महिलावाद की ओट में

महिलावाद की ओट में

रत्ना भदौरिया

 

महिलावाद ने स्त्री को अपनी देह, अपनी इच्छा और अपने निर्णय पर अधिकार माँगने की भाषा दी है। यह अधिकार किसी कृपा का परिणाम नहीं, मनुष्य होने की स्वाभाविक परिणति है। स्त्री चाहे, न चाहे, प्रेम करे, देह-संबंध बनाए या उससे दूर रहे—उसके निर्णय पर पहरा नहीं होना चाहिए। लेकिन स्वतंत्रता का एक मौन अनुशासन भी होता है—वह किसी दूसरे की मनुष्यता को रौंदकर सार्थक नहीं होती।

आज एक विचित्र उलटबाँसी दिखाई देती है। कुछ स्त्रियाँ अपनी कामना को जीने के लिए महिलावाद की भाषा का सहारा लेती हैं। कामना में कोई दोष नहीं; देह की भूख को स्वीकारना भी अपराध नहीं। प्रश्न वहाँ उठता है जहाँ इच्छा को छिपाने के लिए प्रेम का भ्रम रचा जाता है, किसी की भावनाओं को साधन बनाया जाता है और छल को स्वतंत्रता का नाम दे दिया जाता है।

किसी पुरुष को चाहना महिलावाद-विरोधी नहीं है; उसे ठगना भी महिलावाद नहीं है।

किसी संबंध में दो वयस्क अपनी इच्छाओं के साथ प्रवेश करते हैं तो वहाँ नैतिकता का पहला प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि संबंध कितना पारंपरिक है, बल्कि यह कि उसमें सहमति कितनी सच्ची और संवाद कितना ईमानदार है। देह का संबंध हो सकता है, क्षणिक आकर्षण हो सकता है, बिना विवाह का संबंध हो सकता है—लेकिन दूसरे व्यक्ति को उस संबंध की वास्तविकता जानने का अधिकार भी उतना ही है जितना अपने निर्णय का।

सबसे पीड़ादायक बात यह है कि छल कभी अकेला नहीं रहता। उसका धुआँ उन स्त्रियों तक भी पहुँचता है जिन्होंने कोई छल नहीं किया। समाज किसी एक अनुभव को पूरी स्त्री-जाति का चरित्र बना देता है। एक स्त्री की चालाकी का बोझ दूसरी स्त्री की ईमानदारी भी उठाती है। बहाने की चक्की में दोषी के साथ निर्दोष भी पिसता है।

इसलिए स्त्री की मुक्ति को पुरुष-विरोध की मुद्रा में बदलना उसके संघर्ष को छोटा करना है। पितृसत्ता ने स्त्री को वस्तु बनाया था; उसका उत्तर पुरुष को वस्तु बना देना नहीं हो सकता। वस्तुकरण का लिंग बदल देने से वह मानवीय नहीं हो जाता।

महिलावाद का अर्थ यह नहीं कि सदियों से पुरुष के हाथ में रही छूट अब स्त्री के हाथ आ जाए और वही पुरानी प्रवृत्ति नए नाम से चलने लगे। उसका अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा है—स्त्री को वही मनुष्यता मिले जिसमें उसकी इच्छा का सम्मान हो, और जिसमें वह स्वयं भी दूसरे की इच्छा, असहमति और संवेदना का सम्मान करे।

इसलिए पुरुष-भोग की पुरानी स्मृतियों को महिलावाद की ओट में छिपाने की आवश्यकता नहीं। इच्छा को इच्छा कहकर जिया जा सकता है; उसके लिए किसी विचारधारा का मुखौटा क्यों?

स्त्री की स्वतंत्रता का सबसे सुंदर क्षण वह नहीं, जब वह पुरुष से वही कर सके जो कभी पुरुष ने स्त्री के साथ किया था; बल्कि वह है, जब वह उस पुराने अन्याय की नकल करने से भी इंकार कर दे।

क्योंकि मुक्ति सत्ता बदलने का नाम नहीं—संबंधों में मनुष्यता बचाए रखने का नाम है।

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