एक पक्ष यह भी
सांसदों की संख्या विस्तार से बड़ा सवाल समझ विस्तार नहीं होना चाहिए?
राजकुमार कुम्भज
हठी सरकारें अपनी विफलताऍं कभी भी स्वीकार नहीं करती हैं;क्योंकि इससे उनके भय के तथाकथित क्षेत्रफल का क्षरण साबित होता है।
आंदोलनों का श्रेय हमेशा ही संदिग्ध रहा है.एक के साथ-साथ अनेक चलते हैं.तब कहीं जाकर एक सार्थक सृजनात्मक आंदोलन सामने आ पाता है. कई मर्तबा ज़ाहिर हुआ है कि फलाँ प्रदर्शन सत्ता-पक्ष द्वारा संपादित व प्रायोजित था.
सच और अफ़वाह अपना काम,अपने ही अंदाज़ में करते रहते हैं और ख़ामोशी से रास्ते बनते-बिगड़ते जाते हैं.
विश्वास करना कठिन नहीं होना चाहिए कि सरकारी-संरक्षण से भी आंदोलनकारी-मोहरे पैदा किये जाते रहे हैं और फिर Use and throw.खेल खतम.
पेपर-लीक मामलों ने इधर अपने अंदाज़ेबयाँ से कुछ अलग व कुछ अधिक ही कुख्याति अर्जित कर ली है,तो क्यों नहीं इसकी ज़िम्मेदारी भी तय होना ज़रूरी हो जाता है?राजनीति से कहीं ज़्यादा ज़रूरी ये मुद्दा देश के भविष्य से जुड़ा है.
संसद में आजकल जो कुछ भी निरंतर घटित हो रहा है,उसने नैराश्य और ऊब का विस्तार किया है.
सांसदों की संख्या-विस्तार से बड़ा सवाल सांसदों की समझ-विस्तार का क्यों नहीं होना चाहिए?
