जिला सिरसा (हरियाणा) के बीज्जुवाली गांव में जन्मे हरभगवान चावला आज हिंदी साहित्य जगत का प्रमुख नाम है। उन्होंने कविता, लघु-कथा, कहानी, आलोचना, उपन्यास आदि विधाओं में अपने लेखन के जरिए अपनी प्रतिभा का भरपूर परिचय दिया है। उनके 6 कविता संग्रह: कोई अच्छी खबर लिखना, कुंभ में छूटी औरतें, इसी आकाश में, जहां कोई सरहद न हो, इंतजार की उम्र, चयनित कविताएं उपलब्ध हैं।
दो लघु-कथा संग्रह: बीसवां कौड़ा, सबसे ऊंची जमीन हैं।
‘कुंभ में छूटी औरतें’ और ‘बीसवां कोड़ा’ का पंजाबी में भी अनुवाद हो चुका है। इसलिए पंजाबी के पाठक भी उनसे बखूबी परिचित हैं।
‘देख फ़रीदा जो थिआ’ भारत विभाजन की त्रासदी को लेकर लिखा गया उनका पहला उपन्यास है जिसके जरिए नफ़रत की राजनीति और विस्थापन की पीड़ा को समुचित यथार्थ के रग-रेशे के साथ उकेरा गया है। जिसको पढ़ते हुए पाठक पश्चिमी पंजाब की “सरायकी” भाषा-संस्कृति की जीवंतता (जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है) से न केवल ऑथेंटिक परिचय हासिल करता है बल्कि उसकी मिठास में भी सराबोर हो जाता है। इसी उपन्यास के शुरुआती अंश यहां ‘प्रतिबिंब मीडिया’ के पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं: ओमसिंह अशफ़ाक।
उपन्यास अंश:
देख फ़रीदा जो थिआ
हरभगवान चावला
1
अमर लाल कू बल-बल जा
जोताँ वाला दीया जगा।
पहली चौकी हे दरिया दे
हे दरिया, वाँहदे दरिया दे
नित दरिया नीर वहाँवें चा…
दूजी चौकी दे चूरी चावल
सुक्का जंड कीतो हरियावल
बदलाँ कू वरसावें चा…
त्रीझी चौकी काले छोले
खुशहाली दे बूहे खोले
बूटेयाँ रंग चढ़ावें चा…
चौकियाँ पूर चढावें चा
जग दियाँ मोहराँ लावें चा
देवें चा ते दिवावें चा….
अमरलाल कू बल-बल जा…
छबीला राम ढोलक बजाता हुआ आगे-आगे गा रहा है, पीछे-पीछे बाक़ी लोग सुर में सुर मिला रहे हैं। आज 1966 के सावण महीने के शुक्ल पक्ष का रविवार है। जल के देवता अमर लाल का पन्नियों और बाँस की खपच्चियों से बना एक छोटा सा पुतला एक लकड़ी की टोकरी में रखा है, उसी टोकरी में चौमुखा दीपक जल रहा है। एक ऊँटगाड़ी पर काले चनों की बड़ी कड़ाही लदी हुई है, उसी ऊँटगाड़ी पर गेहूँ के आटे से बनी चूरी का पतीला भी रखा है। चनों को रात को पानी में भिगोकर रखा गया था और आज नमक, मसाले और मीठा सोडा डालकर इस तरह पकाया गया है कि चने एकदम काले हो गए हैं। अमरलाल के पुतले और दीये को रजवाहे में तैराने के बाद चनों और चूरी का प्रसाद बँटेगा। यह क़ाफ़िला रजवाहे की तरफ बढ़ रहा है। रजवाहा बस नाम का ही रजवाहा है, आकार में तो यह एक खाले जैसा ही है। आज इस खाले में पानी बह रहा है। दूर-दूर तक विशाल टिब्बे इस खाले का मुँह चिढा रहे हैं, जैसे कह रहे हों हमारी सदियों की प्यास इतनी विकराल है कि पूरे सतलुज दरिया का पानी भी इसे बुझा नहीं सकता, तुम चोंच भर पानी से क्या कर लोगे? फिर भी तुम्हारी मेहरबानी, तुम्हारी वजह से सतलुज के पानी का स्वाद तो चख लेते हैं। यह खालानुमा रजवाहा भाखड़ा बाँध बनने की प्रक्रिया के दौरान ही बनना शुरू हुआ था।

