क्यों जाट या गुर्जर ही होते हैं DUSU के President?

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) का परिणाम कल आया। पिछले दिनों हुए जेन जी समेत तमाम आंदोलनों को इस परिणाम ने बेमानी साबित कर दिया। इस परिणाम का वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह ने अपने फेसबुक व़ॉल पर विश्लेषण किया है। आपकी सहमति, असहमति हो सकती है। आप भी पढ़िए- संपादक

क्यों जाट या गुर्जर ही होते हैं DUSU के President?

शीतल पी सिंह

दिल्ली विश्वविद्यालय पूरे भारत का विश्वविद्यालय है। देश के लगभग हर राज्य से बच्चे यहां पढ़ने आते हैं। SC, ST और OBC विद्यार्थियों की भी बड़ी संख्या है। फिर 2010-11 से 2025-26 तक DUSU का हर चुना हुआ President जाट या गुर्जर ही क्यों रहा? 2026 में भी जीत ABVP के जाट उम्मीदवार यश डबास की हुई।इसके पहले महिला उम्मीदवारों को कई चुनावों में विजयी होने का सफल फ़ार्मूला माना गया था ।
इसका जवाब केवल जाति में नहीं, जाति + भूगोल + स्थानीय network + पैसा + logistics में शायद ज्यादा छिपा है।
दिल्ली और आसपास के NCR के ग्रामीण इलाकों में जाट-गुर्जर ऐतिहासिक रूप से प्रभावशाली land-owning communities रहे हैं। स्थानीय होने का मतलब है—घर और गांव पास, बिरादरी का network, पुराने छात्र नेताओं से संपर्क, समर्थक जुटाने की क्षमता और चुनाव के दिन गाड़ियों तथा manpower की आसान उपलब्धता।
यह सिर्फ़ संयोग नहीं है कि उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय लड़कर जीते “शौकीन”(जाट समाज के)अध्यक्ष पद पर अपने मूल संगठन NSUI से चुनाव लड़ने को तैयार ही नहीं हुए क्योंकि वहां ABVP से जाट समुदाय का उम्मीदवार मैदान में था । कांग्रेस सांसद दीपेंद्र हुड्डा इस बार युनिवर्सिटी में दिखे तक नहीं जबकि पिछले चुनावों में रोड शो तक करते मिलते रहे थे!
DUSU किसी एक campus का चुनाव नहीं है। कॉलेज पूरी दिल्ली में फैले हैं। इसलिए logistics अपने आप बड़ी चुनावी ताकत बन जाती है।
इस बार तो luxury cars के cavalcades, बिना नंबर वाली गाड़ियों, हिंसा और हथियारों की शिकायतें दिल्ली हाईकोर्ट तक पहुंचीं। पुलिस ने 49 वाहन impound और 5,400 से ज्यादा challans की जानकारी दी। दूसरी तरफ Lyngdoh guidelines में उम्मीदवार के खर्च की सीमा केवल ₹5,000 है!
इसलिए सवाल पांच हजार रुपये का नहीं, उम्मीदवार के चारों तरफ मौजूद पूरे campaign ecosystem का है—गाड़ी समर्थक की, पेट्रोल किसी और का, भीड़ बिरादरी की, व्यवस्था शुभचिंतकों की—तो वास्तविक चुनावी खर्च कितना है?
एक चक्र बन गया है—
स्थानीय network → बेहतर logistics → visibility → party ticket → जीत → अगली बार उसी समुदाय को फिर “winnable” मानना।
लेकिन 2026 में NSUI ने इस pattern को तोड़कर राजस्थान के आदिवासी छात्र विजय शंकर मीणा को President उम्मीदवार बनाया।
और नतीजा चौंकाने वाला रहा।
2025 में President पद पर ABVP ने NSUI को 16,196 वोटों से हराया था। इस बार अंतर केवल 2,053 रह गया।
यश डबास — 24,576
विजय शंकर मीणा — 22,523
यानी President पद का gap एक साल में करीब 87% घट गया।
इसे दिल्ली की राजनीति के साथ रखिए।
केंद्र में BJP सरकार। दिल्ली में BJP सरकार। MCD का राजनीतिक नेतृत्व BJP के पास। विधानसभा में BJP के 48 विधायक।
AAP के 22 विधायक और Leader of Opposition भी उसी की।
और कांग्रेस?
एक भी विधायक नहीं।
फिर भी कांग्रेस की NSUI President पद पर ABVP से केवल 2,053 वोट पीछे है। कई राउंड में आगे चल रही थी ।
और सबसे बड़ा विरोधाभास AAP है। लगातार तीन बार दिल्ली में सरकार बनाने वाली पार्टी DUSU में लगभग गायब रही। 2015 की हार के बाद उसकी छात्र इकाई CYSS कई चुनावों से दूर रही। इस बार उसके नए बने संगठन ASAP के President उम्मीदवार को केवल 1,388 वोट मिले।
यह बताता है कि DUSU की राजनीति दिल्ली की सामान्य राजनीति से बिल्कुल अलग ecosystem है।
यहां सवाल उस structure का है जिसमें स्थानीयता, बिरादरी, social capital, पैसा, गाड़ियां, manpower और दशकों पुराना संगठन किसी उम्मीदवार को दूसरों से बेहतर starting position दे सकता है।ज़ाहिर है इसमें किसके पास पुलिस है ,प्रशासन है ,उसका क्या कहाँ फ़र्क़ पड़ता है इसका आंकलन मुश्किल है ।
Delhi University पूरे भारत की University है, क्या उसका छात्र लोकतंत्र भी पूरे भारत की सामाजिक विविधता को प्रतिबिंबित करता है?

शीतल पी सिंह के फेसबुक वॉल से साभार

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