जब सत्ता नैतिकता का मुखौटा पहन लेती है
रत्ना भदौरिया
सत्ता का सबसे बड़ा आकर्षण केवल शासन नहीं होता, बल्कि स्मृतियों पर अधिकार होता है। वह जानती है कि जिस दिन जनता अपनी सामूहिक स्मृति खो देगी, उसी दिन जवाबदेही की अंतिम दीवार भी ढह जाएगी। इसलिए हर सत्ता सबसे पहले स्मृति पर आक्रमण करती है। वह चाहती है कि लोग भूल जाएँ—कल किसने संविधान की आत्मा को चुनौती दी थी, किसने कानून को न्याय का नहीं, सुविधा का औज़ार बना दिया था, किसने लोकतांत्रिक संस्थाओं को व्यक्ति-पूजा की चौखट पर झुका दिया था, और किसने असहमति को राष्ट्रविरोध का पर्याय बनाने की कोशिश की थी। फिर एक दिन वही चेहरे मर्यादा, धर्म, संविधान और कानून के सबसे बड़े प्रवक्ता बनकर मंचों पर दिखाई देते हैं।
यहीं से राजनीति का सबसे परिष्कृत छल आरम्भ होता है। यहाँ भूलों को स्वीकार नहीं किया जाता, बल्कि उनके लिए नए शब्द गढ़ दिए जाते हैं। अन्याय को राष्ट्रहित, दमन को अनुशासन, प्रचार को सत्य और अवसरवाद को नैतिकता का नाम दे दिया जाता है। धीरे-धीरे शब्द अपने अर्थ खोने लगते हैं। भाषा संवाद का माध्यम नहीं रहती, सत्ता की सेविका बन जाती है। जब भाषा कैद हो जाती है, तब केवल मनुष्य ही नहीं, सत्य भी अकेला पड़ जाता है।
विडंबना यह है कि जिनकी राजनीति वर्षों तक कटुता, अपमान, गालियों और विभाजन की भाषा पर फलती-फूलती रही, वे आज शालीनता का उपदेश दे रहे हैं। जिन्होंने जनता के घावों पर मरहम नहीं, बल्कि जुमलों की चमकदार पट्टियाँ बाँधीं; जिन्होंने कठिन प्रश्नों का उत्तर तर्क से नहीं, शोर से दिया; जिन्होंने मतभेद को शत्रुता और आलोचना को अपराध की तरह प्रस्तुत किया—वे आज लोकतांत्रिक मर्यादा के संरक्षक होने का दावा कर रहे हैं।
सत्ता का सबसे खतरनाक रूप अत्याचार नहीं, बल्कि पाखंड है। अत्याचारी कम-से-कम अपने चेहरे से परिचित होता है; पाखंडी अपने चेहरे पर सदाचार का रंग पोत देता है। वह केवल शासन नहीं करना चाहता, बल्कि नागरिकों की नैतिक समझ पर भी अधिकार चाहता है। वह चाहता है कि लोग अन्याय को न्याय समझें, छल को रणनीति और मौन को राष्ट्रभक्ति। जब समाज इस भ्रम को स्वीकार कर लेता है, तब लोकतंत्र बाहर से जीवित दिखाई देता है, पर भीतर से खोखला होने लगता है।
धर्म इस पाखंड का सबसे सुविधाजनक मंच बना दिया जाता है। राम का नाम लिया जाता है, लेकिन राम का आचरण भुला दिया जाता है। राम ने अधिकार से अधिक कर्तव्य, विजय से अधिक न्याय और शक्ति से अधिक मर्यादा को महत्व दिया। किंतु जब राम का नाम केवल राजनीतिक लाभ का अलंकार बन जाए और उनका जीवन सार्वजनिक आचरण से अनुपस्थित हो जाए, तब प्रश्न आस्था पर नहीं, आस्था का उपयोग करने वालों पर उठता है। भक्ति उद्घोष से नहीं, चरित्र से प्रमाणित होती है।