यह बिज्जुवाली गाँव है। सन 1947 में मुल्तान जिले से उजड़कर आये इन लोगों को करीब सात साल बाद यहाँ से पलायन करके गए मुसलमानों की जमीनें अलॉट हुई हैं। अपनों के मरने के ग़म और जिंदा रह पाने के विकट संघर्ष के चलते, कुछ सालों तक “सेसा” (जल के देवता अमर लाल की पूजा अर्चना का मूल रूप से सिधी त्योहार जिसे बहुत से क्षेत्रों ने अपना लिया) नहीं मना। रोजी-रोटी और स्वयं को स्थापित करने का संघर्ष तो अब भी जारी है। एक स्थायी ठिकाना होने और रजवाहा बनने के बाद पुराने त्योहार को मनाने की लालसा ने अंगड़ाई ली और कई सालों के व्यवधान के बाद यहाँ आकर बसे लोगों ने सेसा मनाना शुरू किया। शुरू-शुरू में इस गाँव के मूल निवासियों को यह त्योहार एक अजूबा सा लगा, लेकिन जल्दी ही वे इस त्योहार का हिस्सा बन गये।
सब रजवाहे की ओर जा रहे हैं। कोई किसी से कुछ कह नहीं रहा, पर सबको ढोलक रोती हुई सी लग रही है, छबीला राम की आवाज को सुनकर लगता है जैसे टिब्बे के पीछे कोई विलाप कर रहा है। एक सेसा वहाँ होता था और एक यह… किसी विशाल किताब के बंद पड़े पन्ने खुलने लगते हैं। आश्चर्य कि ये पन्ने नम हैं, पर इनकी लिखावट जरा भी फीकी नहीं पड़ी है। इन पन्नों के अचानक डैने निकल आए हैं। ये डैने बड़े होते जा रहे हैं और फिर इतने बड़े हो जाते हैं कि टिब्बे इनके नीचे लुप्त हो गए हैं। सेसे में शामिल बहुत सारे लोग इन डैनों जैसे पन्नों पर लिखे अक्षरों में बदल गए हैं ये अक्षर कितनी ही दास्तानों को खोल रहे हैं- सुख और दुःख की दास्तानें जो बारिश बनकर आँखों से चू रही हैं, आँधी बनकर आँखों में किसकिसा रही हैं…
2
पोह (पूस) के महीने में जब शलगम का निचला हिस्सा नीला होने लगता, मीठा, फीका-सा स्वाद बच्चों को अपनी तरफ खींचने लगता, बच्चे घरों से निकलकर खेतों की ओर दौड़ने लगते। ऐसी ही पोह महीने की एक शाम को कोटला अली-दस्ती गाँव के दो बच्चे एक खेत में शलगम खा रहे थे। खा कम रहे थे, उनसे खेल ज्यादा रहे थे। इनमें से एक लड़के का नाम रामकिशन था, दूसरे का दातू राम। यह खेत रामकिशन के नाना कौड़ा राम का था। कौड़ा राम की एक ही बेटी थी लाली बाई, बेटा कोई न था। अच्छी-खासी ज़मीन थी। बेटी की शादी गाँव डाबरां में हुई थी। बेटी का ससुर कांग्रेस का स्थानीय नेता था, महात्मा गाँधी का पक्का अनुयायी। उसके चार बेटे थे। कौड़ा राम का दामाद नौबत राय तीसरे स्थान पर था। कौड़ा राम ने समधी उत्तम चंद से मिन्नत की कि वह अपने इस बेटे को कौड़ा राम के गाँव कोटला अली-दस्ती में रहने की इजाजत दे दे ताकि वह जमीन की देखभाल कर सके। परोक्ष रूस से यह नौबत राय