हरियाणवी लोक साहित्य में हरियाली तीज
मनजीत सिंह
हरियाणा की धरती अपनी समृद्ध लोक-संस्कृति, लोकपरंपराओं, लोकगीतों, लोककथाओं और त्योहारों के लिए प्रसिद्ध रही है। यहाँ के लोकजीवन में ऋतुओं और त्योहारों का गहरा संबंध दिखाई देता है। सावन का महीना आते ही हरियाणा के गाँवों में प्रकृति का रूप बदल जाता है। खेतों में हरियाली, पेड़ों पर झूले, आकाश में उमड़ते बादल, रिमझिम बरसात और वातावरण में लोकगीतों की मधुर ध्वनि—ये सब मिलकर जिस लोकपर्व को जीवंत बनाते हैं, वह है हरियाली तीज।
हरियाली तीज केवल धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह हरियाणवी लोकजीवन में स्त्री-संवेदना, प्रकृति-प्रेम, पारिवारिक संबंधों, सामाजिक मेल-जोल और लोक-अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम है। हरियाणवी लोक साहित्य में तीज का स्थान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके माध्यम से ग्रामीण समाज विशेषकर महिलाओं ने अपने सुख-दुःख, इच्छाओं, आशाओं, विरह, प्रेम और हास-परिहास को लोकगीतों के रूप में अभिव्यक्त किया है।
हरियाली तीज का सांस्कृतिक स्वरूप
हरियाली तीज सावन मास में मनाई जाती है। वर्षा ऋतु के आगमन के साथ धरती पर हरियाली छा जाती है। पेड़-पौधे नए पत्तों से भर जाते हैं और वातावरण में एक नई ताजगी दिखाई देती है। हरियाणा जैसे कृषि प्रधान प्रदेश में वर्षा और हरियाली का विशेष महत्व है। किसान के लिए सावन केवल मौसम परिवर्तन नहीं, बल्कि कृषि जीवन में नई उम्मीद का संदेश लेकर आता है।
इसी प्राकृतिक परिवेश में तीज का उत्सव महिलाओं के लिए विशेष आनंद का अवसर बनता है। गाँवों में पेड़ों पर झूले डाले जाते हैं। महिलाएँ और युवतियाँ सज-धजकर झूला झूलती हैं तथा सामूहिक रूप से तीज के गीत गाती हैं। कई स्थानों पर घरों में विशेष पकवान बनाए जाते हैं और बेटियों को मायके बुलाने की परंपरा निभाई जाती है।
इस प्रकार तीज प्रकृति, परिवार और समाज को जोड़ने वाला पर्व बन जाती है।
हरियाणवी लोक साहित्य और तीज
लोक साहित्य किसी समाज की सामूहिक स्मृति और अनुभवों का साहित्य होता है। हरियाणवी लोक साहित्य में लोकगीतों का विशेष स्थान है। लिखित साहित्य के विपरीत लोकगीत लंबे समय तक मौखिक परंपरा से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचते रहे हैं।
तीज के गीतों में हरियाणवी समाज की जीवन-पद्धति स्पष्ट दिखाई देती है। इन गीतों को मुख्यतः महिलाओं ने अपनी सामूहिक स्मृति में सुरक्षित रखा। किसी गीत का रचनाकार अक्सर ज्ञात नहीं होता, लेकिन वह गीत पूरे समाज की भावनाओं का प्रतिनिधि बन जाता है।
तीज के लोकगीतों में सावन के प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ नारी के मन की अनेक परतें दिखाई देती हैं। एक ओर वह सखियों के साथ झूला झूलकर आनंदित होती है, तो दूसरी ओर उसे अपने मायके की याद सताती है। कहीं वह भाई के आने की प्रतीक्षा करती है, कहीं पति से प्रेम की अभिव्यक्ति करती है और कहीं ससुराल के जीवन की कठिनाइयों को गीतों में व्यक्त करती है।
इस दृष्टि से तीज के गीतों को नारी के लोक-साहित्यिक आत्मकथ्य के रूप में भी देखा जा सकता है।
सावन और प्रकृति का चित्रण
हरियाणवी तीज गीतों में प्रकृति का अत्यंत सुंदर चित्रण मिलता है। काली घटाएँ, बरसते बादल, बिजली की चमक, ठंडी हवा, हरे पेड़, झूले और कोयल की आवाज लोकगीतों के प्रिय विषय हैं।
