दिल्ली में प्रदर्शन से इतना डर क्यों? सरकार झुकेगी या आंदोलन और तेज होगा?

दिल्ली में प्रदर्शन से इतना डर क्यों? सरकार झुकेगी या आंदोलन और तेज होगा?

ओमप्रकाश तिवारी

जंतर-मंतर पर विरोध रोकने की कोशिश, नेताओं की हिरासत और सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बीच बड़ा सवाल—क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन से सरकार को इतना खतरा महसूस हो रहा है?

2 अक्टूबर को गांधी जयंती थी। महात्मा गांधी ने सत्याग्रह के जरिए ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती दी थी। विडंबना देखिए कि आजाद भारत की राजधानी दिल्ली में गांधी जयंती से शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र, मताधिकार और सरकार के रवैये पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करना है। मांग है मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा। आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR में गड़बड़ियां हुई हैं और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। इन आरोपों की जांच होनी चाहिए। अगर आरोप गलत हैं तो तथ्य सामने रखकर उन्हें खारिज किया जाना चाहिए। अगर कहीं गड़बड़ी हुई है तो उसे सुधारा जाना चाहिए।

लेकिन सरकार और प्रशासन ने इस सवाल का जवाब किस तरह दिया?

प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई। पुलिस ने बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया। दिल्ली की सड़कों पर बैरिकेड लगाए गए। मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश-द्वार बंद करने और रेलवे सेवाओं पर प्रतिबंध लगाने तक की नौबत आ गई। 10 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके और उनके दो सहयोगियों को विमान के दिल्ली पहुंचने के बाद हिरासत में ले लिया गया।

क्या सरकार के पास यही रास्ता बचा था?

प्रदर्शनकारी अपराधी हैं या नागरिक?

लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना अपराध नहीं है। चुनाव आयोग के फैसलों पर सवाल उठाना अपराध नहीं है। किसी संवैधानिक पदाधिकारी के इस्तीफे की मांग करना भी अपने आप में अपराध नहीं है।

हां, प्रदर्शन के दौरान हिंसा हो, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाए या कानून का उल्लंघन किया जाए तो प्रशासन कार्रवाई कर सकता है। लेकिन शांतिपूर्ण प्रदर्शन की आशंका मात्र से पूरे शहर की आवाजाही बाधित करना और लोगों को प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से रोकना अलग बात है।

दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं देने के पीछे सुरक्षा और प्रक्रियागत कारण बताए। पुलिस का कहना था कि प्रदर्शन के लिए आवेदन निर्धारित समय-सीमा के अनुरूप नहीं था। लेकिन सवाल यह है कि क्या अनुमति नहीं मिलने का अर्थ यह हो जाता है कि प्रदर्शन में शामिल होने की कोशिश करने वाले हर व्यक्ति को हिरासत में ले लिया जाए?

अगर किसी प्रदर्शन के लिए अनुमति नहीं दी गई है तो प्रशासन को कानून के अनुरूप वैकल्पिक व्यवस्था, संवाद और सुरक्षा के उपाय तलाशने चाहिए। प्रतिबंधों का इस्तेमाल अंतिम उपाय के रूप में होना चाहिए, न कि असहमति को पूरी तरह रोकने के औजार के रूप में।

विमान में नेताओं की हिरासत और ध्रुव राठी का मामला

10 अक्टूबर को CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके और पार्टी के दो अन्य नेताओं को विमान के दिल्ली पहुंचने के बाद हिरासत में लिया गया। इस कार्रवाई ने एक असहज सवाल खड़ा किया—क्या किसी नागरिक को उसके गंतव्य पर पहुंचने से पहले ही इसलिए रोकना उचित है कि वह सरकार के खिलाफ प्रदर्शन में शामिल होने वाला है?

