लघुकथा
खुशी का सबसे खूबसूरत सीक्रेट
डॉ रीटा अरोड़ा
“भैया, ये बस सेक्टर 17 जाएगी?”
करीब सत्तर साल के एक बुजुर्ग ने बस स्टॉप पर खड़े एक लड़के से पूछा।
“हाँ अंकल, जाएगी। आप बैठ जाइए, मैं बता दूँगा कहाँ उतरना है।”
बस आई। भीड़ ज्यादा थी। लड़के ने उन्हें अपनी सीट दे दी।
थोड़ी देर बाद बुजुर्ग ने जेब टटोली और परेशान होकर बोले, “अरे, शायद पर्स घर ही रह गया। अब टिकट कैसे लूँगा?”
लड़के ने मुस्कराकर कंडक्टर से कहा, “इनका भी टिकट दे दीजिए।”
“बेटा, पैसे मैं तुम्हें वापस कैसे दूँगा?”
“अंकल, रहने दीजिए। कभी किसी और की मदद कर दीजिएगा।”
बुजुर्ग कुछ सेकंड उसे देखते रहे। फिर धीरे से बोले, “आज सुबह से बड़ा खराब दिन जा रहा था। तुमने अच्छा कर दिया।”
लड़का अगले स्टॉप पर उतर गया।
न कोई फोटो खिंची।
न कोई वीडियो बना।
न सोशल मीडिया पर पोस्ट हुई।
लेकिन उस पूरे दिन उसके चेहरे पर एक छोटी-सी मुस्कान जरूर बनी रही।
शायद खुशी कई बार ऐसे ही आती है-चुपके से।
हम खुशी को अक्सर बहुत बड़ी चीजों से जोड़ देते हैं।
अच्छी नौकरी मिल जाए तो खुश होंगे।
नई कार आ जाए तो खुश होंगे।
बैंक बैलेंस थोड़ा और बढ़ जाए तो खुश होंगे।
विदेश घूम आएँ तो खुश होंगे।
लोग हमारी तारीफ करें तो खुश होंगे।
इन सब चीजों से खुशी मिलती भी है। इसमें कुछ गलत नहीं है। लेकिन इन खुशियों की एक दिक्कत है-कुछ समय बाद हम इनके आदी हो जाते हैं।
जो फोन छह महीने पहले खरीदकर हमें बहुत खुशी हुई थी, वह आज बस एक फोन है। जिस नई कार को पहले दिन बार-बार पार्किंग में जाकर देखते थे, कुछ महीनों बाद उसी में ट्रैफिक को कोसते हुए ऑफिस जाते हैं।
लेकिन एक दूसरी तरह की खुशी भी होती है।
वह तब आती है
जब हम किसी जरूरतमंद की मदद करते हैं।
किसी उदास व्यक्ति की बात सुन लेते हैं।
किसी अजनबी को रास्ता बता देते हैं।
ऑफिस में परेशान सहकर्मी का थोड़ा काम बाँट लेते हैं।
किसी बुजुर्ग के लिए दरवाजा पकड़ लेते हैं।
किसी बच्चे की फीस में छोटी-सी मदद कर देते हैं।
कई बार मदद बहुत छोटी होती है, लेकिन सामने वाले के लिए उसका अर्थ बहुत बड़ा हो सकता है।
हमारे लिए किसी को पाँच मिनट देना मामूली बात हो सकती है, लेकिन शायद वह व्यक्ति कई दिनों से किसी ऐसे इंसान की तलाश में हो जो बस उसकी बात सुन ले।
हमारे लिए किसी डिलीवरी बॉय से मुस्कराकर “थैंक यू” कहना केवल दो शब्द हैं, लेकिन हो सकता है उसने पूरा दिन शिकायतें ही सुनी हों।
हमारे लिए किसी परेशान व्यक्ति को यह कहना कि “कोई बात नहीं, मैं हूँ, बताइए क्या मदद कर सकता हूँ” एक सामान्य वाक्य हो सकता है। लेकिन सामने वाले के लिए वही वाक्य उस दिन की सबसे बड़ी राहत बन सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि मदद करने का असर केवल उस व्यक्ति पर नहीं पड़ता जिसकी हम मदद करते हैं। उसका असर हम पर भी पड़ता है।
