कुछ लोगों को मिर्ची लगे तो मैं क्या करूं
जिस पूँजीवाद का विरोध है, क्या वह हमारे भीतर नहीं है?
रत्ना भदौरिया
कम्यूनिस्टों, साहित्यकारों, लेखकों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों से एक असुविधाजनक सवाल पूछना चाहिए—जिस पूँजीवाद का हम मंचों से विरोध करते हैं, क्या हमने अपने जीवन से भी उसे बाहर कर दिया है?
सवाल पूँजीवाद के विरोध का नहीं, अपने और अपने विचार के बीच की दूरी का है।
हम पूँजीवाद को कोसते हुए महँगी कार में बैठते हैं। पेट्रोल की कीमत पर भाषण देते हुए रोज़ सैकड़ों-हजारों रुपये का ईंधन जलाते हैं। श्रम और बराबरी की बात करते हुए ब्रांडेड कपड़ों में सभाओं में पहुँचते हैं। भूख, गरीबी और वंचना पर लेख लिखने के बाद उसी शाम किसी महँगे रेस्तराँ की मेज़ पर बैठकर भोजन करते हैं। दुनिया के शोषित मनुष्य की चिंता करते हुए विदेशी यात्राओं की तस्वीरें साझा करते हैं।
क्या यह विरोधाभास नहीं है?
यहाँ सवाल यह नहीं कि महँगी कार रखना अपराध है, अच्छा भोजन करना पाप है या विदेश यात्रा करना वैचारिक विश्वासघात। मनुष्य सुविधा से बना है और सुविधा की इच्छा अपने आप में कोई अपराध नहीं। असली प्रश्न यह है कि जब हमारी जीवन-शैली उसी आर्थिक संरचना से पैदा हुई है जिसकी हम सार्वजनिक रूप से निंदा करते हैं, तब हमारी आलोचना कितनी आत्मालोचनात्मक है?
विचारधारा का सबसे कठिन परीक्षण मंच पर नहीं, जीवन में होता है।
गरीबी का चित्र बनाना आसान है; गरीबी के बीच अपनी सुविधा को पहचानना कठिन। मजदूर के पक्ष में कविता लिखना सरल है; अपने उपभोग के पीछे खड़े अदृश्य श्रम को देखना कठिन। शोषण के विरुद्ध लेख लिखना आसान है; यह स्वीकार करना कठिन कि हमारी अनेक सुविधाएँ किसी दूसरे के सस्ते श्रम, कम मजदूरी और असमान अवसरों की व्यवस्था से जुड़ी हो सकती हैं।
यही वह जगह है जहाँ विचार और जीवन आमने-सामने खड़े हो जाते हैं।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। क्या किसी व्यक्ति को पूँजीवाद की आलोचना करने का अधिकार तभी मिलेगा जब वह गरीब होकर रहे? क्या व्यवस्था की आलोचना करने वाला हर व्यक्ति अनिवार्य रूप से अपनी सारी निजी सुविधाएँ छोड़ दे? ऐसा मानना भी सरलीकरण होगा।
पूँजीवाद केवल महँगी कार, कोट-पैंट, रेस्तराँ और विदेशी यात्रा का नाम नहीं है। वह एक व्यापक आर्थिक व्यवस्था है—उत्पादन, स्वामित्व, श्रम, बाजार, पूँजी और लाभ के संबंधों से निर्मित व्यवस्था। इसलिए किसी व्यक्ति की निजी जीवन-शैली देखकर अकेले यह निष्कर्ष निकाल देना कि वह पूँजीवाद का समर्थक है, उतना ही अधूरा है जितना केवल क्रांतिकारी भाषा बोलने से यह प्रमाणित मान लेना कि वह शोषण-विरोधी जीवन जी रहा है।
मगर फिर भी एक सवाल बचा रहता है—
क्या हमारे विचार हमारी आदतों तक पहुँचते हैं?
अगर नहीं पहुँचते, तो विचार धीरे-धीरे जीवन की सजावट बन जाते हैं।
आज हमारे समय की एक बड़ी विडंबना यह है कि विचारधाराएँ कई बार जीवन बदलने का औजार कम और पहचान का परिचय अधिक बन जाती हैं। कोई अपने परिचय में क्रांतिकारी लिखता है, कोई प्रगतिशील, कोई वामपंथी, कोई जनपक्षधर। लेकिन इन शब्दों के पीछे उसका उपभोग, उसके संबंध, उसकी आर्थिक प्राथमिकताएँ और उसके सामाजिक व्यवहार क्या कहते हैं—इस पर बात कम होती है।
साहित्यकार जब किसान पर लिखता है तो तालियाँ मिलती हैं; मजदूर पर लिखता है तो संवेदनशील कहा जाता है; व्यवस्था पर प्रहार करता है तो साहसी माना जाता है। लेकिन शायद साहित्य की असली परीक्षा वहीं से शुरू होती है जहाँ लेखक अपने भीतर झाँकता है और पूछता है—जिस असमानता पर मैं लिख रहा हूँ, क्या मेरी अपनी सुविधाएँ भी किसी रूप में उसी
असमान संरचना से जुड़ी हैं?
यह प्रश्न असहज है, इसलिए जरूरी है।
किसी विचारधारा की ईमानदारी उसके नारों की ऊँचाई से नहीं, उसके आत्मालोचन की गहराई से मापी जानी चाहिए।
हमें गरीबी का अभिनय नहीं चाहिए। हमें यह भी नहीं चाहिए कि जो पूँजीवाद की आलोचना करता है वह जानबूझकर अभाव में रहे। आवश्यकता इससे अधिक कठिन है—अपने विशेषाधिकार को पहचानना, अपने उपभोग की सामाजिक कीमत पर विचार करना और उस व्यवस्था के अंतर्विरोधों को अपने भीतर भी देखने का साहस रखना।
क्योंकि सबसे सुविधाजनक क्रांति वही होती है जिसमें परिवर्तन की कीमत हमेशा कोई दूसरा चुकाए।
शायद आज कम्यूनिस्टों, लेखकों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को सबसे पहले कोई नया घोषणापत्र नहीं, बल्कि एक निजी हिसाब-किताब खोलना चाहिए—हम क्या उपभोग करते हैं, किन साधनों से करते हैं, किस श्रम पर हमारी सुविधाएँ टिकी हैं और हमारे विचार हमारी जीवन-शैली से कहाँ टकराते हैं?
हो सकता है इस आत्मपरीक्षण के बाद पूँजीवाद के विरुद्ध हमारी आवाज़ कुछ धीमी हो जाए।
लेकिन यदि वह धीमी होकर अधिक ईमानदार हो जाए, तो शायद पहली बार उसमें विचार की गर्मी और जीवन की सच्चाई एक साथ दिखाई दे।
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रत्ना भदौरिया की संवेदनशीलता में डूबी बौद्धिक सक्रियता चकित करती है..!

The more we appreciate her articles the lesser it is. She has an original mind.Having been in hospital job it is amazing how she finds time to observe the society..perhaps through her patients. Hats off to this young talent.
– Prof.NK Nagpal, principal (retired),IGN college,ladwa (kurukshetra) Haryana.