युवाओं का भविष्य चौपट करने के बाद शिगूफेबाजी का मास्टर स्ट्रोक

व्यंग्य

युवाओं का भविष्य चौपट करने के बाद शिगूफेबाजी का मास्टर स्ट्रोक

बादल सरोज

खबर यह है कि अब एयरफोर्स के जहाज परीक्षा के पर्चे लेकर जाया करेंगे। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुझाव पर, शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के अनुरोध पर, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपनी मुंडी हिलाकर, वायुसेना के विमानों के इस्तेमाल को मंजूरी दे दी है।

इसे छोटी-मोटी बात मत समझिये — जो सरकार अपनी हवाई सेना के विमानों को इतना सहेज कर रखती है कि उसने आतंकी हमला होने की आशंका के खुद अपने राज्यपाल के खुफिया फीडबैक पर स्वयं अपनी सीआरपीएफ द्वारा अपने ही जवानों को ले जाने के लिए बार-बार विमान मांगे जाने के बाद भी ठोककर इंकार कर दिया और 14फरवरी 2019 को पुलवामा हो जाने दिया, चालीस से अधिक जवान मौत के मुंह में चले गए, मगर एयरफ़ोर्स की पवित्रता खंडित नहीं होने दी।

जो मोदी जी 2002 के दंगों के समय अहमदाबाद हवाई अड्डे पर पहुंची सेना के शहर में दाखिल होकर दंगा रोकने में मदद के काम के लिए ट्रक तक मुहैया नहीं कर पाए — वे अब अपने युद्धक विमान नीट परीक्षा के पर्चे ढोने के काम में लगा रहे हैं। यह कोई कम बात है क्या? आखिर जो करना जानते हैं, वही तो करेंगे ना!! शिगूफेबाजी और अगले ही दिन भुला दी जाने वाली मीडिया हैडलाइन्स बनाना भर आता है, सो वही कर रहे हैं। यह उसी शिगूफेबाजी का मास्टरस्ट्रोक है, जिसमें मोदी और उनकी सरकार हैडमास्टरी हासिल कर चुकी है।

बड़े से बड़े कांड के बाद ध्यान भटकाने के लिए कोई सुर्रा छोड़ना और असली हादसे को भुला देना इस कुनबे की आजमाई हुई अदा है। बात मणिपुर की होगी, तो इन्हें अयोध्या याद आयेगी, सवाल अयोध्या घोटाले पर उठेंगे, तो ये जय जगन्नाथ करते ओडिशा में पाए जायेंगे । इधर देश परीक्षा में बार-बार हो रहे घोटालों और प्रश्नपत्रों के सार्वजनिक हो जाने से स्तब्ध और परेशान है। हरेक युवा चाहता है और ठीक चाहता है कि नाकारा, गालबजाऊ और अयोग्य शिक्षा मंत्री को तत्काल बर्खास्त किया जाए, एक के बाद एक घट रहे इन कांडों के जिम्मेदारों के खिलाफ उदाहरण योग्य कार्यवाही की जाए, पीड़ितों को इन्साफ के साथ-साथ राहत भी दी जाए, आइंदा ऐसा कुछ नहीं होगा, इसकी गारंटी दी जाए।

ऐसा कुछ भी करने की बजाय हर छमाही में ‘परीक्षा पर चर्चा’ कर युवाओं को पास होने के गुर सिखाने वाले मोदी जी, भले इतने बड़े कांड पर अब तक एक भी शब्द नहीं बोले, उनकी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वस्त किया है कि प्रधानमंत्री स्वयं इस मामले की व्यक्तिगत रूप से निगरानी और समीक्षा कर रहे हैं, ताकि परीक्षा प्रणाली में कोई चूक न हो। इसी के बाद यह नया शिगूफा आ गया।

उनका दावा है कि हवाई सेना से पेपर बिना किसी मनुष्य का हाथ लगे सीधे परीक्षा केंद्र पहुंचेंगे — ताज्जुब नहीं कि कल को यह भी कह दिया जाए कि उन्हें पैराशूट से सीधे प्रतियोगी छात्र-छात्रा की टेबल पर ही पहुंचाया जाएगा । मीडिया उनका है, आइटी सेल उनका है, अफवाह फैलाने में सिद्घहस्त नेकरिया पलटन उनकी है — किसकी मजाल जो उनकी बात काटे।

जख्मों पर नमक छिडक़ने की यह मोदीगिरी उस वक्त दिखाई जा रही है, जब अकेले 2026 नीट के पेपर के लीक होने से देशभर के 22 लाख से अधिक छात्र और उनके परिवार, इस प्रकार कम से कम एक करोड़ भारतीय सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है — 2024 में भी यही नीट-यूजीसी की परीक्षा, इसी तरह के कांड की शिकार हुई थी। ऐन मौके पर परीक्षा रद्द किये जाने का असर, इसमें भाग लेने वाले छात्र-छात्राओं पर क्या पड़ता है, यह वही लोग समझ सकते हैं, जिन्होंने कभी परीक्षाएं दी हों। मौजूदा हुक्मरान कभी इस झंझट में पड़े ही नहीं, इसलिए उन्हें इस पीड़ा से लेना-देना क्या?