कानून भी तब तक पूजनीय माना जाता है, जब तक वह सत्ता की सुविधा के अनुकूल हो। जैसे ही वही कानून प्रश्न पूछने लगता है, उसकी व्याख्याएँ बदलने लगती हैं। और समय का चक्र घूमते ही वही लोग कानून की पवित्रता के सबसे बड़े व्याख्याता बन जाते हैं। सिद्धांत कभी अवसर के अनुसार नहीं बदलते; केवल अवसरवादी बदलते हैं।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी शासकों की भूल नहीं, नागरिकों की विस्मृति है। स्मृतिहीन समाज सबसे आसान शिकार होता है। उसे हर चुनाव में नया नायक दे दिया जाता है, हर संकट में नया शत्रु और हर असफलता के लिए नया बहाना। धीरे-धीरे प्रश्न पूछने की संस्कृति समाप्त हो जाती है और जयकार करने की संस्कृति उसका स्थान ले लेती है। उस क्षण लोकतंत्र नागरिकों का नहीं, अनुयायियों का उत्सव बन जाता है।
काल का लेखा चुनावी भाषणों से नहीं बदलता। समय की अदालत में प्रचार नहीं चलता, केवल कर्मों की गवाही सुनी जाती है। वहाँ यह नहीं पूछा जाता कि किसने कितनी बार संविधान का नाम लिया, बल्कि यह देखा जाता है कि किसने उसकी आत्मा का कितना सम्मान किया। वहाँ यह नहीं गिना जाता कि किसने धर्म के कितने उद्घोष किए, बल्कि यह परखा जाता है कि न्याय, करुणा, समानता और मर्यादा को किसने अपने आचरण में जिया।
समय की शिला पर सत्ता की हर चाल, हर चूक और हर छल का निशान दर्ज होता रहता है। मुखौटे कुछ समय के लिए आँखों को भ्रमित कर सकते हैं, पर काल का दर्पण कभी भ्रमित नहीं होता। वह चेहरों का नहीं, चरित्र का प्रतिबिंब दिखाता है। वह पद की ऊँचाई नहीं मापता, बल्कि नैतिकता की गहराई मापता है।
इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न किसी एक दल, किसी एक नेता या किसी एक विचारधारा का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या राजनीति फिर से नैतिक साहस अर्जित करेगी, या नैतिकता केवल सत्ता का परिधान बनी रहेगी? क्या संविधान केवल शपथ ग्रहण का दस्तावेज़ रहेगा या शासन का चरित्र बनेगा? क्या कानून व्यक्ति से बड़ा होगा, या व्यक्ति स्वयं को कानून से बड़ा मानता रहेगा? और क्या नागरिक हर बार नए नारों के सम्मोहन में अपने ही विवेक को गिरवी रख देंगे?
लोकतंत्र की अंतिम रक्षा संसद की दीवारों से पहले नागरिक की चेतना में होती है। जब नागरिक प्रश्न करना छोड़ देता है, तब सत्ता उत्तर देना भी छोड़ देती है। जब विवेक मौन हो जाता है, तब संविधान की धाराएँ भी अकेली पड़ जाती हैं। इसलिए किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रहरी सत्ता नहीं, सजग नागरिक होता है।
सिंहासन बदलते हैं। झंडे बदलते हैं। नारे बदलते हैं। चेहरे बदलते हैं। पर समय की शिला पर अंकित कर्म नहीं बदलते। मुखौटे देर तक टिक सकते हैं, किंतु अनंत काल तक नहीं। अंततः काल का दर्पण हर रंग उतार देता है। वहाँ किसी का पद नहीं पढ़ा जाता, किसी का प्रचार नहीं सुना जाता—वहाँ केवल चरित्र की प्रतिध्वनि शेष रह जाती है। और वही प्रतिध्वनि किसी भी सत्ता का सबसे सच्चा परिचय होती है।
