राजकुमार कुम्भज की कविता – दिल्ली दृश्य

कविता

दिल्ली दृश्य

राजकुमार कुम्भज

दिल्ली के ताज़ा विरोध-प्रदर्शन ने भाषा और संस्कार-संस्कृति के सभी तटबंध ध्वस्त कर दिए हैं.हैरानी होना स्वाभाविक है.

ऐसा स्वीकार कर लिया गया है कि ये नयी पीढ़ी निहायत ही नालायक़ और बिगड़ैल है.

जिस तरह के काग़ज़ात ( पोस्टर,स्टिकर्स, टैटूज़)ॳॅंग-प्रदर्शन सहित,वहाँ उदारतापूर्वक दोहराये गये,वे अश्लील,बेहूदा और शर्मनाक कहे जाने की श्रेणी में शुमार किये जाते रहे हैं.

नये ज़माने की नयी हवाऍं चल रही हैं.नई पीढ़ी के नये संस्कार सामने आ रहे हैं.हर्ज़ करने वालों का फ़र्ज़ बनता है कि वे अपना हर्ज़ अवश्य ही दर्ज़ करवाऍं.

भाषाऍं और परिभाषाऍं अपने-अपने अंदाज़ में अपने-अपने परिधान बदल रही हैं.बदलाव रोकना या रोक पाना असंभव है.

आजकल की पीढ़ी के चाल-चलन को अनायास ही वाहियात,बद-ज़ुबान और कुसंस्कार कहकर ख़ारिज़ कर देने से वह ठहरने वाला नहीं है.

पलभर में सूचना-संपन्न हो रहे बच्चों की नज़रों से आज के अख़बार और टीवी अपनी जगह ठीक नहीं रह गये हैं.वहाँ बासी चीज़ें बेची जा रही हैं,जिसमें उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है,बल्कि एक ख़ास तरह की वितृष्णा भी है.

पिछले डेढ़-दो दशक में देश-दुनिया ने बेहद ही अविश्वसनीय राजनीतिक,सामाजिक,आर्थिक तथा तकनीकी उथल-पुथल देखी है.बहुत संभव है कि संस्थागत संस्कार-संस्कृति को ये विस्फोटक घटनाऍं विस्मयकारी दिखाई दे रही हों,दे सकती हैं.

लेकिन भूलना नहीं चाहिए कि समय पर्याप्त परिवर्तनशील होता है.

कल को आज ने अपदस्थ किया है,आज को कल अपदस्थ कर देगा.जिन्होंने आज बदलाव किया है,वे भी कर बदल दिए जाऍंगे.

काल से बड़ा तत्काल होता है.

28.7.26

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