हरियाणा की ग्रामीण स्त्री के लिए प्रकृति कोई दूर की वस्तु नहीं है। उसका जीवन खेत, खलिहान, पशुधन, पेड़-पौधों और मौसम के साथ जुड़ा रहा है। इसलिए सावन की हरियाली उसके मन में भी उल्लास पैदा करती है।
लोकगीतों में प्रकृति का वर्णन केवल सौंदर्य के लिए नहीं किया जाता, बल्कि प्रकृति नारी की भावनाओं का प्रतीक भी बनती है। बादल उसके मन में उठती भावनाओं को व्यक्त करते हैं, बारिश विरह को और गहरा कर सकती है तथा हरियाली जीवन में नई आशा का प्रतीक बन जाती है।
झूला और तीज
तीज के साथ झूले का संबंध अत्यंत पुराना और भावनात्मक है। गाँवों में बड़े पेड़ों की मजबूत डालियों पर रस्सियों के झूले डाले जाते थे। सखियाँ समूह बनाकर झूला झूलतीं और गीत गातीं।
झूले के गीतों में लय, संगीत और सामूहिकता का अद्भुत मेल मिलता है। झूला ऊपर-नीचे जाता है और उसी के साथ गीत की लय भी गति प्राप्त करती है। कई गीतों में सखियों के बीच हँसी-मजाक, चुहल और प्रेमपूर्ण संवाद दिखाई देता है।
झूला केवल मनोरंजन का साधन नहीं था। यह महिलाओं के लिए सामाजिक मेल-मिलाप का अवसर भी था। दैनिक घरेलू कार्यों से कुछ समय निकालकर वे अपनी सखियों से मिलतीं, बातें करतीं और गीतों के माध्यम से मन की बातें साझा करतीं।
मायके की याद और भाई-बहन का प्रेम
हरियाणवी तीज लोकगीतों का सबसे मार्मिक पक्ष मायके की याद है। विवाह के बाद बेटी का अपने मायके से भावनात्मक संबंध बना रहता है। सावन और तीज उसके लिए उस संबंध को फिर से जीने का अवसर लेकर आते हैं।
तीज के अवसर पर भाई द्वारा बहन को मायके लाने की परंपरा ने लोकगीतों को गहरी संवेदना दी है। बहन को उम्मीद रहती है कि उसका भाई आएगा और उसे अपने साथ पीहर ले जाएगा।
लोकगीतों में कभी बहन भाई से अपनी इच्छा व्यक्त करती है, कभी अपनी सास या परिवार के अन्य सदस्यों से मायके जाने की अनुमति माँगती है और कभी भाई के देर से आने पर मन की पीड़ा व्यक्त करती है।
यहाँ भाई केवल एक पारिवारिक व्यक्ति नहीं रहता, बल्कि वह बहन के लिए मायके की सुरक्षा, स्नेह और अपनत्व का प्रतीक बन जाता है।
नारी मन की अभिव्यक्ति
हरियाणवी लोक साहित्य में तीज का सबसे महत्वपूर्ण योगदान नारी मन की अभिव्यक्ति है। ग्रामीण समाज में महिलाओं के पास अपनी भावनाओं को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने के सीमित अवसर रहे हैं। लोकगीतों ने उन्हें अपनी बात कहने का एक सहज और स्वाभाविक माध्यम दिया।
तीज के गीतों में महिला अपने मन की अनेक बातें कहती है। वह कभी अपने पति की प्रशंसा करती है, कभी सास-ससुर के व्यवहार की चर्चा करती है, कभी भाई से मिलने की इच्छा जताती है और कभी सखियों के सामने अपने सुख-दुःख बाँटती है।
लोकगीतों में हास्य और व्यंग्य भी मिलता है। सास-बहू, ननद-भाभी तथा पति-पत्नी के संबंधों को लेकर चुटीले प्रसंग लोकगीतों को रोचक बनाते हैं।
इस प्रकार तीज के गीतों में नारी जीवन का एक विस्तृत लोकचित्र उपस्थित होता है।
तीज और पारिवारिक संबंध
हरियाणवी समाज में परिवार का विशेष महत्व है। तीज का पर्व पारिवारिक संबंधों को मजबूत करने का अवसर भी है। बेटी, भाई, माता-पिता, पति और ससुराल पक्ष—सभी इस पर्व से किसी न किसी रूप में जुड़े होते हैं।
मायके से बेटी के लिए कपड़े, श्रृंगार सामग्री, मिठाई और अन्य सामान भेजने की परंपरा रही है। इसे केवल उपहार देना नहीं समझना चाहिए; यह बेटी के प्रति परिवार के प्रेम और अपनत्व की अभिव्यक्ति है।
