किताबों का डिजिटलीकरण: ज्ञान का विस्तार या नियंत्रण?

किताबों का डिजिटलीकरण: ज्ञान का विस्तार या नियंत्रण?

डॉ रीटा अरोड़ा

“दादाजी, यह पुरानी किताब फोन में क्यों नहीं डाल देते?”

आरव ने पीले पड़ चुके पन्नों को पलटते हुए पूछा।

दादाजी मुस्कुराए, “डाल तो सकते हैं बेटा, लेकिन फोन बदल गया तो?”

“फिर डाउनलोड कर लेंगे।”

दादाजी ने किताब बंद की, “और यदि किसी दिन डाउनलोड करने की अनुमति ही न मिले?”

आरव पहली बार चुप था।

आज पूरी दुनिया लगभग इसी प्रश्न के सामने खड़ी है। किताबों का डिजिटलीकरण हमारे समय की बड़ी उपलब्धियों में से एक है। हजारों पुस्तकें, पांडुलिपियाँ और दुर्लभ दस्तावेज अब एक छोटे-से उपकरण में सुरक्षित किए जा सकते हैं। जो पुस्तक कभी किसी दूरस्थ पुस्तकालय की बंद अलमारी में पड़ी रहती थी, उसे आज दुनिया के दूसरे छोर पर बैठा पाठक भी पढ़ सकता है।

डिजिटल किताबों के लाभ स्पष्ट हैं। वे स्थान बचाती हैं, तुरंत खोजी जा सकती हैं और दृष्टिबाधित पाठकों के लिए ऑडियो या स्क्रीन रीडर में बदली जा सकती हैं। पुरानी पांडुलिपियों के धुंधले अक्षरों को तकनीक स्पष्ट कर सकती है। दीमक, नमी और कागज के क्षरण से जूझती पुस्तकों की डिजिटल प्रतियाँ उनकी सामग्री को आने वाली पीढ़ियों के लिए बचा सकती हैं।

इसलिए डिजिटलीकरण का विरोध करना समाधान नहीं है।

लेकिन हर सुविधा अपने साथ एक प्रश्न भी लाती है। किताब का डिजिटल रूप बनाते समय हम केवल माध्यम नहीं बदल रहे, बल्कि ज्ञान के स्वामित्व की व्यवस्था भी बदल रहे हैं।

कागज की किताब खरीदने के बाद वह हमारी हो जाती है। हम उसे पढ़ सकते हैं, मित्र को दे सकते हैं, पुस्तकालय में दान कर सकते हैं या अगली पीढ़ी के लिए सँभाल सकते हैं। उसे पढ़ने के लिए बिजली, इंटरनेट, पासवर्ड या किसी कंपनी की अनुमति नहीं चाहिए।

डिजिटल पुस्तक का संबंध अक्सर स्वामित्व से अधिक केवल “पहुँच” से होता है। हम ई-बुक खरीदते दिखाई देते हैं, लेकिन कई बार हमें केवल उसे पढ़ने का लाइसेंस मिलता है। पुस्तक किसी कंपनी के सर्वर पर रहती है। यदि प्लेटफॉर्म बंद हो जाए, खाता रोक दिया जाए या नियम बदल जाएँ, तो पाठक की पूरी डिजिटल लाइब्रेरी उसकी पहुँच से बाहर हो सकती है।

यहीं से सुविधा और नियंत्रण के बीच की महीन रेखा दिखाई देती है।

पुराने समय में किसी किताब को रोकने के लिए उसे जब्त या नष्ट करना पड़ता था। डिजिटल युग में किसी विचार को अदृश्य करना कहीं आसान हो सकता है। किसी पुस्तक को खोज परिणामों से हटा दीजिए, उसका लाइसेंस समाप्त कर दीजिए या उसे महँगी भुगतान-दीवार के पीछे बंद कर दीजिए।

किताब नष्ट नहीं होगी, लेकिन अधिकांश पाठकों के लिए उसका अस्तित्व लगभग समाप्त हो जाएगा।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ने इस बहस को और जटिल बना दिया है। पहले पुस्तकों का डिजिटलीकरण मुख्यतः संरक्षण और सार्वजनिक पहुँच के लिए किया जाता था। अब बड़ी मात्रा में किताबें एआई प्रणालियों को प्रशिक्षित करने के लिए डिजिटल की जा रही हैं। मशीन पुस्तक को पाठक की तरह नहीं पढ़ती; वह उसे डेटा के रूप में ग्रहण करती है।

