लघु कथा
श्राद्ध: रस्म या रिश्ते?
~डॉ रीटा अरोड़ा
“माँ, पंडित जी कह रहे थे कि पितरों को प्रसन्न करने के लिए ब्राह्मण भोज और दान ज़रूरी है। सब तैयारी हो गई न?” अमित ने पूछा।
“हाँ, बेटा। खीर, पूरी, सब्ज़ी… सब बना लिया है।”
“और पिताजी की पसंद की खीर भी?”
माँ के हाथ ठिठक गए। “वह तो बन गई, लेकिन जब वे ज़िंदा थे, तब तुम्हें याद है, कितनी बार तुम्हारे साथ बैठकर खाने की इच्छा जताते थे?”
अमित ने मोबाइल एक तरफ रख दिया।
“माँ, काम बहुत रहता था।”
“जानती हूँ। पर उनकी आख़िरी बीमारी में भी तुम बस दस मिनट के लिए आए थे। आज उनके नाम पर दस लोगों को भोजन करा रहे हो।”
“तो क्या श्राद्ध करना गलत है?”
“नहीं बेटा। अपने पूर्वजों को श्रद्धा से याद करना हमारी परंपरा है। दान करना भी अच्छी भावना है। लेकिन क्या केवल एक दिन की रस्म से हमारा कर्तव्य पूरा हो जाता है?”
अमित कुछ नहीं बोला।
माँ ने कहा, “पिताजी की तस्वीर पर फूल चढ़ाना अच्छी बात है। मगर घर के बुज़ुर्गों के जीते-जी उनकी बात सुनना, उनके साथ समय बिताना और उनकी ज़रूरत समझना भी तो उतना ही ज़रूरी है।”
अमित ने माँ की ओर देखा। उनकी आँखें नम थीं।
उसने धीरे से पूछा, “माँ, आज खाना मेरे साथ खाओगी?”
माँ मुस्कुराईं, “बेटा, आज नहीं… अब हर दिन।”
उस दिन श्राद्ध की थाली में खीर के साथ अमित के मन में एक सवाल भी परोसा गया- जिनके जाने के बाद हम उन्हें इतना याद करते हैं, उनके रहते उन्हें कितना याद रखते हैं?
