भारत का लोक क्या है?
मंजुल भारद्वाज
विद्वान किसी भी क्रांतिकारी बदलाव को भारतीय लोक के नाम से खारिज़ कर देते हैं। यहां क्रांतिकारी बदलाव का अर्थ किसी मंत्री के इस्तीफ़े से उपजी वाहवाही नहीं है और ना ही सरकार या सत्ता बदलने से है! यहां क्रांतिकारी बदलाव का अर्थ है व्यवस्था निर्माण के विचार में बदलाव।
क्या भारतीय व्यवस्था भारतीय लोक पर बनी हुई है? अगर ऐसा है तो भारतीय व्यवस्था संविधान के बावजूद वर्णवाद पर टिकी हुई है। तो क्या भारतीय लोक वर्णवाद है!
वर्णवाद तो शोषण है । पूंजीवाद से ज़्यादा क्रूर शोषण है वर्णवाद। प्रकृति के विरुद्ध मनुष्य का नरसंहार है वर्णवाद! मनुष्य को मनुष्य ही नहीं समझने का घिनौना दुष्कर्म है वर्णवाद। तो क्या लोक के मूल वर्णवाद को बदले बिना शोषण मुक्त न्याय संगत व्यवस्था का निर्माण संभव है?
विद्वान भूल कर बैठते हैं लोक को समझने की । वो लोक का अर्थ भौगोलिक परिवेश, वेश भूषा,बोली,खान पान , रहन सहन ,गीत संगीत समझ लेते हैं। पर क्या वो इसके भीतर गहरे पैठे व्यवस्था विचार की विवेचना करते हैं ? करते तो वो व्यवस्था बदलाव के विचार को लोक के नाम से नहीं रोकते।
भारतीय लोक वर्णवाद के साथ ईश्वर भक्ति से ग्रस्त है। यह ऐसा मृत्यु मुखी गठजोड़ है जो लोक को मनुष्य बनने ही नहीं देता । लोक को अपनी स्वतंत्रता और होने का अहसास ही नहीं होने देता । क्योंकि जब लोक यह मान ले कि ईश्वर ही उसका भाग्य तय करता है और वर्णवाद उसकी नियति है तो संविधान बेअसर हो जाता है। शोषण जारी रहता है, जातिवाद पनपता रहता है और धर्मांधता सत्ता पर बैठ न्याय और संविधान का कत्ल करती रहती है….
भोग बढ़ता है, तथाकथित स्मार्ट फ़ोन का उपयोग होता है, बाज़ार वाद मुनाफा कमाता है पर क्या लोक का मूल विचार बदल पाता है?
नहीं बाज़ारवाद सिर्फ़ मुनाफा कमाता है… लोक का मूल नहीं बदलता क्योंकि बाज़ारवाद चमकीले आवरण में लिपटा शोषण है।
आदिवासी पितृसत्ता की परछाई से दूर है तो घनघोर अंधविश्वास में लिपटा है। प्रकृति का रक्षक है पर पूंजीवादी ताकतों से पीस रहा है। उसकी जल ,जंगल , ज़मीन पर चारों तरफ़ से प्रहार हो रहा है उसे तबाह किया जा रहा है।
तथाकथित शिक्षित वर्ग विकास के महानगरों में अधर में लटका हुआ है…
विद्वान एक सत्य को समझ लें कि गांव का मूल वर्णवाद है। तो क्या वर्णवाद के रहते आप शोषण मुक्त व्यवस्था का निर्माण कर सकते हैं ?
