लघु कथा
साथ चलना है
डॉ रीटा अरोड़ा
“आजकल तुम्हारी बातें बदल गई हैं,” पति ने कहा।
पत्नी ने चाय का कप मेज़ पर रखते हुए पूछा-“बातें बदली हैं या तुम्हें अब सुनाई देने लगी हैं?”
पति थोड़ा चौंका-“मतलब?”
“पहले मैं टाल देती थी। अब कह देती हूँ।”
“हर बात कहना जरूरी है?”
“हर बात दबाना भी तो जरूरी नहीं।”
“तुम्हें लगता है मैं तुम्हें रोकता हूँ?”
“रोकते नहीं… लेकिन चाहते हो कि मेरी उड़ान की दिशा तुम तय करो।”
पति चुप रहा।
पत्नी ने कहा-“तुम्हें मेरी नौकरी पसंद है।”
“हाँ।”
“मेरी तरक्की भी?”
“हाँ।”
“मेरी कमाई?”
“बिल्कुल।”
“फिर मेरे फैसले?”
पति ने नज़रें फेर लीं-“घर में कुछ बातों का तरीका होता है।”
पत्नी मुस्कराई-“तरीका या परंपरा?”
“दोनों में फर्क है?”
“है। तरीका साथ लेकर चलता है, परंपरा कभी-कभी पीछे खड़ा कर देती है।”
पति ने धीमे स्वर में कहा-“मुझे डर है, कहीं तुम बहुत दूर न निकल जाओ।”
पत्नी ने उसकी आँखों में देखा-
“मैं दूर नहीं जाना चाहती।
बस वहीं खड़ी भी नहीं रह सकती, जहाँ मुझे छोटा करके रखा जाए।”
“तो तुम्हें मुझसे बराबरी चाहिए?”
“नहीं।”
“फिर?”
“साझेदारी।”
“क्या फर्क है?”
“बराबरी में गिनती होती है… साझेदारी में सम्मान।”
कुछ पल दोनों चुप रहे।
पति ने पूछा-“और अगर समाज इसे स्वीकार न करे?”
पत्नी ने कहा-
“समाज धीरे बदलता है।
लेकिन घर तो आज से बदल सकता है।”
पति ने धीमे स्वर में पूछा-“और अगर मैं तुम्हारे साथ चलना सीख ही न पाया तो?”
पत्नी कुछ क्षण चुप रही।
फिर बोली-
“तो मैं रुकूँगी नहीं।”
पति ने उसकी ओर देखा।
“मतलब?”
“साथ की इच्छा है… सहारे की मजबूरी नहीं।”
पति के चेहरे पर गंभीरता उतर आई।
पत्नी ने धीरे से कहा-
“रिश्ता तब सुंदर होता है, जब दो लोग एक-दूसरे को छोटा किए बिना साथ चलें।”
“और अगर रास्ते अलग हो जाएँ?”
वह मुस्कराई-
“रास्ते अक्सर अलग नहीं होते…
कदमों की रफ़्तार अलग हो जाती है।”
पति चुप रहा।
पत्नी ने आख़िरी बात कही-
“मैं तुम्हें पीछे छोड़ना नहीं चाहती…
बस अपने कदम रोकना भी नहीं चाहती।”