लोकगीतों में इन रिश्तों की गर्माहट दिखाई देती है। भाई-बहन का संबंध विशेष रूप से भावुक रूप में सामने आता है।
तीज के लोकगीतों में हास्य और व्यंग्य
हरियाणवी लोक साहित्य अपनी ठेठ देसी भाषा और हास्य-विनोद के लिए प्रसिद्ध है। तीज के अवसर पर गाए जाने वाले गीतों में भी यह विशेषता दिखाई देती है।
महिलाएँ गीतों के माध्यम से परिवार और समाज की छोटी-बड़ी विसंगतियों पर मजाकिया टिप्पणी करती हैं। सास-बहू के संबंध, पति का व्यवहार, ननद की शरारत, भाई की देरी और ससुराल की परिस्थितियाँ हास्य का विषय बन जाती हैं।
यह हास्य किसी व्यक्ति का अपमान करने के लिए नहीं, बल्कि सामूहिक मनोरंजन और मन का बोझ हल्का करने के लिए होता है। लोकगीतों का यही सहज हास्य हरियाणवी संस्कृति को विशिष्ट बनाता है।
तीज और लोकभाषा
हरियाली तीज के लोकगीत हरियाणवी भाषा की जीवंतता को बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन गीतों में देसी शब्दावली, ग्रामीण मुहावरे, कहावतें और स्थानीय बोलचाल की भाषा मिलती है।
हरियाणवी की सीधी-सपाट और प्रभावशाली शैली इन गीतों को विशेष पहचान देती है। लोकगीतों में कृत्रिम भाषा नहीं होती। उनमें वही शब्द होते हैं जिन्हें गाँव की महिलाएँ अपने दैनिक जीवन में बोलती हैं।
इसी कारण तीज के गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे हरियाणवी भाषा के जीवित दस्तावेज भी हैं।
लोकगीतों में धार्मिक और पौराणिक पक्ष
तीज का संबंध भारतीय धार्मिक और पौराणिक परंपराओं से भी जुड़ा हुआ है। शिव और पार्वती की कथा के साथ तीज को जोड़कर देखा जाता है। पार्वती के तप, समर्पण और शिव के साथ उनके मिलन की कथा भारतीय लोकमानस में व्यापक रूप से प्रचलित है।
हरियाणवी समाज ने धार्मिक मान्यताओं को अपने लोकजीवन के अनुरूप ग्रहण किया। इसलिए तीज के धार्मिक पक्ष के साथ-साथ इसमें स्थानीय सामाजिक और सांस्कृतिक रंग भी दिखाई देता है।
महिलाएँ व्रत रखती हैं, पूजा करती हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। धार्मिक आस्था और लोकपरंपरा का यह मेल तीज को अधिक व्यापक बनाता है।
तीज के अवसर पर श्रृंगार और लोकाचार
तीज के अवसर पर महिलाओं का श्रृंगार भी लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हरे रंग के वस्त्र, चूड़ियाँ, मेहंदी, बिंदी, पारंपरिक आभूषण और अन्य श्रृंगार सामग्री का विशेष महत्व रहता है।
मेहंदी लगाने की सामूहिक परंपरा महिलाओं के बीच सामाजिकता और उत्सव की भावना को मजबूत करती है। सखियाँ एक-दूसरे के हाथों में मेहंदी लगाती हैं और गीत गाती हैं।
लोक साहित्य में इन श्रृंगार प्रसंगों के माध्यम से स्त्री के उत्सवधर्मी रूप का चित्रण मिलता है।
ग्रामीण जीवन का प्रतिबिंब
हरियाणवी तीज साहित्य को पढ़ने पर ग्रामीण जीवन की पूरी तस्वीर सामने आती है। खेत, पशु, पेड़, कुएँ, चौपाल, आँगन, झूले, परिवार और रिश्ते—सब लोकगीतों का हिस्सा बन जाते हैं।
यहाँ साहित्य और जीवन अलग-अलग नहीं हैं। जो कुछ गाँव में घटित होता है, वही लोकगीतों में आ जाता है। यही लोक साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता है।
तीज के गीतों में तत्कालीन ग्रामीण समाज की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों की झलक भी मिलती है। इससे लोकगीत इतिहास और समाजशास्त्र के अध्ययन के लिए भी महत्वपूर्ण बन जाते हैं।