किसी के चेहरे पर अपने कारण आई मुस्कान देखकर जो संतोष मिलता है, उसकी प्रकृति थोड़ी अलग होती है। उसमें दिखावा नहीं होता, तुलना नहीं होती और किसी से आगे निकलने की दौड़ नहीं होती।
वह खुशी भीतर से आती है।
शायद इसलिए कुछ लोग बहुत साधारण जीवन जीते हुए भी संतुष्ट दिखाई देते हैं, जबकि कुछ लोगों के पास बहुत कुछ होने के बावजूद हमेशा कुछ कमी महसूस होती रहती है।
समस्या तब शुरू होती है जब अच्छाई भी प्रदर्शन बन जाती है।
आज मदद करने से पहले कैमरा निकल आता है।
किसी को खाना दिया तो वीडियो चाहिए।
कंबल बाँटा तो फोटो चाहिए।
किसी की सहायता की तो पोस्ट चाहिए।
फिर मदद के केंद्र में जरूरतमंद व्यक्ति नहीं, बल्कि हम खुद आ जाते हैं।
बेशक अच्छी चीजों को साझा करने में कोई बुराई नहीं है। कई बार उससे दूसरे लोग भी प्रेरित होते हैं। लेकिन हमें कभी-कभी खुद से एक सवाल जरूर पूछना चाहिए-
अगर किसी को पता ही न चले कि मैंने यह काम किया है, तो क्या मैं फिर भी इसे करूँगा?
अगर जवाब “हाँ” है, तो शायद वही वास्तविक अच्छाई है।
और अच्छाई के लिए हमेशा पैसे की भी जरूरत नहीं होती।
किसी विद्यार्थी का आत्मविश्वास बढ़ाना भी मदद है।
किसी नए कर्मचारी को यह महसूस कराना कि वह टीम का हिस्सा है, मदद है।
अपने घर में काम करने वाले व्यक्ति से सम्मानपूर्वक बात करना मदद है।
किसी परेशान दोस्त को बिना बीच में टोके सुन लेना मदद है।
अपने माता-पिता के पास बैठकर उनकी पुरानी बातें सुनना भी शायद किसी महंगे उपहार से बड़ी खुशी दे सकता है।
हम अक्सर दुनिया बदलने की बात करते हैं। लेकिन दुनिया अचानक नहीं बदलती। वह छोटे-छोटे व्यवहारों से बदलती है।
एक व्यक्ति किसी दूसरे के साथ थोड़ा अच्छा व्यवहार करता है। वह व्यक्ति शायद अगले इंसान के साथ थोड़ा अच्छा व्यवहार करता है। और इस तरह अच्छाई बिना किसी घोषणा के आगे बढ़ती रहती है।
इसे कभी-कभी लोग “Pay it Forward” कहते हैं।
जिसने आपकी मदद की, जरूरी नहीं कि आप उसी व्यक्ति की मदद वापस करें। आप किसी तीसरे व्यक्ति की मदद कर दीजिए। अच्छाई का हिसाब बैंक अकाउंट की तरह रखने की जरूरत नहीं है।
जीवन में हम बहुत-सी चीजें जमा करते हैं—पैसा, सामान, उपलब्धियाँ और अनुभव। लेकिन शायद उम्र के किसी पड़ाव पर हमें सबसे ज्यादा वे क्षण याद रहते हैं जब हमने किसी का मुश्किल दिन थोड़ा आसान बनाया था।
और हो सकता है उस व्यक्ति को हमारा नाम भी याद न हो।
कोई बात नहीं।
अच्छाई की सबसे खूबसूरत बात शायद यही है कि उसे पहचान की जरूरत नहीं होती।
फंडा यह है कि खुशी हमेशा पाने में नहीं होती, कई बार देने में होती है। अच्छाई के लिए न कैमरे की जरूरत है, न तालियों की और न किसी रिवॉर्ड की। जब हमारी छोटी-सी मदद से किसी दूसरे इंसान का दिन बेहतर होता है, तो उसके साथ-साथ हमारे भीतर भी कुछ बेहतर हो जाता है। और शायद वही खुशी पैसे से खरीदी जा सकने वाली हर चीज से कहीं बड़ी होती है।
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