जसवीर त्यागी की कुछ कविताएं
जन्म
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एक दिन पेड़ से
किसी पत्ते-सा टूटकर
धरा पर गिरूँगा मैं
समय सोख लेगा
बची-कुची हरीतिमा भी
डाल से टूटे हुए पत्ते को
हवा उठा लेगी अपनी गोद में
और ले जाकर छोड़ देगी
किसी निर्जन स्थान पर
अज्ञात में पड़ा-पड़ा पत्ता
अकेलेपन के प्रहार से टूटेगा कई बार
फिर उड़ता हुआ कोई पंछी
आयेगा किसी दिन
उठा लेगा टूटे पात को अपनी चोंच में
ले जायेगा किसी हरे भरे पेड़ की डाल पर
बनायेगा अपने अजन्मे शिशुओं के लिए
एक घरौंदा
इस तरह
नवजात शिशुओं के जन्म के साथ-साथ
जन्म लेगा
डाल से टूटा हुआ पत्ता भी एक बार।
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छोटा पेड़
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मैं छोटा पेड़ हूँ
छोटे पेड़ के सम्मुख
चुनौतियाँ बड़ी होती हैं।
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पेड़ एक, शाखाएं अनेक
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एक बीज अंकुरित हुआ
विकसित हुआ नन्हा पौधा
धीरे-धीरे
पानी हवा और धूप के स्नेहिल-स्पर्श से
मुस्कुराता पेड़ बन गया
अडिग तना एक
शाखाएँ अनेक
दूर से हरा-भरा
फूल-फल से लदा
लहराता झूमता-गाता पेड़ दिखता एक
नज़दीक जाने पर
साफ-साफ दिखती
मजबूत तने वाले पेड़ की
अलग-अलग दिशाओं की ओर
मुँह उठाती हुईं
हरी-भरी शाखाएँ अनेक।
पेड़
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घर में एक पुराना पेड़ है
जिसे माँ ने लगाया था कभी
जब ब्याहकर आयी थी नये घर में
माँ को संसार से गये सालों हो गये हैं
आज भी हरा-भरा है पेड़
नयी आँखों में
बदरंग दिखता है पुराना पेड़
घर में चर्चा है जोरों पर आजकल
पेड़ कट जाये तो
चार दुकानें निकल आयेंगी आराम से
फालतू के परिंदे आकर
शोर-शराबा करते हैं सुबह-शाम
कुछेक ने तो अपने
घोसलें भी बना लिए हैं
जब तक रहेगा पेड़
पंछी आकर
घर की शांति भंग करते रहेंगे
दुकानें होंगी तो
नये-नये ग्राहक आया करेंगे
चकाचौंध से सराबोर होगा घर
चहलपहल की चाँदनी
चमकेगी अगल-बगल
माँ अब
कौन-सा दुनिया में आने वाली है
जो आकर पूछेगी
कहाँ है मेरा लगाया हुआ पेड़?
|| पेड़-पौधे||
–
आदमी भूखा था
पेड़-पौधों ने अन्न दिया
आदमी ठंड बरसात में
सिकुड़ता था कछुआ बनकर
पेड़-पौधों ने वस्त्र दिये तन ढ़ापने को
आदमी फिरता था दर-दर
खानाबदोश बनकर
पेड़-पौधों ने
बनाया आशियाना
धीरे-धीरे आदमी
दरख्तों से दरकिनार हो गया
और देखते ही देखते
एक गिद्ध
उसके कंधों पर सवार हो गया।