तीज और स्त्री-सामूहिकता
तीज का पर्व महिलाओं को सामूहिक रूप से मिलने का अवसर देता है। वे एक-दूसरे के सुख-दुःख सुनती हैं, गीत गाती हैं और अपने अनुभव साझा करती हैं।
लोकगीतों का सामूहिक गायन महिलाओं के बीच सामाजिक एकता को मजबूत करता है। गीत व्यक्तिगत अनुभव को सामूहिक अनुभव में बदल देता है। किसी एक महिला की पीड़ा जब गीत बनकर समूह में गूँजती है तो वह पूरे समुदाय की संवेदना बन जाती है।
इस अर्थ में तीज केवल उत्सव नहीं, बल्कि ग्रामीण महिला समाज के लिए सामूहिक संवाद का मंच भी रही है।
बदलते समय में हरियाली तीज
आधुनिक समय में तीज मनाने के तरीकों में परिवर्तन आया है। संयुक्त परिवारों की जगह छोटे परिवार बढ़े हैं। गाँवों में भी आधुनिक जीवनशैली का प्रभाव दिखाई देता है। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और डिजिटल मनोरंजन ने पारंपरिक सामूहिक गीत-संस्कृति को प्रभावित किया है।
फिर भी हरियाली तीज की लोकप्रियता कम नहीं हुई है। आज विद्यालयों, महाविद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और सांस्कृतिक संगठनों द्वारा तीज कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। झूला, मेहंदी, लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक वेशभूषा और सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ इन आयोजनों का हिस्सा बनती हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि तीज को केवल सजावट और मनोरंजन तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसके पीछे छिपी लोक-सांस्कृतिक विरासत को भी नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए।
लोक साहित्य के संरक्षण में तीज की भूमिका
लोकगीत तभी जीवित रह सकते हैं जब उनका गायन और हस्तांतरण जारी रहे। तीज जैसे पर्व लोकगीतों को जीवित रखने के स्वाभाविक अवसर प्रदान करते हैं।
आज विद्यालयों और सांस्कृतिक संस्थाओं में तीज के पारंपरिक गीतों, लोकनृत्यों और लोककथाओं को प्रस्तुत किया जा सकता है। बुजुर्ग महिलाओं से पुराने गीतों को संकलित करके उनका दस्तावेजीकरण किया जा सकता है।
हरियाणवी लोकभाषा और लोक साहित्य के संरक्षण के लिए ऐसे प्रयास अत्यंत आवश्यक हैं।
हरियाणवी लोक साहित्य में हरियाली तीज का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पर्व हरियाणा की प्रकृति, कृषि संस्कृति, पारिवारिक व्यवस्था, नारी जीवन और लोकभाषा को एक साथ जोड़ता है। तीज के लोकगीतों में सावन की हरियाली जितनी दिखाई देती है, उतनी ही गहराई से नारी के मन की हरियाली और उसके भावनात्मक संसार का भी चित्रण मिलता है।
तीज के गीतों में मायके की याद है, भाई-बहन का प्रेम है, सखियों की हँसी है, पति के प्रति अनुराग है, ससुराल के अनुभव हैं, प्रकृति का सौंदर्य है और समाज के प्रति सहज हास्य-व्यंग्य भी है। यही विविधता इसे हरियाणवी लोक साहित्य की अनमोल धरोहर बनाती है।
हरियाली तीज वास्तव में हरियाणा की मिट्टी, मौसम, रिश्तों और लोकभावना का उत्सव है। इसके गीतों में पीढ़ियों की स्मृतियाँ सुरक्षित हैं। बदलते समय के बावजूद यदि इन लोकगीतों, परंपराओं और लोकाचार को नई पीढ़ी से जोड़ा जाए तो तीज केवल एक वार्षिक त्योहार नहीं रहेगी, बल्कि हरियाणवी लोक संस्कृति की निरंतर चलती हुई जीवंत परंपरा बनी रहेगी।
