मुनेश त्यागी की कविता – ओ भगतसिंह तुम जिंदा हो

कविता

ओ भगतसिंह तुम जिंदा हो

मुनेश त्यागी

ओ भगतसिंह तुम जिंदा हो
हर एक लहू के कतरे में,
भिंची हुई हर मुट्ठी में
इंकलाब के सारे नारों में,
ओ भगतसिंह तुम जिंदा हो।

सूरज चांद सितारों में
मजदूरों के सारे नारों में,
जनता के जयकारों में
हां कम्युनिस्टों के नारों में,
ओ भगतसिंह तुम जिंदा हो।

लेनिन की मुड़ी किताबों में
सुखदेवों और आजादों में,
बिस्मिलों और अशफाकों में
रक्त से सने फरहरों में ,
ओ भगतसिंह तुम जिंदा हो।

इंकलाब की सारी लहरों में
भारत छोड़ो के नारों में,
भारत नेवी के विद्रोहों में
आजाद हिंद की फौजों में,
ओ भगतसिंह तुम जिंदा हो।

संसद में फेंके परचों में
जन गण मन की हुंकारों में,
छात्र किसान मजदूरों में
जनता के अरमानों में,
ओ भगतसिंह तुम जिंदा हो।

ओ भगतसिंह तुम जिंदा हो
हर एक लहू के कतरे में,
हां भींची हुई हर मुट्ठी में
इंकलाब के सारे नारों में,
ओ भगतसिंह तुम जिंदा हो।

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