पेशे से किसान, मन से कवि : सम्मान ने रेखांकित की वीरेश कुमार त्यागी की शब्द-साधना

पेशे से किसान, मन से कवि : सम्मान ने रेखांकित की वीरेश कुमार त्यागी की शब्द-साधना

राजेंद्र शर्मा

 

मिट्टी की अपनी कोई भाषा नहीं होती, लेकिन उसे छूने वाले हाथों में वह अनगिनत शब्द भर देती है। खेत की मेड़, फसल की बालियाँ, ऋतुओं की प्रतीक्षा और श्रम से चमकता किसान का माथा—यही वे पन्ने हैं, जिन पर वीरेश कुमार त्यागी ने अपनी कविता लिखी है। पेशे से किसान और मन से कवि वीरेश कुमार त्यागी को कल गीतकार राजेन्द्र ‘राजन’ स्मृति गौरव सम्मान से नवाजा गया। यह सम्मान केवल एक रचनाकार का अभिनंदन नहीं, बल्कि उस लोक-संवेदना का सम्मान है, जो खेत से उठकर कविता में मनुष्य की आवाज बनती है।

सहारनपुर जनपद के देवबंद क्षेत्र के कुरडी गाँव की मिट्टी में पले-बढ़े वीरेश कुमार त्यागी का रचना-संसार किसी साहित्यिक प्रयोगशाला में नहीं, जीवन की खुली पाठशाला में तैयार हुआ है। उन्होंने मौसम को कैलेंडर से नहीं, आकाश और खेत की आँखों से पढ़ा है। बारिश उनके लिए सिर्फ पानी नहीं, उम्मीद है; सूखा केवल खेत की पीड़ा नहीं, मनुष्य की संवेदना के सूख जाने का रूपक भी है। हरियाली उनके यहाँ फसल के साथ-साथ जीवन के भीतर बची आस्था का रंग है।

उनकी कविता की सबसे बड़ी खूबी उसकी सहजता है। वह शब्दों का श्रृंगार करके पाठक को चमत्कृत करने के बजाय जीवन की सच्चाई उसके सामने रख देती है। उनकी पंक्तियों में गाँव की चौपाल है, घर-आँगन की आत्मीयता है, रिश्तों की गरमाहट है और बदलते समय के बीच मनुष्य के अकेले पड़ते जाने की चिंता भी। वे गाँव को केवल स्मृति के रूप में नहीं देखते; उनके लिए गाँव हमारी सामाजिक चेतना की वह जड़ है, जिससे कटकर विकास भी अधूरा हो जाता है।

किसान होना उनके लिए केवल जीविका नहीं, जीवन-दर्शन है। बीज बोकर फसल की प्रतीक्षा करना मनुष्य को धैर्य सिखाता है और प्रकृति के सामने सिर झुकाना विनम्रता। शायद इसीलिए उनकी कविता में आक्रोश भी है तो करुणा के साथ, प्रश्न भी हैं तो उम्मीद के साथ। वे किसान को दया का पात्र नहीं, सभ्यता का सर्जक मानते हैं—वह हाथ जो अन्न उगाता है, वही हाथ संवेदना भी बचाता है।

राजेन्द्र ‘राजन’ की स्मृति में मिला यह सम्मान इसलिए भी अर्थवान है कि राजन स्वयं गीत की उस परंपरा के प्रतिनिधि थे, जिसमें लोकजीवन, मनुष्य और संवेदना एक-दूसरे से अलग नहीं होते। वीरेश कुमार त्यागी की रचनात्मक यात्रा भी इसी जीवित परंपरा को आगे बढ़ाती दिखाई देती है।

आज जब साहित्य और जीवन के बीच दूरी बढ़ती जा रही है, वीरेश कुमार त्यागी जैसे कवि याद दिलाते हैं कि कविता किताबों से पहले जीवन में जन्म लेती है। वह खेत में अंकुर की तरह फूटती है, पसीने में आकार लेती है और शब्द बनकर मनुष्य तक पहुँचती है।

वीरेश कुमार त्यागी सचमुच उन विरल रचनाकारों में हैं, जिनके एक हाथ में हल और दूसरे में कविता है। वे खेत में अन्न उगाते हैं और शब्दों में मनुष्यत्व। राजेन्द्र ‘राजन’ स्मृति गौरव सम्मान ने इसी दोहरी साधना को सार्वजनिक आदर दिया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *