इंसानियत को शर्मसार करती मध्यप्रदेश की दर्दनाक घटना, पीड़िता के अदम्य साहस और न्याय की गुहार को व्यक्त करती नरसिंह कुमार ‘मयूर’ की एक कविता: संपादक
कविता
न्याय की गुहार
नरसिंह कुमार ‘मयूर’
सिसक रहा है इंसाफ यहाँ,
दम तोड़ रही इंसानियत,
हवस की इस अंधी राहों पर,
नग्न खड़ी है हैवानियत।
निर्दोष कदम थे, भक्ति मन में,
ले दर्शन का पावन आशीष,
क्या खबर थी उस निर्जन पथ पर,
घात लगाए खड़े इब्लीस।
‘पंचर बाइक’ का छल रचाया,
फिर घसीट ले गए कंदरा में,
आधा दर्जन वो नरपिशाच,
मदमत्त थे अपनी ही मदिरा में।
चीखती रही, वो लड़ती रही,
सृष्टि का हर बल उसने झोंका,
अस्मिता बचाने की ख़ातिर,
उस वीरांगना ने मौत को रोका।
क्रूरता की हर हद पार हुई,
प्रहार हुआ प्राइवेट पार्ट पर,
रक्त बहा, पर वो झुकी नहीं,
उस लहूलुहान से गात पर।
हार गए वो नीच दरिंदे,
जीता उसकी स्वाभिमानी ढाल,
मंगेतर संग वो अस्पताल में,
पूछ रही भारतवर्ष से सवाल।
ज़मीं पर कानून का कैसा साया?
जेल में सुरक्षित बैठे कातिल,
क्या कागज़ के इस पन्नों पर,
सिर्फ ज़मानत ही होगी हासिल?
विदेशी शासक भी शरमा जाएँ,
ऐसा घिनौना दौर भारत में आया है,
गरीब, मज़बूर और मजलूमों पर,
ज़ुल्म के घने काले अंबर की छाया है।
अब सिवा सांत्वना ‘मयूर’ नहीं चाहिए,
ना झूठा सांत्वना का कोई राग,
हर एक दरिंदे की ऐसी नीचता पर,
अब बरसे न्याय की कड़कती आग।
