लूला ने ब्राजील में वही किया जो भारत ने खोया
Lula did in Brazil what India has lost.
ब्राजील की आबादी 25 करोड़ है. ये देश अपनी जीडीपी का 5 फीसदी शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च कर रहा है. कह सकते हैं कि लूला ने वेलफेयर में जो काम किया उसने ब्राजील को अगर अंदरूनी तौर पर बदला तो आर्थिक ताकत भी बना दिया
ब्राजील राष्ट्रपति चुनाव लूला संजय श्रीवास्तव
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संजय श्रीवास्तव
ब्राजील में 80 साल के लूला दा सिल्वा चौथी बार चुनावों में जीत गए हैं. भारत में रहने वालों के लिए लूला की जीत के पीछे की वजहों को जानना इसलिए जरूरी है कि क्योंकि भारत ने पिछले 30 सालों में जो खोया या गंवाया है, उसे लूला ने अपने 19 सालों के अब तक टर्म में बनाया या संवारा है. मेरे मित्र पारिवारिक परिजन और पत्रकार शोभन सक्सेना कई सालों से ब्राजील में रह रहे हैं. वह ब्राजील में सक्रिय रहते हैं. वहां मीडिया में लिखते और बोलते रहते हैं. भारत में भी हिंदू समेत कई अखबारों के साथ जुड़े हुए हैं.
उनसे आज सुबह बात हुई तो लगा कि भारत ने तीस सालों में जो गंवाया उसे वाकई लूला ने शिद्दत से संवारा, संभाला और बनाया. पहली बार वह 2003 में वर्कर्स पार्टी की ओर से चुनाव जीतकर प्रेसीडेंट बने. उसके बाद उन्होंने देश में शिक्षा का मजबूत संजाल फैलाने का काम किया. देशभर में पहली बार कितनी ही सेंट्रल यूनिवर्सिटी बना दीं. जहां मास्टर्स तक क्वालिटी एजुकेशन फ्री है. यूनिवर्सिटी बहुत अच्छी तरह चलाई जाती हैं. स्कूल ज्यादा बने और बेहतर भी. वहां इनमें पढ़ाई फ्री है, साथ में यहां बच्चों का खाना भी.
हेल्थ पर बहुत खर्च किया. आमतौर पर सरकारी अस्पतालों की संरचना और संजाल कहीं ज्यादा बेहतर और मजबूत हुआ. हेल्थकेयर फ्री है. ब्राजील की आबादी 25 करोड़ है. ये देश अपनी जीडीपी का 5 फीसदी शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च कर रहा है. कह सकते हैं कि लूला ने वेलफेयर में जो काम किया उसने ब्राजील को अगर अंदरूनी तौर पर बदला तो आर्थिक ताकत भी बना दिया.
आर्थिक उदारीकरण के दौर से पहले भारत में ये सब बखूबी हो रहा था लेकिन 90 के दशक के मध्य के बाद वो पटरी से उतरने लगा. पता नहीं कितने लोगों को याद वो जमाना सरकारी स्कूलों और सरकारी अस्पताओं का था, जो आमतौर पर फ्री या बहुत सस्ते थे. तब लोगों के जेहन में प्राइवेट स्कूल या प्राइवेट हास्पिटल नहीं आते थे, वो सरकारी अस्पताओं और स्कूलों पर ज्यादा भरोसा करते थे.
तो अब सवाल ये है कि भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा की सेवाएं कमज़ोर क्यों हुईं, जबकि प्राइवेट सेक्टर महंगा होता गया. इसका जवाब केवल “निजीकरण” नहीं है – इसमें कम सरकारी ख़र्च, राज्यों की बजट सीमाएं, नौकरियों इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और मध्यम वर्ग की प्राइवेट सेवाओं की ओर बढ़ती निर्भरता सभी कुछ है. मैं बेहिचक कह सकता हूं कि 90 के दशक से बाद से सरकारी अस्पतालों और स्कूलों ही नहीं बल्कि सारे ही सरकारी उपक्रमों को खोखला और बर्बाद करने का काम शुरू कर दिया गया.