मोदी सरकार में पेपर लीक होना और परीक्षाओं का निरस्त होना अब कभी-कभार होने वाला हादसा नहीं है, यह नियमित रूप से आने वाली आफत है। तथ्य बताते हैं कि इनके राज में वर्ष 2014 से लेकर मई 2026 तक देश में कुल 93 पेपर लीक के मामले दर्ज हुए हैं। इनसे देश के लगभग 6 करोड़ से अधिक युवाओं का भविष्य और उनकी मेहनत प्रभावित हुई है। उनके परिजनों को जोड़ लें, तो कोई 30 करोड़ लोगों पर आफत आई है — पर्चा लीक महामारी की शक्ल ले चुका है।

इनसे सिर्फ केन्द्रीय स्तर की परीक्षाओं की ही खाट खड़ी नहीं हुई है, प्रदेशों में होने वाली परीक्षाओं की भी वाट लगी हुई है। उत्तर प्रदेश में सिपाही भर्ती, आरओ और एआरओ तथा शिक्षकों की भर्ती में यही सब हुआ। राजस्थान में सब-इंस्पेक्टर तथा कनिष्ठ अभियंता भर्ती में भी इसे दोहराया गया। मोदी जिसे अपना बताते हैं, उस गुजरात में पुलिस भर्ती और अन्य कुछ परीक्षाओं में इसी तरह के घोटाले हुए।

यह सिर्फ संयोग नहीं है कि राज्य-स्तरीय सरकारी भर्तियों और बोर्ड परीक्षाओं में पेपर लीक और ऐसे ही घोटालों के सबसे ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे उन्हीं राज्यों से सामने आए, जिनमें भाजपा की सरकारें हैं। मध्यप्रदेश तो पहले से ही इन सबका मॉडल प्रस्तुत कर चुका था और ऐसे घोटालों के लिए व्यापमं का पर्यायवाची शब्द गढ़ कर हिंदी भाषा के व्याकरण में नयी संज्ञा और संबोधन जोड़ चुका है।

इनकी जद अब बढ़ रही है। प्रतियोगी परीक्षाओं से भी नीचे खिसकते हुए अब इसने स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की जान भी सांसत में डाली हुई है। इस वर्ष सीबीएसई की उत्तर पुस्तिकाओं के जांचे जाने का जो घोटाला हुआ है, वह कम चौंकाने वाला नहीं है। परिणाम में भारी गड़बड़ी, कॉपियों के बदलने, कॉपियों के पन्ने गायब होने और अंकों की गलत गणना की ढेरों शिकायतें सामने आई हैं।

शिकायतें कितनी अधिक हैं, इसे पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन करने वाले विद्यार्थियों की संख्या से समझा जा सकता है — कुल परीक्षार्थियों के करीब एक चौथाई, 4 लाख से अधिक छात्रों ने फिर से जांचे जाने के आवेदन लगाए हैं। कॉपियों की स्कैनिंग और मूल्यांकन का जिम्मा संभालने वाली कंपनी कोएम्प्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं। इसके अलावा लगभग सभी 20 लाख छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं की गोपनीयता और डेटा के प्रभावित होने के आरोप लगे हैं।

सीबीएसई की परीक्षा में कुल 17 लाख 68 हजार 968 छात्र-छात्राओं के हिसाब से जोड़ लगाएं, तो इससे सीधे प्रभावित होने वाले भारतीय भी एक करोड़ से कम नहीं होंगे। सीबीएसई का यह कांड हर चीज के डिजिटलीकरण की उस अंधाधुंध जुनूनी मुहिम का परिणाम है, जिसे देश-काल की वास्तविकताओं की रत्तीभर भी परवाह किये बिना यत्र-तत्र-सर्वत्र थोपा जा रहा है।

ग्रामीण रोजगार गारंटी क़ानून के तहत काम और भुगतान से लेकर निर्माण मजदूरों की योजनाओं तक में यह तुगलकी कारनामा इसी तरह के असर दिखाने के बाद भी जारी है । सीबीएसई में तो स्कैनिंग के नाम पर उत्तर पुस्तिकाएं तक बदलने की घटनाएं देखने में आयीं हैं।