हर हिरासत को केवल उसके स्थान के आधार पर अवैध नहीं कहा जा सकता। पुलिस को कानून के तहत निवारक कार्रवाई करने का अधिकार है। लेकिन उसके लिए कानूनी आधार, आवश्यक प्रक्रिया और कार्रवाई की आनुपातिकता जरूरी है। विमान में हिरासत लिए जाने की परिस्थितियों और उसके कानूनी आधार की सार्वजनिक जांच होनी चाहिए।

इसी दिन मशहूर यूट्यूबर ध्रुव राठी को गुरुग्राम स्थित उनके घर से हिरासत में लिया गया। राठी ने 11 अक्टूबर को रिहा होने के बाद वीडियो जारी कर आरोप लगाया कि सादे कपड़ों में आए लोगों ने उन्हें उनके घर से जबरन उठाया, वकील से संपर्क नहीं करने दिया और लगभग 20 से 23 घंटे तक हिरासत में रखा। उन्होंने इसे गिरफ्तारी नहीं, बल्कि अपहरण बताया।

पुलिस की ओर से कहा गया कि उन्हें प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने से रोकने के लिए निवारक हिरासत में लिया गया था। इन दोनों पक्षों के दावों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। राठी के आरोप गंभीर हैं, लेकिन उनका अंतिम निष्कर्ष जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निकाला जा सकता है।

सवाल यह भी है कि अगर पुलिस को राठी के प्रदर्शन में शामिल होने की सूचना थी तो क्या उन्हें कानून की प्रक्रिया के तहत नोटिस देकर या किसी कम कठोर उपाय से रोका नहीं जा सकता था?

किसी व्यक्ति को सुबह उसके घर से उठाकर ले जाना, उसके परिवार को चिंता में डालना और उसे लंबे समय तक अपने संपर्कों से दूर रखना सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई नहीं माना जा सकता। यदि ऐसा करना कानूनन आवश्यक था तो उसका आधार स्पष्ट होना चाहिए।

वर्दी के बाहर कौन था?

इस पूरे घटनाक्रम में कुछ प्रदर्शनकारियों और महिला पत्रकारों की ओर से पुलिसकर्मियों के दुर्व्यवहार तथा सादे कपड़ों में मौजूद लोगों की भूमिका को लेकर भी आरोप लगाए गए हैं। कुछ वीडियो और बयानों में हिरासत के दौरान धक्का-मुक्की और मारपीट के आरोप सामने आए हैं।

इन आरोपों को बिना जांच के अंतिम सत्य नहीं कहा जा सकता। लेकिन उन्हें नजरअंदाज भी नहीं किया जाना चाहिए।

अगर पुलिस की वर्दी में मौजूद कर्मियों के साथ सादे कपड़ों में दूसरे लोग प्रदर्शनकारियों को पकड़ने या उन्हें हटाने में शामिल थे, तो उनकी पहचान और अधिकार स्पष्ट होने चाहिए। क्या वे पुलिसकर्मी थे? क्या वे किसी अधिकृत सुरक्षा दल के सदस्य थे? अगर वे निजी व्यक्ति थे तो उन्हें ऐसी कार्रवाई करने का अधिकार किसने दिया?

कानून लागू करने वाली एजेंसी की जवाबदेही और स्पष्ट पहचान लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। यदि किसी व्यक्ति को हिरासत में लिया जा रहा है तो उसे यह पता होना चाहिए कि उसे कौन ले जा रहा है, किस आधार पर ले जा रहा है और उसे कहां ले जाया जा रहा है।

भीड़ के बीच हिंसा या दुर्व्यवहार की शिकायतों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठने पर पुलिस को ही अपने आचरण का अंतिम निर्णायक बना देना पर्याप्त नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी सरकार के लिए संदेश है

इस घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप है।

9 अक्टूबर को मेट्रो और रेलवे सेवाओं पर व्यापक प्रतिबंधों से जुड़े मामले में अदालत ने कहा कि आवश्यक सार्वजनिक परिवहन पर पूरी तरह रोक लगाना जरूरत से ज्यादा व्यापक कदम हो सकता है। अदालत के सामने यह आश्वासन दिया गया कि सेवाओं को नियंत्रित तरीके से चलाने पर विचार किया जाएगा।

11 अक्टूबर को अदालत ने शांतिपूर्ण ढंग से जुटने वाले लोगों की अवैध हिरासत रोकने, मेट्रो और रेल सेवाओं के सामान्य संचालन तथा इंटरनेट सेवाओं को निर्बाध रखने के निर्देश दिए, हालांकि कानून-व्यवस्था की वास्तविक जरूरतों के लिए सीमित प्रतिबंधों की गुंजाइश रखी। प्रतिबंधों और आदेश के अनुपालन को लेकर अधिकारियों से जवाब भी मांगा गया।

इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने हर पुलिस कार्रवाई को अवैध घोषित कर दिया है। लेकिन अदालत का हस्तक्षेप इस बात को रेखांकित करता है कि सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर नागरिकों की आवाजाही और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को अनावश्यक रूप से बाधित नहीं किया जा सकता।

सरकार को यह समझना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल उठने के बाद मामला केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहता। अब अधिकारियों को अपने फैसलों का कानूनी आधार भी स्पष्ट करना होगा।

आखिर सरकार को प्रदर्शन से परेशानी क्या है?

यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है।

मान लीजिए कि हजारों लोग जंतर-मंतर पर शांतिपूर्वक बैठ जाते हैं। वे ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हैं। भाषण देते हैं, पोस्टर दिखाते हैं और सरकार के खिलाफ नारे लगाते हैं। इससे सरकार की आलोचना होगी, उसकी राजनीतिक मुश्किलें बढ़ सकती हैं और मीडिया में इस मुद्दे को अधिक जगह मिल सकती है।

लेकिन क्या यही लोकतंत्र की प्रक्रिया नहीं है?

सरकार को किसी प्रदर्शनकारी की मांग मानना जरूरी नहीं है। सरकार यह कह सकती है कि उसे मुख्य चुनाव आयुक्त पर भरोसा है। वह SIR की प्रक्रिया का बचाव कर सकती है। वह प्रदर्शनकारियों के आरोपों का दस्तावेजों और आंकड़ों के साथ जवाब दे सकती है।

परंतु यदि प्रदर्शन को शुरू ही नहीं होने दिया जाएगा तो सवाल और गंभीर हो जाएंगे। लोग पूछेंगे कि आखिर किस बात से बचने की कोशिश की जा रही है।

यह जरूरी नहीं कि सरकार वास्तव में किसी धरने से डर रही हो। उसकी मंशा का निष्कर्ष केवल प्रतिबंधों से नहीं निकाला जा सकता। सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी वास्तविक हो सकती हैं। लेकिन प्रशासन के फैसलों का प्रभाव यह जरूर है कि विरोध करने वालों को एकत्र होने और अपनी बात सार्वजनिक रूप से रखने में बाधा पहुंचती है।

और जब यही स्थिति बार-बार पैदा होती है तो सरकार को अपनी कार्रवाई का अधिक ठोस औचित्य देना पड़ता है।

क्या सरकार को डर है कि धरना लंबा चलेगा?

इस संभावना पर विचार किया जा सकता है, लेकिन इसे स्थापित तथ्य नहीं कहा जा सकता।

यदि प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर पर लगातार बैठ जाते हैं, तो मुद्दा हर दिन समाचारों में बना रह सकता है। नए लोग समर्थन में आ सकते हैं। छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता, राजनीतिक दल और दूसरे संगठन आंदोलन से जुड़ सकते हैं। इससे सरकार और निर्वाचन आयोग पर जवाब देने का दबाव बढ़ सकता है।

दूसरी तरफ, किसी प्रदर्शन का लंबे समय तक चलना अपने आप में सरकार की हार नहीं होता। धरने का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी मांग कितनी स्पष्ट है, उसे कितना जनसमर्थन मिलता है, उसके पास कितने विश्वसनीय तथ्य हैं और वह कितनी अनुशासित तथा शांतिपूर्ण रणनीति अपनाता है।

फिर भी प्रशासन को यह समझना चाहिए कि किसी आंदोलन को आरंभ होने से रोकना और उसके प्रभाव को कम करना एक ही बात नहीं है। कभी-कभी कठोर कार्रवाई आंदोलन को और अधिक सार्वजनिक चर्चा में ला देती है।

सरकार झुकेगी या विपक्ष?

इसका निश्चित जवाब अभी नहीं दिया जा सकता। लेकिन आगे के घटनाक्रम की तीन संभावित दिशाएं दिखाई देती हैं।

पहली संभावना: सरकार बातचीत का रास्ता चुने।

सरकार प्रदर्शनकारियों को निर्धारित स्थान पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने दे, हिरासत और दुर्व्यवहार की शिकायतों की जांच कराए और SIR तथा फॉर्म-6 से जुड़े सवालों पर निर्वाचन आयोग से विस्तृत जानकारी सार्वजनिक कराए। इससे सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर मिलेगा। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा स्वीकार कर लेगी।