को घर जमाई बनाने का प्रस्ताव ही था, जिसे उत्तम चंद ने थोड़ी हील-हुज्जत के बाद स्वीकार कर लिया था। वैसे दोनों गाँवों की दूरी ज्यादा नहीं थी। नौबत राय अब कोटला में रह रहा था, पर वह अक्सर अपने पैतृक गाँव आता रहता था। कौड़ा राम के खेत के पास से एक नहर गुजरती थी। इस नहर के पार कौड़ा राम के भाई का खेत था। भाई तो अब नहीं रहा था, भतीजे खेत सँभालते थे। एक भतीजा रामसरूप तो रहता ही खेत में था। उनके खेत में नील की खेती होती थी। रिश्ते में वह रामकिशन का मामा ही था। बच्चे शलगम खा चुके तो रामकिशन ने दातू राम के सामने नील की खेती दिखाने का प्रस्ताव रखा। दातू राम यह देखने के लिए उत्सुक लगा तो दोनों नहर पार कर रामसरूप के खेत में चले गए। यह नहर बारह साल पहले 1928 में बनी थी। इस नहर में साल में तीन महीने पानी चलता था। परन्तु उन दिनों नहर सूखी थी। वे दोनों सूखी नहर पार कर दूसरी तरफ चले गए। मामा ने भानजे और उसके दोस्त को नील का खेत और नील तैयार करने के लिए बनाए गए कुंड दिखाए, नील बनाने की पूरी प्रक्रिया बताई।
दिन डूबने में अभी वक्त था। दोनों बच्चे घर की तरफ चल पड़े। अभी थोड़ी ही दूर गए थे कि आँधी और बारिश शुरू हो गई। रामकिशन के पास एक डंडा था। दोनों ने डंडे का एक-एक सिरा पकड़ा और दौड़ पड़े। आँधी का वेग तेज़ हो गया था, बारिश मूसलाधार हो चली थी। अगरचे सूरज डूबने में अभी थोड़ा वक्त था, पर आँधी-बारिश के कारण अँधेरा हो गया था। ठंड और डर से दोनों काँप रहे थे। वे अभी जाहर पीर की मजार के पास पहुँचे थे कि डंडा उनसे छूट गया और वे दोनों रास्ते पर गिर पड़े। ठीक तभी खेत के मुज़ारे नबी बलोच ने उन्हें थाम लिया। बच्चे नहीं समझ पाए कि वह आख़िर आया कहाँ से ? उन्हें लगा, जैसे वह आसमान से प्रकट हुआ है। नबी ने उन्हें अपने दोनों कंधों पर उठाया और घर की तरफ चल पड़ा। उधर रामकिशन की नानी रामदित्ती उसे ढूँढ़ती फिर रही थी। वह उसे देखने दातू के घर की तरफ जा रही थी कि देखा- सामने से दातू की दादी चली आ रही है।” अड़ी भैणे, मेरा रामू है तेरे घर ?” रामदित्ती ने व्यग्रता से पूछा।
“ना, दातू वी घर नहीं। मैं ता हुँदा पता करण तुहाडे घर पई आँदी हाँ।”
“हाय ओय रब्बा मेहर करें। ए दोनों गए होसेन खेत। इतना मींह, इतनी अँधेरी ! कित्थे होसेन, कींवें होसेन। हाय ओये मेरा रामू, रब्बा अज लाज रख।” वह मोचियों की गली से होती हुई खेत की ओर भागती जा रही थी। पीछे-पीछे दातू की दादी भागी आ रही थी। सूरज अब डूब गया था। बारिश और आँधी थम गई थी। बदहवास भागती हुई रामदित्ती का माथा रास्ते पर के एक खेजड़ी के पेड़ से टकरा गया। खून बह निकला, पर उसे कोई सुध नहीं थी। वह भागती रही। खेत में उसे बच्चे नहीं दिखे तो नहर पार कर रामसरूप के खेत में पहुँच गई। बाहर से ही चिल्लाई, “ओय रामसरूप आ, रामू है इत्थे ?”
