सस्ता और सुलभ न्याय सरकार की एजेंडे में नहीं
मुनेश त्यागी
हो गई पीर पर्वत सी पिंघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खड़ा करना हमारा मकसद नहीं
हमारी कोशिश है यह सूरत बदलनी चाहिए।
जनता को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक न्याय मिले, आजादी के आंदोलन में लाखों स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों का यह सबसे प्रमुख मुद्दा था। जनता को सस्ता और सुलभ न्याय देने के लिए, इन तमाम मुद्दों को भारत के संविधान में शामिल किया गया और भारत के संविधान के आर्टिकल 21 में जोरदार तरीके से लिखा गया कि सस्ता और सुलभ न्याय देना, सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। संविधान बनने के बाद और लागू होने के बाद किसानों, मजदूरों और तमाम वादकारियों को यह पक्का विश्वास था कि ऊपर लिखे गए समस्त न्याय उन्हें आसानी से मिल जाएंगे।
मगर संविधान के इन बुनियादी सिद्धांतों को काफी समय तक, धरती पर नहीं उतारा गया। हकीकत यह है कि उन्हें न्याय लेने के लिए हजारों सैकड़ो मील जाना पड़ता था, बहुत बड़ी मात्रा में धन खर्च करना पड़ता था जो उनके पास नहीं होता था, जिस कारण उन्हें लगातार अन्याय का सामना करना पड़ता था। इसी मुद्दे को लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट बेंच की स्थापना करने का आंदोलन लगभग 1980-81 में शुरू किया गया। इस जायज़ मांग को लेकर, पिछले लगभग 46 साल से आंदोलन जारी है, मगर सरकार जनता की इस जायज मांग को मानने को तैयार नहीं है।
आज हालात इतने खराब हैं कि सरकार का सस्ते सुलभ और त्वरित न्याय में कोई विश्वास नहीं है। न्यायालयों में मुकदमों के अम्बार लगे हुए हैं। मुकदमों के अनुपात में जज नहीं हैं, मुकदमों के अनुपात में न्यायालय नहीं हैं। अदालतों में सरकारी कर्मचारी और स्टेनो का लगभग अभाव है। भारत में इस वक्त 5 करोड़ 52 लाख से भी ज्यादा मुकदमे लंबित हैं जिनमें सुप्रीम कोर्ट में 92,320, उच्च न्यायालयों में 63 लाख 62,154 मुकदमें और जिला जिला न्यायालयों में 4 करोड़ 81 लाख 60 हजार 880 मुकदमे लंबित हैं। उच्च न्यायालयों में 1122 पदों में से 300 पद खाली हैं। जिला न्यायालयों में 25,439 पदों में से 5000 पद खाली है।
अंतर्राष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार 10 लाख जनसंख्या पर 110 जज होने चाहिएं। भारत का विधि आयोग और सर्वोच्च न्यायालय अपने कई फसलों में कह चुके हैं कि 10 लाख जनसंख्या पर 50 जज होने चाहिए। वैश्विक स्थिति पर नजर डालें तो 10 लाख जनसंख्या पर चीन में 300 जज हैं, यूरोप में 200 जज हैं और अमेरिका में 150 जज हैं। वर्तमान हालात पर एक नजर डाली जाए तो विश्वास नहीं होता और भारतीय न्याय व्यवस्था पर बेहद अफसोस होता है। भारत में 10 लाख जनसंख्या पर केवल 22 जज हैं और उत्तर प्रदेश में मात्र 18.52 जज कम कर रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट बेंच की स्थापना के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जैसे डॉ संपूर्णानंद नारायण तिवारी, रामनरेश यादव, बनारसी दास, विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकारें, केंद्र सरकारों से सिफारिश कर चुकी हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट बेंच की स्थापना की जानी चाहिए। भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई और पूर्व केंद्रीय मंत्री हंसराज भारद्वाज 21 जुलाई 1986 को राज्यसभा में घोषणा कर चुके हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट की बैंक बनी चाहिए।