इससे कई उपयोगी परिणाम मिल सकते हैं। एआई कठिन विषयों को सरल भाषा में समझा सकता है, भाषाओं के बीच अनुवाद कर सकता है और शोधकर्ताओं को विशाल साहित्य में आवश्यक संदर्भ खोजने में सहायता दे सकता है। किसी छोटे कस्बे का विद्यार्थी भी अपनी भाषा में उन विषयों को समझ सकता है, जिनकी महँगी किताबें उसके पास उपलब्ध नहीं हैं।

लेकिन प्रश्न यह है कि इस ज्ञान के पीछे खड़े लेखक, अनुवादक और शोधकर्ता कहाँ रह जाते हैं?

यदि किसी लेखक की वर्षों की मेहनत बिना अनुमति और उचित भुगतान के प्रशिक्षण सामग्री बन जाए, तो तकनीक की सफलता किसके श्रम पर खड़ी है? जब एआई किसी पुस्तक का सार, व्याख्या या उसी जैसी रचना प्रस्तुत करता है, तो मूल लेखक का नाम और उसका आर्थिक अधिकार धीरे-धीरे पीछे छूट सकता है।

दूसरा खतरा भाषाई और सांस्कृतिक विविधता का है। बड़ी कंपनियाँ उन्हीं भाषाओं और पुस्तकों को प्राथमिकता दे सकती हैं, जिनका बाजार बड़ा है। हिंदी और अंग्रेजी की प्रसिद्ध पुस्तकें डिजिटल जीवन पा सकती हैं, लेकिन किसी छोटी भाषा का सीमित प्रतियों में छपा लोक-साहित्य कौन बचाएगा?

जो सामग्री डिजिटल नहीं होगी, वह भविष्य की खोज, शिक्षा और एआई की स्मृति से बाहर होती जाएगी। धीरे-धीरे लोगों को लगने लगेगा कि जो स्क्रीन पर उपलब्ध नहीं है, उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है।

डिजिटलीकरण पुस्तक की सामग्री बचाता है, लेकिन हर बार उसका पूरा जीवन नहीं बचा पाता। पुरानी किताब में लिखा किसी पाठक का नाम, हाशिये की टिप्पणी, बीच में रखा सूखा फूल और पन्नों की गंध भी उसके इतिहास का हिस्सा होते हैं। डिजिटल प्रति शब्दों को सुरक्षित कर सकती है, लेकिन उस मानवीय स्पर्श को नहीं।

इसलिए हमें कागज और स्क्रीन में से किसी एक को चुनने की आवश्यकता नहीं है। सही रास्ता संतुलन का है।

दुर्लभ और महत्त्वपूर्ण पुस्तकों की डिजिटल प्रतियाँ बननी चाहिए, लेकिन उनकी मूल प्रतियाँ भी सुरक्षित रहनी चाहिए। सार्वजनिक डिजिटल पुस्तकालयों को मजबूत किया जाए, ताकि ज्ञान केवल निजी कंपनियों के सर्वरों में बंद न रहे। लेखकों की स्पष्ट सहमति, उचित श्रेय और न्यायपूर्ण भुगतान सुनिश्चित किया जाए। छोटी भाषाओं और स्थानीय साहित्य के संरक्षण को बाजार की इच्छा पर न छोड़ा जाए।

डिजिटल तकनीक ज्ञान का विस्तार करे, उसका अपहरण नहीं।

आने वाली पीढ़ियों को केवल यह जानने का अवसर नहीं मिलना चाहिए कि हमने क्या लिखा था। उन्हें उसे स्वतंत्र रूप से पढ़ने, समझने और उस पर प्रश्न करने का अधिकार भी मिलना चाहिए।

इसलिए असली प्रश्न यह नहीं है कि किताबें डिजिटल होंगी या कागज पर रहेंगी।

असली प्रश्न है-

जब सारी किताबें डिजिटल हो जाएँगी, तब ज्ञान की चाबी किसके हाथ में होगी?

 डॉ. रीटा अरोड़ा,सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल

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