कविता
न्याय-व्यवस्था की दहलीज़ पर
नरसिंह कुमार ‘मयूर’
धर्म-ध्वज के पीछे छुपकर, जो नफ़रत का विष घोलते हैं,
उकसावे के शब्द उछाले, ज़हर हवा में बोते हैं।
कानूनों की आँख खुली है, बचकर कोई न जाएगा,
न्याय-व्यवस्था की दहलीज़ पर, हर दोषी घबराएगा।
धारा एक सौ नौ हो चाहे, या उनचास बीएनएस की,
उकसावे पर हत्या हो तो, तय है राह शिकंजे की।
चाहे तीन सौ दो की ज़द हो, या एक सौ तीन का हो प्रहार,
अपराधी और उकसाने वाले, दोनों ही हैं दोषी हर बार।
मृत्युदंड या उम्रकैद से, छूट न पाएगी काया,
साज़िश रची अगर छुप-छुपकर, काम न आएगी छाया।
सत्तरह सौ पंद्रह की ज़द में, या पचपन बीएनएस आए,
हत्या भले न हो पाई हो, पर सात साल की जेल दिलाए।
अगर चोट पहुँची हिंसा से, चौदह वर्षों का कारावास,
एक सौ बीस ‘बी’ और ‘इकसठ’ भी, तोड़ेंगे झूठा ढांचा-विश्वास।
कानूनों के तराज़ू पर ‘मयूर’, हर पाखंड उघाड़ा जाएगा,
भेष बदलकर नफ़रत बोने वाला, सलाखों के पीछे जाएगा।
