आखिर सत्ता Gen Z से घबराती क्यों है?

आखिर सत्ता Gen Z से घबराती क्यों है?

धर्मेन्द्र आज़ाद

 

नई पीढ़ी—Gen Z और Gen Alpha—से उन राजनीतिक पार्टियों को असहजता क्यों होती है, जो देश और सत्ता को अपनी बपौती समझने लगती हैं?

शायद इसलिए नहीं कि नई पीढ़ी रील देखती है, सेल्फी लेती है और अपनी दुनिया में मस्त रहती है। बल्कि इसलिए कि वे सवाल पूछते हैं, जवाबदेही मांगते हैं और जरूरत पड़ने पर तनकर खड़े भी हो जाते हैं।

जहाँ पुरानी पीढ़ी के एक बड़े हिस्से के लिए सूचना का मुख्य स्रोत आज भी सुनी-सुनाई बातें, टीवी न्यूज़ और WhatsApp हैं। चैनल पर कुछ दिखा, WhatsApp पर कोई संदेश आया—मान लिया और आगे बढ़ गए।

वहीं नई पीढ़ी का सूचना संसार अलग है।

वह YouTube देखती है, AI से पूछती है, अलग-अलग स्रोत तलाशती है, पुराने वीडियो निकालती है, डेटा देखती है और सबसे महत्वपूर्ण—दावे को सवाल की कसौटी पर कसती है।

जब टीवी पर कहा जाता है —
“2014 से पहले दुनिया भारत को जानती ही नहीं थी।”
नई पीढ़ी पूछती है—“स्रोत क्या है?”

जब सरकारी विज्ञापनों में कहा जाता है —
“सबसे ज्यादा विकास पिछले दशक में हुआ।”
उधर से सवाल आता है—“किन आँकड़ों के आधार पर?”

जब नेताओं के भाषणों में कहा जाता है—
“दुनिया में भारत का डंका बज रहा है।”
अगला सवाल—“किस पैमाने पर? और तुलना किससे?”

“दिमाग़ी नक्सल”, “नाराज फूफा“ जैसे तमग़ों पर वे मीम बनाने लगते हैं, इनको हवा में उछालकर फ़ुटबॉल खेलने लगते हैं।

यही फर्क असली है।

अंधभक्ति के लिए सबसे सुविधाजनक नागरिक वह है जो सिर्फ सुनता है। लोकतंत्र के लिए सबसे जरूरी नागरिक वह है जो सुनकर पूछता है—‘क्यों? कब? कैसे?

शायद इसलिए असली असहजता नई पीढ़ी की हरकतों से नहीं, उसकी सवाल पूछने की आदत से है।

क्योंकि सवाल पूछने वाली पीढ़ी को सिर्फ भाषण देकर समझाना मुश्किल होता है। उसे जवाब चाहिए, सबूत चाहिए और जवाबदेही चाहिए।

जिस दिन कोई भी सत्ता खुद को जनता से ऊपर समझने लगे, उसी दिन सवाल पूछने वाली जनता उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है।

नई पीढ़ी की यह जागरूकता लोकतंत्र को मजबूत बनाने, उसे असल लोकतंत्र की ओर ले जाने और समाज में आमूल-चूल परिवर्तन का माहौल तैयार करने की दिशा में एक उम्मीद जरूर बनती है।

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