चोंगथाम विक्रम सिंहः विरासत में मिले संगीत को नफरत ने किया खामोश

चोंगथाम विक्रम सिंहः विरासत में मिले संगीत को नफरत ने किया खामोश

राहुल मिश्रा

गुस्से की आग ने मिटा दिया
घर की दहलीज पर अखबार गिरा था।
उस पन्ने पर छपी खबर इतनी भारी थी कि एक पूरा परिवार उसके नीचे दब सकता था।
मां ने किसी को पुकारा नहीं।
आंखों से एक बूंद पानी नहीं गिरने दिया।
चुपचाप आगे बढ़ीं,
उस अखबार को उठाया,
और घर के एक कोने में छिपा दिया।
ताकि पूजा के आसन पर बैठे बुजुर्ग पिता की नजर उस सुर्खी पर न पड़ जाए।
क्योंकि उस रोज एकादशी थी।
और पिता उपवास में थे।
यह सिर्फ एक हत्या की खबर नहीं है।
यह उस सुर की दास्तान है, जो आधी सदी से एक परिवार के भीतर बह रहा था।
और जिसे दिल्ली की एक रात ने हमेशा के लिए खामोश कर दिया।
उनका नाम था : चोंगथाम विक्रम सिंह।
और उस छियासी साल की मां का नाम : चोंगथाम ओंग्बी कमला देवी।
वही आवाज, जिसे मणिपुर में लोग आधी सदी से ‘मणिपुर की लता मंगेशकर’ कहते आए हैं।

अब शुरू से शुरू करते हैं…
इम्फाल का पुराना मोहल्ला थांगमीबंद। लौरुंग पुरेल लेइकाई।
साल 1972 का था।
मणिपुर के सिनेमा ने पहली बार अपनी जुबान में बोलना सीखा था।
फिल्म बनी थी : मातमगी मणिपुर। राज्य की पहली फीचर फिल्म।
उस फिल्म में इसी मां ने एक लोरी गाई थी : था था थाबुंगटन।
वह लोरी मणिपुर की कई पीढ़ियों की स्मृति का हिस्सा बन गई।
आकाशवाणी इम्फाल के स्टूडियो से जब कमला देवी की तान तैरती, तो घरों के चूल्हे शांत हो जाते थे।
मां ने अपनी आवाज से मणिपुर को पहली लोरी दी थी।
और उसी आंगन में बड़े हुए बेटे ने मणिपुर की नई पीढ़ी को गिटार के तारों से अपनी आवाज दी।
अस्सी के दशक का पूर्वोत्तर।
पहाड़ों की ठंडी हवा और वादियों में सुलगती नौजवानों की बेचैनी।
उस बेचैनी को विक्रम ने अपने गिटार के छह तारों पर बांध दिया।
पहले अल्ट्रा वायर्स और फिर फीनिक्स।
फीनिक्स के साथ विक्रम उस दौर के मणिपुरी रॉक की एक मजबूत पहचान बन गए।
साथी याद करते हैं कि विक्रम कभी मंच के आगे आकर वाहवाही लूटने वालों में नहीं थे।
वे पीछे खड़े होते थे।
धीमे से मुस्कुराते थे।
पर जब उनकी उंगलियां गिटार के तारों पर दौड़ती थीं, तो पूरा हॉल एक ही लय पर सांस लेता था।
फिर दो दशक पहले वे दिल्ली आ गए।
दक्षिण-पूर्व दिल्ली का किलोकरी गांव।
एक छोटा कमरा, जहां दीवारों पर गिटार टंगे थे और संगीत की कक्षाएं चलती थीं।
दिल्ली स्कूल ऑफ म्यूजिक में बच्चों को वेस्टर्न क्लासिकल सिखाना।
और राजस्थान के लोक गायक मामे खान के साथ मिलकर थार के रेगिस्तान के गीतों को रॉक के सुरों से जोड़ना।
इम्फाल की वादियों से आया एक फनकार, दिल्ली की एक संकरी छत के नीचे बैठकर पूरे मुल्क को एक सुर में पिरो रहा था।
पर जिस शहर को उन्होंने अपने जीवन के बीस बरस दिए, उसी शहर की एक रात बहुत बेदर्द निकली।


