डॉ. रीटा अरोड़ा की लघु कथा – चूल्हे की आँच और रिश्तों की तपिश

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

लघु कथा

चूल्हे की आँच और रिश्तों की तपिश

डॉ. रीटा अरोड़ा

 

“माँजी, आज सब्ज़ी में नमक थोड़ा कम है,” बहू ने धीरे से कहा।

सास बोलीं, “तीस साल से खाना बना रही हूँ, आज तुम्हें कमी लगने लगी?”

“माँजी, मेरा वह मतलब नहीं था।”

“तो क्या मतलब था?”

बहू चुप हो गई।

शाम को बेटे ने देखा, माँ और पत्नी अलग-अलग बैठी थीं।

“क्या हुआ? आज घर में इतनी खामोशी क्यों है?”

माँ बोलीं, “कुछ नहीं, आजकल हमारे बनाए खाने में भी कमियाँ निकलने लगी हैं।”

बहू की आँखें भर आईं, “माँजी, मैं तो बस अपनेपन से कह रही थी।”

कुछ देर बाद सास रसोई में गईं। बहू चुपचाप रोटियाँ सेंक रही थी।

सास ने तवे पर जलती रोटी पलटते हुए कहा, “देख, आँच तेज़ हो तो रोटी जल जाती है।”

बहू मुस्कुराई, “और धीमी हो तो कच्ची रह जाती है।”

सास ने उसके हाथ से चिमटा ले लिया।

“चल, आज दोनों मिलकर आँच सँभालते हैं।”

बहू ने धीरे से पूछा, “और नमक?”

सास हँस पड़ीं, “वह तू अपने स्वाद से मिला लेना।”

~ डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल

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