तक देर हो चुकी होती है
समय का रथ बहुत आगे जा चुका होता है
हमारे कांपते हाथों में
पछतावे की पुस्तक बचती है
हम उसमें प्रेम शब्द पढ़ना चाहते हैं
लेकिन!दूर-दूर तक प्रेम नहीं दिखता।
■