रविवार, छह सितंबर की रात करीब साढ़े ग्यारह बजे विक्रम घर से नीचे उतरे।
वजह थी : घर के सामने वाले ढाबे का बेहिसाब शोर।
उन्होंने शोर पर आपत्ति जताई।
विवाद हुआ।
एफआईआर के मुताबिक, आरोपियों ने उनका पीछा किया और सीढ़ियों पर उन पर हमला कर दिया।
तीसरी मंजिल पर अपने फ्लैट के दरवाजे पर पहुंचकर वे अपनी मातृभाषा में चीखे :
“थोंग हांगो! थोंग हांगो!”
दरवाजा खोलो।
घर के भीतर उनका बीस साल का बेटा यइफाबा था, जो कानून की पढ़ाई कर रहा है।
दरवाजा खुला।
यइफाबा ने पिता को लहूलुहान देखा।
शोर मचाने पर हमलावर भागे।
बेटा, मां और एक पड़ोसी विक्रम को टैक्सी में लेकर होली फैमिली अस्पताल की तरफ दौड़े।
रास्ते में विक्रम ने बेटे को घटना के बारे में बताया और फिर बेहोश हो गए।
सात सितंबर की सुबह अस्पताल में उन्होंने दम तोड़ दिया।
पुलिस के अनुसार, शुरुआती चिकित्सकीय जांच में अंदरूनी चोटों और अत्यधिक रक्तस्राव को मौत की वजह माना गया।
और इम्फाल के उस घर में वक्त हमेशा के लिए जम गया।
पीटीआई से बात करते हुए छियासी साल की मां ने कहा : “जाने से तीन-चार दिन पहले ही तो उसका संदेश आया था। वह बहुत खुश था। लिख रहा था कि मां, तुम्हारे पोते ने वकालत की सेमेस्टर परीक्षा में बेहतरीन अंक पाए हैं और उसे कॉलेज से सम्मान मिलने वाला है… हम सब उस दिन कितने खुश थे।”
एक पिता, जो दिल्ली के कमरे में बैठकर अपनी मां को अपने बेटे की कामयाबी का संदेश भेजता है।
उसे नहीं मालूम था कि उस संदेश के चार दिन बाद, वही बीस साल का बेटा अपने पिता की पार्थिव देह लेकर इम्फाल के हवाई अड्डे पर उतरेगा।
जब खबर इम्फाल पहुंची, तो पिता के उपवास के कारण बात तुरंत नहीं बताई गई।
अगली सुबह मां ने चुपचाप अखबार छिपा दिया ताकि पिता की नजर न पड़ जाए।
नाश्ते के बाद जब सच धीरे-धीरे खोला गया, तो बुजुर्ग पिता डॉ. चोंगथाम बीरेंद्र सिंह ने कोई विलाप नहीं किया।
वे चुपचाप अपने कमरे में चले गए।
और अन्न का एक भी दाना मुंह में लेने से इनकार कर दिया।
मां ने रुंधे गले से कहा : “उसके जाने के बाद से मेरी भी भूख मर गई है। बस एकाध केला खाकर दिन काट रही हूं।”
जिस मां की लोरी सुनकर पूरा मणिपुर सोता था, आज वही मां अपने घर के सन्नाटे में भूखी बैठी है।
पर इस अंधेरे में भी परिवार ने बदले की कोई बात नहीं की।
भाई टॉमी ने कहा कि हमें पुलिस और प्रशासन से सहयोग मिल रहा है, पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार है।

परिवार ने साफ कहा कि उनकी लड़ाई किसी से नफरत की नहीं, सिर्फ न्याय की है।
इम्फाल में जब विक्रम की चिता को मुखाग्नि दी गई, तो वहां सिर्फ एक शरीर विदा नहीं हो रहा था।
वहां वह बीस साल का बेटा यइफाबा खड़ा था।
उस बेटे की आंखों में पिता को खोने का दर्द था, पर कंधों पर कानून की वह पढ़ाई भी थी जिसे विक्रम अपने आखिरी संदेश में गर्व से याद कर रहे थे।
वह बेटा अब उस सुर की ढाल बन चुका है, जिसे उसके पिता इस दुनिया में छोड़ गए हैं।
शोर की उम्र बहुत छोटी होती है।
सुर की उम्र लंबी होती है।
विक्रम का गिटार अब खामोश है।
लेकिन मां की गाई वह लोरी अब भी हवा में है।
और शायद हमेशा रहेगी।
यहां पर हर दिन एक असली इंसान की असली जिंदगी दर्ज होती है। यहां वो सच लिखे जाते हैं जो तारीखों और मुकदमों की फाइलों के नीचे अक्सर दम तोड़ देते हैं।

राहुल मिश्रा की फेसबुक वॉल से साभार

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