कविता
विद्रोह ही कला है!
– मंजुल भारद्वाज
आपके इर्द गिर्द एक जाल है
जन्म का
भाषा का
राष्ट्र का
लिंग,जात
धर्म और ईश्वर का !
इस जाल में रहने वालों को
संस्कार और संस्कृति का
वाहक माना जाता है
और जाल तोड़ने वालों को
विद्रोही !
त्रासदी है कि कला
मुक्त होती है
कला मानव को उन्मुक्त करती है
पर जाल में बंधे संस्कारियों ने
उसे शास्त्र में बांध
कला का मशीनीकरण कर दिया !
शास्त्र आपको मुक्त नहीं करता
जैसे शस्त्र आपको जीवित नहीं रखता
हां भ्रम ज़रूर पलता है कि
हमारे पास आधुनिक शस्त्र हैं
और हम महफूज़ हैं ?
एक और भ्रम है बाज़ार
जो तकनीक का उपयोग कर
लूट को मुनाफा कह रहा है
नागरिक को ग्राहक बना
मौत की नींद सुला रहा है।
मुक्तता शास्त्र और शस्त्र में नहीं है
मुक्तता प्रवाह और रवानगी में है
प्रक्रिया और शोध में है
शास्त्र और शस्त्र के विद्रोह में है
और जो विद्रोह है
वही लोक है
वही कला है !
