लघु कथा
एक छोटा सा ‘वाह’
डॉ रीटा अरोड़ा
“माँ, देखो! कैसी बनी है?”
आरव ने पेंटिंग सामने कर दी।
माँ ने दो सेकंड देखा और बोलीं,
“ठीक है… लेकिन ये रंग कुछ ज्यादा नहीं हो गए?”
आरव का चेहरा उतर गया।
“अच्छी नहीं बनी?”
“अच्छी तो है, पर अभी बहुत कुछ सीखना है।”
आरव चुपचाप पेंटिंग लेकर कमरे में चला गया।
शाम को रमा आंटी आईं। पेंटिंग देखते ही बोलीं,
“अरे वाह! ये किसने बनाई?”
“आरव ने,” माँ ने कहा।
रमा आंटी ने आवाज़ लगाई,
“आरव! इधर आओ ज़रा।”
आरव आया।
“बेटा, ये सूरज तुमने बनाया है?”
“हाँ।”
“बहुत खूब! ऐसा लग रहा है जैसे अभी-अभी आसमान से निकला हो। वाह!”
आरव पहली बार मुस्कुराया।
रमा आंटी चली गईं तो माँ ने पूछा,
“इतना खुश क्यों हो?”
आरव ने सहजता से कहा,
“उन्होंने मेरी पेंटिंग में गलती ढूँढ़ने से पहले ‘वाह’ ढूँढ़ लिया।”
माँ चुप हो गईं।
कुछ पल बाद उन्होंने पेंटिंग उठाई और पूछा,
“अगर मैं भी ‘वाह’ कह दूँ तो?”
आरव मुस्कुराया,
“तो अगली पेंटिंग सबसे पहले आपको दिखाऊँगा।”
माँ की आँखें भर आईं।
उन्होंने पेंटिंग सीने से लगाई और धीरे से कहा-
“वाह, बेटा… सच में बहुत सुंदर है।”
इस बार आरव ने पेंटिंग नहीं,
माँ का चेहरा देखा।
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