भारत का सर्वोच्च न्यायालय और कई उच्च न्यायालय अपने कई फैसलों में कह चुके हैं कि वादकारी को न्याय दरवाजे की सीढ़िया पर मिलना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि देरी से दिया गया न्याय न्याय नहीं होता और अब तो लोग कहने लगे हैं कि जस्टिस डिलेड इस जस्टिस डिस्ट्रॉयड, यानी देरी से दिया गया न्याय विनाशकारी न्याय होता है। भारत के संविधान का आर्टिकल 21 कहता है कि सस्ता और सुलभ न्याय वादकारियों और भारत की जनता का बुनियादी हक है।
जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट बेंच स्थापना के आंदोलन को लेकर आपस में जिक्र होता है तो कई लोग कहते हैं कि यह आंदोलन सिर्फ वकीलों का है जबकि यह बात गलत है। यह आंदोलन वादकारियों को सस्ते, सुलभ और त्वरित न्याय का आंदोलन है। इसमें वकीलों से ज्यादा फायदा जनता का होगा, जिसे अपने दरवाजे पर न्याय मिल सकेगा। आज हालात चीख चीखकर कह रहे हैं कि वर्तमान सत्ता और सरकार जनता को सस्ता और सुलभ न्याय देना ही नही चाहती। वह सिर्फ सत्ता में बने रहने के लिए जनता को गुमराह करने पर उतर आई है। आज जरूरी हो गया है कि वकीलों को इन तमाम तथ्यों को, एक पेंपलेट के माध्यम से जनता के बीच में ले जाना होगा ताकि आम जनता भी सोच समझकर, इस न्यायिक आंदोलन का जमकर दिलो जान से समर्थन कर सके और सरकार पर जोरदार दबाव बनाया जा सके।
अब न्याय विरोधी हालत चीख चीखकर कह रहे हैं कि जनता को सस्ता और सुलभ न्याय देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय आंकड़ों के हिसाब से और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के हिसाब से जजों की नियुक्तियां की जाएं, हाई कोर्ट की बेंच बने, जनता को उसके दरवाजे पर न्याय दिया जाए, मुकदमों के अनुपात में जड़ों की नियुक्तियां हों, मुकदमों के अनुपात में न्यायालय बनें, जजों को मुकदमों की आंधी और दबाव से बचाया जाए, दबाव बनाने के लिए समस्त सरकारी एमएलए, एमपी और मंत्रियों का सामाजिक और राजनीतिक बहिष्कार किया जाए, सारे वादकारियों, किसानों, मजदूरों और आम जनता, बुद्धिजीवियों, लेखकों, साहित्यकारों और कवियों को इस आंदोलन से जोड़ा जाए और पंपलेट और पर्चों में अपनी मांगे और ये तमाम आंकड़े लिखकर, उनके बीच ले जाये जाएं, ताकि आम जनता समेत उन सबको पता चल सके और इन तमाम तथ्यों को जान समझ कर, वे इस सस्ते और सुलभ न्याय के एतिहासिक और लंबे संघर्ष में वकीलों का जी जान से समर्थन कर सके। हम तो यही कहेंगे,,,,
तसल्लियों के इतने साल बाद अपने हाल पर
निगाह डाल सोच और सोच कर सवाल कर
किधर गए वो वायदे सुखों के ख्वाब क्या हुए
तुझे था जिनका इंतजार वो जवाब क्या हुए?
तू इनकी झूठी बात पर न और एतबार कर
कि तुझको सांस सांस का के हमको सांस सांस के
सही हिसाब चाहिएं सही हिसाब चाहिएं।
घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए
जवाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए।
और
सारे के सारे ताने-बाने को बदलो
पूरे के पूरे इंकलाब की बात करो,
हारे थके झूठे और आधे अधूरे नहीं
सस्ते और सुलभ न्याय की बात करो।