“चाची यह क्या हाल बना रखा है, खूनो-खून हो रही है।”
“दस मैनूँ रामू है इत्थे ?”
“आया तो था, पर उसको गए तो बहुत देर हो गई। साथ उसका दोस्त भी था
दातू ।”
“ते हूँकू इहो जये मौसम विच भेजा कीवें? सक्का मामा होवें हा ता भेजें हा ? हाय रब्बा के बणसी ? रब्ब भली कर, मैडे गुनाह माफ़ कर। रामू सही-सलामत होवे, मैं हूँदे जंजू पवेसाँ, पीर दी दरगाह दे देग चढ़ेसाँ।” (तूने ऐसे मौसम में उसे भेजा कैसे ? सगा मामा होता तो भेजता ? हे भगवान अब क्या होगा ? भगवान भली करो, मेरे गुनाह माफ़ करो। रामू सलामत हो, मैं उसका जनेऊ संस्कार करवाऊँगी, पीर की दरगाह पर देग चढ़ाऊँगी)।
“चाची तू घबरा ना, अपणा रामू ठीक-ठाक होगा।”
“कीवें ना घबरावाँ। साडे कोई पंज-सत खड़े हेन। हाय ओय रब्बा बस तेरा ही आसरा हे।”
तभी नबी बलोच ने आवाज लगाई, “मेहता साहब घर हो ?”
“आ नबी आ।” रामसरूप ने कहा। अंदर आते-आते नबी ने रामदित्ती को देखा तो बोला, “आप यहाँ हो, शुकर है अल्लाह का। आपको सारे ढूँढ़ रहे हैं। मुझे अंदाज़ा था कि आप रामकिशन को ढूँढ़ने खेत आए होओगे।”
“कित्थे हे रामू, तैनूँ पता हे ?”
“मैं घर छोड़ के आया हूँ, साथ उसका दोस्त भी था, क्या नाम है उसका…”
“दातू… दातू ।” अब तक पत्थर-सी स्थिर खड़ी दातू की दादी चिल्लाई।
“हा दातू।” रामदित्ती रोए जा रही थी। वह कुछ बोलना चाहती थी, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी।
“चाची चुप कर, अपणा रामू घर है और ठीक-ठाक हे।”
तभी बाहर नौबत राय की आवाज सुनाई दी। रामदित्ती का रोना एकदम बंद हो गया।
“नबी तू ठीक ही कह रहा था अम्मा रामू की तलाश में खेत गई होगी। अम्मा की जान बसती है उसमें।” नौबत राय ने कहा।
जीजा जी, जरा देखो अम्मा की हालत।” उसने लालटेन की लौ बढ़ा दी।
” नौबत राय ने देखा, अम्मा के माथे का खून उसकी क़मीज तक बह आया था। अब
भी माथे से खून जरा-ज़रा सा रिस रहा था।
“नबी देखना थोड़ी रुई है तो ?”
“पहले घर चलो सारे। मैं रामू कू देख के लहू साफ़ करेसाँ, चलो।” सब बाहर निकल आए। रामदित्ती नबी से कह रही थी, “तेरा मूँ घ्यो शक्कर नाल भर देसाँ नबी। अज तू फरिश्ता बण के आया हैं।”
(शेष अगली किस्त में जारी..)
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*उपन्यास: देख फ़रीदा जो थिआ, लेखक: हरभगवान चावला।
