कहीं कुछ अप्रासंगिक तो नहीं?
किस-किस दिमाग़ से नक्सलवाद ख़त्म किया जाएगा?
राजकुमार कुम्भज
इस वक़्त तो देश का बच्चा-बच्चा नक्सल प्रभावित हो रहा है.शिक्षक हैं नहीं,हैं तो पढ़ाते नहीं हैं.पढ़ाते हैं तो मनगढ़ंत पढ़ाते हैं.मनगढ़ंत पढ़ाते हैं,तो ऐसी-ऐसी पाखंडी और झूठी कहानियाॅं पढ़ाते हैं,जिनका संबंध न तो कहीं किसी पाठ्यक्रम से होता है और न कहीं किसी परीक्षा से?
सरकार ख़ुद नहीं चाहती है कि बच्चे स्कूल जाऍं?इसीलिए तक़रीबन एक लाख स्कूल बंद कर दिए गए हैं और जो उपलब्ध हैं,वे पुरातत्व सर्वेक्षण का दर्ज़ा तथा दावा करने तक के क़ाबिल नहीं हैं.अगर ये बच्चे बेक़ाबू हुए बिना बिंदास अंदाज़ में अपनी शिक़ायत लेकर सड़क पर उतर आते हैं,तो सरकार के मुताबिक़ नक्सल-दिमाग़ हुए?
भयंकर भ्रष्टाचार पीड़ित कोई भी नागरिक(अंधे-बहरे शासन-प्रशासन तक)अपना रोष,अपना दुखड़ा,अपना विधिसम्मत कष्ट,हर किसी जगह से निराश होने के बाद,अगर विरोध में विषयोचित चीख़ता-चिल्लाता है,कपड़े फेंक देता है,जूता-स्याही जैसा कुछ फेंक देता है,तो सरकार की नज़र में नक्सली-दिमाग़ है?
ऐसे पहचानहीन बहुतेरे परेशान नागरिक-जन हैं,जिनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है.
इसी पीड़ा के कारण उनका सामान्य जीवन सामान्यत: नारकीय बना हुआ है.
क्या करें ये लोग?कहाॅं जाऍं ये लोग?किसको बताऍं ‘मन की बात’? क्या ये सभी नक्सली कहे जाऍंगे?क्या ये भी नक्सलवाद से प्रभावित हैं?
अगर ऐसा है,तब तो संपूर्ण देश ही नक्सल कहलाएगा.फ़ैसला आपका है.स्वागत रहेगा.
किसी भी देश के नागरिक-जन,सरकार के फ़ैसलों का( असहमत होते हुए भी )स्वागत करने के लिए बाध्य हैं और जो कोई भी विरुद्ध जाता है अथवा विरुद्ध जाने की कोशिश करता है,उसे आसानी से नक्सली-दिमाग़ क़रार दिया जा सकता है.ये असंभव तो नहीं?
किन्तु क्या किसी लोकतांत्रिक-व्यवस्था में इस अवधारणा को मान्य किया जा सकता है?
कहीं कुछ अप्रासंगिक तो नहीं हो रहा है?
