जसवीर त्यागी की परिवार और कुछ अन्य कविताएं
पुस्तकों की पीड़ा
शीशे की अलमारी में बन्द पुस्तकें उदास हैं
वे खामोशी से देखती हैं
उन्हीं की आँखों के सामने
कोई हड़प रहा है उनका हक़
धीरे-धीरे उन्हें
उपेक्षित और बेदखल किया जा रहा है
उनके घरों से
पुस्तकों की उजास भरी दुनिया में
बढ़ रहा है सघन अंधकार
यह देखकर
पुस्तकों को बहुत चोट लगती है
कभी-कभी
उन्हें गुस्सा भी आता होगा
पर वे जाहिर नहीं करती
और मौन होकर माँओं की तरह
सब सहन करती रहती हैं
वे जानती हैं
मर्यादाओं और अनुशासन के पहरेदार
हर वक़्त उन पर
पैनी निगाह रखते हैं
पुस्तकें अपने लिए
कुछ भव्य या बड़ा नहीं चाहती
बस वे अपने हिस्से का समय
और थोड़ा-सा प्यार माँगती हैं
वे घण्टों-घण्टों,महीनों-महीनों
और कभी-कभी तो
वर्षों तक बाट जोहती रहती हैं
कोई उनके पास आये,बैठे-बतियाये
बिताये कुछ समय उनके साथ भी
जिसे सौंप सके वे
अपने जीवन की संचित अनमोल निधि
वे चाहती हैं मायावी मोबाइल
कुछ देर के लिए
उनके पाठकों को अकेला छोड़ दे
मुक्त कर दें उन्हें
रहस्यमयी और तिलस्मी संसार से
ताकि वे दिल खोलकर
बतिया सके अपनों के संग
साझा कर सकें
पुस्तकों की दुनिया के सुख-दुःख
मोबाइल है कि
इंसान को कभी अकेला छोड़ता नहीं ।
■
अकेला आदमी रूठता नहीं
वे लोग रूठते हैं
जिनके पास मनाने वाले होते हैं
अकेला आदमी रूठता नहीं
रूठे तो किससे?
अकेला आदमी
खुद से भी रूठ नहीं सकता
वह जानता है
जिंदगी पहले से ही रूठी हुई है।
■
|| परिवार ||
बालकनी में बाहर रखे गमलों से
मैंने एक गमला उठाकर
अंदर कमरे में रख लिया
कुछ दिन बाद
उस गमले का पौधा मुरझाने लगा
माँ ने देखा और कहा –
गमले को अकेला नहीं
दूसरे गमलों के साथ रखो
पौधा हो या कोई और
परिवार से बिछुड़कर सूख जाता है।
■
भरोसा
पार्क में सुबह की सैर करते हुए
पेड़ से एक पत्ता टूटकर
मेरे कांधे पर गिरा
पत्ता टिका रहा कांधे पर
मैंने उसे
उसकी इच्छा के विरुद्ध
हटाना मुनासिब नहीं समझा
चाहता हूँ
जब तक यह दुनिया रहे
पत्ते का भरोसा
बना रहे इंसान में।
■
कुछ लोग
संसार में असंख्य लोग हैं
हम जानते हैं
लेकिन हम
असंख्य लोगों को नहीं जानते
असंख्य में से
संख्य को जानते हैं
कुछ लोगों से ही है हमारी दुनिया आबाद
कुछ लोगों को हम
और कुछ हमें करते हैं याद
कुछ से ही है हमारी ख़ुशी
प्रेम-प्यार
कुछ से ही हैं हमारे उत्सव
तीज-त्योहार
कुछ से ही है
हमारी लड़ाई-झगड़ा तकरार
कुछ से ही हमारे सपने हैं
कुछ ही हमारे अपने हैं
कुछ के बीच ही
हम रोते-हँसते हैं
और कहने को तो
असंख्य लोगों की दुनिया में
हम बसते हैं।
■
काम करने वाले
दुनिया में
काम करने वाले भी हैं
और काम न करने वाले भी
काम न करने वाले
काम करने वालों के काम में
अनेक खामियाँ निकालते हैं
काम न करने वालों को
काम न करने के अनेक बहाने चाहिए
और वे काम न करने के पक्ष में
अनेक दलीलें पेश करते हैं
काम करने वाले
चींटियों की तरह चुपचाप
अपने काम में लगे रहते हैं
और इस तरह
काम करने वाले इंसान
एक प्रेरक दुनिया गढ़ते रहते हैं।
■

आपका कविता बहुत अच्छा लगता है सर
प्रणाम सर
सर, आपकी कविताएँ पढ़कर मन को बहुत अच्छा लगा। आपकी रचनाओं में भावनाओं की गहराई, विचारों की सुंदरता और शब्दों का बहुत ही सहज एवं प्रभावशाली प्रयोग देखने को मिलता है। हर कविता अपने भीतर एक अलग भाव और संदेश समेटे हुए है। सर,आपकी लेखनी पाठक को सोचने और महसूस करने के लिए प्रेरित करती है। सचमुच, आपकी कविताएँ बहुत सुंदर, भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी हैं।
हार्दिक आभार सर
शब्दों का चयन और भावों की अभिव्यक्ति, दोनों ही अद्भुत हैं। बहुत सुंदर लिखा है सर
‘पत्ते का भरोसा बना रहे इंसान में’…नि:संदेह पत्ते का भरोसा प्रकृति का भरोसा है। ऐसी कविताओं के लिखे जाने से यह भरोसा निश्चित रूप से बल पाता होगा।
कलात्मकता और सकारात्मकता से परिपूर्ण कविताएँ