ध्यान रहे, यह उस समय हो रहा है, जब रोजगार का संकट अब तक के सबसे चरम पर है ; अपनी नीतियों से जन्मी इस रोजगारहीनता के लिए शर्मिन्दा होने की बजाय हुक्मरान और उनके पैरोकार, बेरोजगारों को तिलचट्टा बता कर लांछित और अपमानित कर रहे हैं। यह सब उस देश में हो रहा है, जिसमें दुनिया के सबसे अधिक युवा नागरिक रहते हैं।

स्वाभाविक ही है, इस सबके चलते युवाओं के बीच हताशा पसर रही है, जिंदगी और समाज दोनों के प्रति उचाट पनप रहा है । नीट परीक्षा रद्द होने के बाद सीकर राजस्थान के 22 वर्ष के प्रदीप मेघवाल ने आत्महत्या कर ली, वह कर्जा लेकर पढ़ाई की तैयारी कर रहा था।

लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश के 21 वर्षीय ऋतिक मिश्रा का यह तीसरा प्रयास था। परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद जब पेपर लीक के कारण परीक्षा रद्द होने की सूचना आई, अपनी जान दे दी। आजादपुर, दिल्ली की 20 वर्षीया अंशिका पांडे पिछले साल महज 4 नंबरों से रह गई थी।

इस साल तीसरे प्रयास में उसे बेहतर उम्मीद थी — परीक्षा रद्द होने के बाद अवसाद में उसने भी आत्मघाती कदम उठा लिया। पणजी गोवा के मात्र 17 वर्ष के सिद्धार्थ दत्तात्रेय हेगड़े ने भविष्य की अनिश्चितता से टूटकर आत्महत्या कर ली। पुलिस को उसका सुसाइड नोट भी मिला है। ये अलग-थलग घटी घटनाएं नहीं है — एक चिंताजनक सिलसिले का हिस्सा हैं। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो – एनसीआरबी – की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारत में शैक्षणिक और कैरियर के दबाव के चलते छात्र आत्महत्याओं का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2024 में देश में रिकॉर्ड 14,488 छात्रों ने आत्महत्या की, जो अब तक की सबसे बड़ी संख्या है।

युवा पीढ़ी का रोम नहीं, उसके भविष्य का रोम-रोम जला कर नीरो बांसुरी बजा रहा है और कारपोरेट विषधरों का मन बहलाने, उनके धंधे का फलक बढ़ाने, मुनाफे के पहाड़ और ऊंचाई तक पहुंचाने के लिए, दुनिया भर में जा जाकर नाच-गा रहा है, मेलोडी खिला रहा है। बाकी सब भी उसी के बेसुरे राग में सुर मिला रहे हैं। परीक्षाएं कराने के लिए बिठाया गया निकम्मा एनटीए – नेशनल टेस्टिंग एजेंसी – किसी भी जांच-परख से परे एक ऐसा स्वायत्तशासी संस्थान है, जो किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं है।

नवंबर 2017 में इसकी स्थापना देश के उच्च शिक्षण संस्थानों और भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता, निष्पक्षता और अंतर्राष्ट्रीय मानक लाने के नाम पर की गई थी। यह काम इसने किस तरह किया, यह देश भर को पता है। इसकी गवर्निंग बॉडी के अध्यक्ष, महानिदेशक और अन्य प्रमुख निदेशकों की नियुक्ति भारत सरकार के केंद्रीय मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति द्वारा की जाती है ; इसलिए समझा जा सकता है कि कौन हैं ये लोग और कहां से आते हैं। इसके चेहरे पर भी शर्म नहीं है — वह मजाक-सा उड़ाते हुए कह रहा है कि पेपर लीक नहीं हुआ है, उसके सवाल लीक हुए हैं।

अक्षम और नाकारा शिक्षा मंत्री इसके लिए विपक्षी राजनीतिक पार्टियों को कोस रहा है। गोदी मीडिया झुनझुने बजाकर मुद्दे को दबाने में नाकामयाब रहने के बाद, ऑनलाइन शिक्षकों के प्रति गाली-गलौज करने पर आ गया है। सरकारी दूरदर्शन का संघी एंकर तो पीड़ित छात्रों को ही देशद्रोही और पाकिस्तानी बताने तक चला गया है। ऐसे में प्रधानमंत्री भला कैसे पीछे रह सकते हैं? पीडि़त छात्रों, प्रतियोगी युवाओं और उनके परिजनों का गला सुखा देने के बाद वे अपनी कैबिनेट की मीटिंग में मंत्रियों को पानी पीकर हरा भरा, जल भरा हाइड्रेट रहना सिखा रहे हैं।