दूसरी संभावना: आंदोलन और व्यापक हो।

यदि प्रदर्शनकारियों को बार-बार रोका जाता है और हिरासत या दुर्व्यवहार की शिकायतें बढ़ती हैं, तो आंदोलन का केंद्र केवल SIR नहीं रह जाएगा। मुद्दा शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार, पुलिस की जवाबदेही और सरकार के रवैये तक फैल सकता है। दूसरे शहरों में प्रदर्शन और नए संगठनों की भागीदारी इस संभावना को बल दे सकती है।

तीसरी संभावना: गतिरोध लंबा खिंचे।

सरकार इस्तीफे की मांग मानने से इनकार करे और विपक्ष तथा प्रदर्शनकारी पीछे हटने को तैयार न हों। ऐसे में अदालती कार्यवाही, सार्वजनिक बहस और नए प्रदर्शनों के बीच मामला लंबा चल सकता है। इसका परिणाम आंदोलन के जनसमर्थन, ठोस प्रमाणों और सरकार की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा।

इनमें से कौन-सी दिशा सामने आएगी, यह अभी तय नहीं है।

क्या ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा ही समाधान है?

प्रदर्शनकारियों की मांग स्पष्ट है—मुख्य चुनाव आयुक्त इस्तीफा दें। लेकिन व्यापक सवाल केवल किसी एक व्यक्ति के पद पर बने रहने या हटने का नहीं है। असली सवाल है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में यदि गड़बड़ी की शिकायतें हैं तो उनकी जांच कौन करेगा, प्रक्रिया कितनी पारदर्शी होगी और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा कैसे होगी।

यदि किसी अधिकारी के खिलाफ आरोप हैं तो उनका परीक्षण प्रमाणों और वैधानिक प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए। इसी तरह, संवैधानिक पदों पर नियुक्त व्यक्तियों को भी जवाबदेही से परे नहीं माना जा सकता।

सरकार ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग नहीं मानती, तो भी वह SIR पर उठे सवालों का उत्तर देने, प्रक्रियागत कमियां सुधारने और शिकायतों की स्वतंत्र जांच सुनिश्चित करने के लिए कदम उठा सकती है। विपक्ष भी अपनी मांगों को प्रमाणों के साथ सामने रख सकता है।

इसलिए समाधान को केवल इस्तीफा बनाम आंदोलन की जीत-हार के रूप में देखना अधूरा होगा।

अंत में: लोकतंत्र में सरकार की ताकत का प्रमाण क्या है?

सरकार की ताकत इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि वह कितने लोगों को हिरासत में ले सकती है, कितनी सड़कें बंद कर सकती है या कितने लोगों को किसी स्थान तक पहुंचने से रोक सकती है।

उसकी संस्थागत ताकत इस बात में दिखाई देती है कि वह अपने आलोचकों के सवाल सुन सकती है या नहीं, आरोपों का जवाब दे सकती है या नहीं और कानून के तहत नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कर सकती है या नहीं।

लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन सरकार के लिए असुविधाजनक हो सकता है। लेकिन असुविधा और खतरे में फर्क है। किसी सरकार की आलोचना होना उसकी सत्ता के लिए अपने आप में खतरा नहीं है। यदि आरोप गलत हैं तो तथ्य उन्हें खारिज कर सकते हैं। यदि प्रक्रिया सही है तो पारदर्शिता उस पर भरोसा बढ़ा सकती है।

2 अक्टूबर से दिल्ली में जो कुछ हो रहा है, उसने इसी कसौटी को सामने रखा है।

क्या सरकार जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति देकर और SIR से जुड़े सवालों का उत्तर देकर विवाद का लोकतांत्रिक समाधान तलाशेगी? या प्रतिबंधों और हिरासतों के जरिए आंदोलन को सीमित करने की कोशिश जारी रहेगी?

और विपक्ष के सामने भी सवाल है—क्या वह आंदोलन को ठोस तथ्यों, स्पष्ट मांगों और शांतिपूर्ण अनुशासन के साथ आगे बढ़ाएगा?

सरकार झुकेगी या विपक्ष, यह भविष्य बताएगा। लेकिन लोकतंत्र में सबसे जरूरी यह है कि सवाल पूछने का अधिकार न झुके और सत्ता को जवाब देने की जिम्मेदारी से मुक्ति न मिले।

क्योंकि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतकर सरकार बनाने का नाम नहीं है। लोकतंत्र उस नागरिक के अधिकार का नाम भी है जो सरकार से असहमत होकर उससे सवाल पूछता है।

Comments

Your email address will not be published.

0