भारत में बेशक सरकारी स्वास्थ्य ख़र्च बढ़ा है लेकिन अब भी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के 2.5% GDP लक्ष्य से काफ़ी नीचे है. सरकारी ख़र्च 2014-15 में GDP का 1.13% था, जो 2021-22 में 1.84% हुआ; फिर भी यह लक्ष्य से कम है. इसका सीधा असर यह है कि लोगों को इलाज के लिए अपनी जेब से पैसा देना पड़ता है. 2021-22 में कुल स्वास्थ्य ख़र्च का 39.4% घरों की जेब से आया. 2022-23 के आकलन में यह अनुपात लगभग 43.4% बताया गया है.
सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर, नर्स, दवाइयां, बिस्तर और डायग्नोस्टिक सुविधाएं अमूमन लचर या नाकाफी हो चुकी हैं. इसलिए मरीज़ प्राइवेट क्लिनिक, लैब और अस्पतालों की ओर जाते हैं. प्राइवेट अस्पताल बाज़ार में काम करते हैं: वे बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, तकनीक और सुविधा देते हैं, पर इसकी लागत मरीज़ से कई गुना ज्यादा वसूलते हैं, लोगों की जमापूंजी और घर तक बिक जाते हैं.
आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं में भी बड़ा हिस्सा प्राइवेट अस्पतालों को भुगतान के रूप में जाता है, जबकि सरकारी अस्पतालों की क्षमता बढ़ाने पर उतना ज़ोर नहीं रहता.
मैं मानता हूं कि सरकारी ख़र्च बढ़ा होगा लेकिन वो इतना कम और असमान रहा कि ज़रूरतमंद लोगों के लिए मुफ़्त, गुणवत्तापूर्ण और आसान उपलब्ध इलाज की जगह प्राइवेट बाज़ार विस्तारित हो गया. हमें ये सोचना चाहिए कैसे फ्री हेल्थ और फ्री शिक्षा कॉलेज तक 80 के दशक तक आमतौर पर सुलभ थी, जो अब दुर्लभ हो चुकी है.
शिक्षा में क्या हुआ
शिक्षा में भी वही मूल समस्या है – सार्वजनिक ख़र्च राष्ट्रीय शिक्षा नीति के 6% GDP लक्ष्य से बहुत पीछे है. केंद्र और राज्य मिलकर लगभग 4.1% GDP शिक्षा पर ख़र्च कर रहे हैं, जबकि NEP 2020 ने 6% की सिफ़ारिश की है.नतीजा यह है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, बुनियादी सुविधाओं की कमी और गुणवत्ता में अंतर दिखता है. हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी ने देश के कई राज्यों में प्राथमिक स्कूलों की जर्जर हालत को जिस तरह उजागर किया, उसे क्या कहेंगे. जिनके पास थोड़ी भी क्षमता हो, वे प्राइवेट स्कूलों की ओर जाते हैं और प्राइवेट शिक्षा की लागत लगातार बढ़ी है. 2025 के सर्वे के अनुसार प्राइवेट स्कूल में पढ़ाई की लागत सरकारी स्कूल से लगभग 10 गुना ज़्यादा है.
2019-20 में सार्वजनिक शिक्षा ख़र्च GDP का लगभग 4% था, जबकि घरों से होने वाला निजी ख़र्च 2.8% था; यानी परिवार शिक्षा का बड़ा हिस्सा ख़ुद चुका रहे हैं. पिछले तीन दशकों में निजी शिक्षा-ख़र्च सार्वजनिक ख़र्च से तेज़ी से बढ़ा है, जो शिक्षा के निजीकरण का संकेत है.
होना तो ये चाहिए कि स्वास्थ्य पर सार्वजनिक ख़र्च को कम से कम 2.5% GDP तक ले जाएं, उसका बड़ा हिस्सा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, ज़िला अस्पतालों, दवाइयों तथा मानव संसाधन पर ख़र्च करें. शिक्षा में 6% GDP का लक्ष्य को पूरा किया जाए. खासतौर पर सरकारी स्कूलों में स्थायी शिक्षक भर्ती, डिजिटल लैब सुविधाएं और मिड-डे मील को बेहतर किया जाए.
ब्राजील में मिडिल क्लास को लगातार मजबूत किया जा रहा है. भारत में मिडिल क्लास आमतौर पर अपनी जेब से कितना और कहां कहां लूटा रहा है – कहने की बात नहीं है.