मौजूदा निजाम की खासियत यह है कि यहां किसी को किसी बात का डर नहीं है, उन्हें पता है कि वे कुछ भी कर लें, नया-पुराना कैसा भी क़ानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। लगातार पर्चों के लीक हो जाने से उभर रहे विक्षोभ को शांत करने के लिए 2024 में धूमधाम से सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 लागू किया है। दावा किया गया कि इस कानून के तहत पेपर लीक करने या नकल कराने वाले दोषियों को 3 से 10 साल तक की जेल होगी तथा 1 करोड़ रुपये तक का जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

झांसा दिया गया कि अब तो लीक-वीक खत्म ही समझो!! हुआ क्या? इस क़ानून के तहत की गई कुल कार्यवाहियों, मामलों की संख्या, या गिरफ्तारियों का कोई आधिकारिक केंद्रीय डेटा सरकार या संसद द्वारा सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसकी वजह भी है — अपनों के खिलाफ भी कोई कार्यवाही करता है भला? इस नीट घोटाले में जितने भी नाम आये, वे सभी सीधे या आड़े कुनबे से ही जुड़े निकले हैं।

सीबीआई ने नीट यूजी 2026 पेपर लीक के मामले में पुणे की प्रोफेसर मनीषा मंधारे को गिरफ्तार किया है। वे मॉडर्न कॉलेज पुणे की बॉटनी प्रोफेसर हैं। ये वही मॉडर्न कॉलेज है, जिसका खुला आरएसएस कनेक्शन है। समस्त हिंदू अघाड़ी वाले मिलिंद एकबोटे से सीधा रिश्ता है, उनके भाई गजानन एकबोटे इसके चेयरमैन हैं। प्रिंसिपल डॉ. निवेदिता एकबोटे भाजपा युवा मोर्चा की वाइस प्रेसिडेंट हैं। ये लोग पक्के वाले सनातनी भी हैं — पिछले साल इसी कॉलेज ने दलित छात्र प्रेम बिरहाड़े को ब्रिटेन में जॉब के लिए क्लियरेंस देने में देरी की, जिसकी वजह से उनका जॉब चला गया था।

नीट लीक मामले में सीबीआई ने और भी कई लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनमें राजस्थान के दिनेश बिवल (भाजपा और भाजयुमो से जुड़े बताए जा रहे हैं) शामिल हैं। इसके पहले राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश में हुए घोटालों में जांच एजेंसियों ने जिन-जिन की भी पूंछ उठाई, उन्हें संघी या भाजपाई पाया। कुनबे के ही भाई-बहिन हैं, इसलिए निश्चिन्त हैं कि उनका कुछ नहीं बिगड़ सकता। मध्यप्रदेश के व्यापमं घोटाले में कॉल रिकॉर्ड सहित सारे सबूत होने के बाद भी किसी पर आंच नहीं आई।

गवाहों और संभावित सबूतों से जुड़े 50 लोगों की संदिग्ध मौत के मामले भी दबे ही रह गए। इसी के साथ एक बड़ा गोरख-धंधा कोचिंग उद्योग का है — लाखों रुपये की फीस लेने वाले कोचिंग माफिया की लिप्तता व्यावसायिक भी है, आपराधिक तो है ही। इसकी कीमत मध्यमवर्गी अभिभावक चुकाते हैं और सारा बोझ और दवाब छात्र-छात्राओं को झेलना पड़ता है।

जब तंत्र पूरी तरह विफल हो जाता है, तब काम सेना के हवाले किया जाता है — इस तरह मोदी सरकार ने मान लिया है कि वे परीक्षाएं कराने के लायक भी नहीं हैं। किन्तु इसे सिर्फ शासन या प्रशासन की अक्षमता मानना काफी नहीं होगा — यह एक दुष्ट परियोजना का हिस्सा है। यह परियोजना देश को अज्ञान की अंधेरी कंदरा में सब बिना पढ़े उनके कहार बन कर रह जायेंगे। यह परियोजना उस कुत्सित और संकीर्ण मनुवादी सोच का विस्तार है, जिसने इन दिनों कारपोरेट पूंजी की गोद में बैठकर सत्ता पर कब्जा किया हुआ है।

इसलिए, पेपर लीक हो या शिक्षा पर हमला — यह सिर्फ छात्र-छात्राओं, युवाओं या उनके अभिभावकों भर के लिए चिंता का सबब नहीं है, यह पूरे देश और उसके आगे बढऩे की कामना करने वालों, उसे सभ्य बनाने की कामना करने वालों के लिए, फिक़्र की बात है। लेखक की अपनी निजी राय है।

लेखक  बादल सरोज ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।

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