कुलभूषण उपमन्यु की कविता – मन

कविता

मन

कुलभूषण उपमन्यु

उसी ने समझा, उसी ने जाना;
                  जिसने उसका,   कहना माना.
  चाहे जितनी,  रात घनी हो;
 फिर से सूरज, का उग आना.
                   पतझड़ झड़े, जो पत्ते सारे;
                   बासंती बन, कर  लौटाना.
 कोमल-कोमल, हरीतिमा में;
 सकल उदासी, का खो जाना.
                   छिटपुट बातों में, बह कर भी;
                   गहराई में,       गोते खाना.
 माँ के कोमल, हाथों सौंपा;
 और पिता की, ऊँगली पाना.
                    बहती जाती, नदियों का फिर;
                    बादली बन,  कर लौट आना.
 पक्के तेरे,    इंतजाम हैं;
 बिरथा मन, तेरा घबराना.
कुलभूषण उपमन्यु, कामला (चंबा, हिमाचल प्रदेश)

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