प्रेमचंद और हमारा समय

प्रेमचंद और हमारा समय

प्रेमचंद और हमारा समय

केरल विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में परिचर्चा का आयोजन

केरल विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा प्रेमचंद माह जुलाई की 16 तारीख़ को आयोजित ‘प्रेमचंद जयंती समारोह’ सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस अवसर पर ‘प्रेमचंद और हमारा समय’ विषय पर हुई परिचर्चा में दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु महाविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर बजरंग बिहारी तिवारी व उनके साथ दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्यार्थी शामिल रहे।

साथ ही इस परिचर्चा में केरल विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों, शोधार्थियों तथा विद्यार्थियों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। विभागाध्यक्ष डॉ. हरमन पी. जे. ने सभी का अभिनंदन व स्वागत कर परिचर्चा की आगाज़ किया।

परिचर्चा की शुरुआत में प्रो. बजरंग बिहारी ने विषय की प्रस्तावना पेश की। केरल विश्वविद्यालय की शोधार्थी नंदा ने अपने वक्तव्य में कहा कि प्रेमचंद को पढ़ते हुए हम उन्हें आज भी प्रासंगिक महसूस कर रहे हैं। जो समस्या पहले थी वो आज भी विद्यमान है। उन्होंने गोदान व निर्मला के जरिये स्त्री से संबंधित समस्याओं की ओर ध्यान आकृष्ट करवाया।

दिल्ली के आमिर खान ने लमही (प्रेमचंद का गाँव) की अपनी यात्रा का अनुभव साझा करते बताया कि किस प्रकार वहाँ खालीपन व अंधकार सा है। पुनःनिर्माण कार्य भी जो चल रहा है वह स्थिर है।

साथ ही उन्होंने बताया कि किस प्रकार प्रेमचंद ने कथा साहित्य में आम जीवन एवं उनके समस्याओं को स्थान देते हुए उपन्यास विधा को नया संस्कार दिया, नए सिरे से विधा की पहचान बनाई। ऐसे प्रेमचंद के जन्म-स्थान लमही की वर्तमान स्थिति को देख दुःख होता है। हम हिंदी वाले उन्हें उतना महत्व नहीं दे पाए पर सुदूर दक्षिण भारत में उनके प्रति एक ख़ास लगाव देखा जा सकता है।

दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकांक्षा ने कथाकार के व्यवहारिक जीवन व साहित्यिक जीवन में भिन्नता दर्शाते हुए उनके साहित्यिक मूल्य को समाज के लिए प्रमुख बताया। यह भी बताया कि प्रेमचंद से उनका परिचय ‘ईदगाह’ कहानी से हुआ था। उन्होंने कहा कि शुरुआती पाठ में हामिद केंद्र में लगा लेकिन अब लगता है सभी का अपना-अपना महत्व है। चाहे मोहसिन की समझदारी वाली बातें हों या हामिद की आर्थिक कारणों से उम्र के पहले की समझ।

इसके बाद केरल विश्वविद्यालय की शोधार्थी अनुजा ने कहा कि कुछ सीमित अथवा तय बिंदुओं में प्रेमचंद नहीं आ सकते। प्रेमचंद ने आम जन के सभी पक्षों को व्यापक एवं यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया। उस समय के स्त्री-विमर्श के प्रथम रचनाकार के रूप में प्रेमचंद आते हैं।

वह उपन्यास ‘निर्मला’ तथा कहानी ‘कफ़न’ में पीड़ा को, कराह को पाठकों पर छोड़ देते हैं। बात चाहे कफ़न की बुधिया की प्रसव पीड़ा की हो या घीसू व माधव के आलू के प्रति चिंता का चित्रण हो। उन्होंने प्रेमचंद के साहित्य को विश्व साहित्य में रुसी साहित्यकारों (तोल्स्तोय व मोक्सिम गोर्की) के बीच समानता स्पष्ट करते हुए कि उनके साहित्य में वर्किंग क्लास का यथार्थ चित्रण मिलता है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के इन्द्रजीत ने प्रेमचंद की कहानी ‘पूस की रात’ के माध्यम से किसानों की समस्या पर अपनी बात रखते हुए कहा कि डंकन और कार्निवालिस के बंदोबस्त और स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था से किसानों की स्थितियां तेजी से बिगड़नी शुरू हुईं।

प्रेमचंद के यहां छोटे किसान, तथाकथित छोटी जातियों के हैं जो महाजनी सभ्यता व बंदोबस्त के दोहरे शोषण के शिकार हैं। इस शोषण के विद्रोह में किसान का एक समूह विद्रोही स्वरूप भी अपनाता है जिसे 1857 के विद्रोह में देखा जा सकता है।

गोदान में किसान की अगली पीढ़ी गोबर जो महाजनों से विद्रोह करता है लेकिन पूँजीपतियों का गुलाम हो जाता है। इस गुलामी के बंधन पहले से तैयार हैं। किसान से मज़दूर बनने की प्रक्रिया इनके यहां ही दिखती है। हाल में भी हम छोटे-किसानों को वही समस्या झेलते देखते हैं। वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों को रेखांकित करते हुए इन्द्रजीत ने तुलसीदास का कवित्त प्रस्तुत किया –

“खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, बलि,
बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी।

जीविका बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस,
कहैं एक एकन सों, ‘कहाँ जाई, का करी?”

केरल विश्वविद्यालय के पोस्ट डॉक्टोरल फेलो प्रत्यूष ने ‘भूखा ब्रह्मा’ कविता के पाठ के माध्यम से परिचर्चा को विशिष्ट बनाया। दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा अर्पिता ने प्रेमचंद के उपन्यास ‘निर्मला’ पर बात करते हुए बे-मेल विवाह के मूल में दहेज प्रथा को रखा।

बे-मेल विवाह से होने वाली समस्याओं का भी ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि तोताराम की उम्र ज़्यादा होने से निर्मला के मन में उनके प्रति प्रेम की जगह ‘पूजनीय’ का भाव है। बच्चों के प्रति सारी ममता के बावजूद निर्मला का स्थान ‘सौतेली मां‘ का ही रहता है। प्रो. बजरंग बिहारी ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सौ साल होने को है लेकिन घरेलू हिंसा के मामले आज भी बढ़ते जा रहे हैं।

केरल विश्वविद्यालय की छात्रा भावना का प्रेमचंद से पहला परिचय दूरदर्शन पर प्रसारित ‘ठाकुर का कुआ’ से हुआ। उन्होंने कहा कि वे गंगी की संवेदना से जुड़ गयी थीं। उन्हें कथा की सत्यता में तनिक भी कल्पना नहीं झलकती। हाई स्कूल में फिर से प्रेमंचद को जानने का मौका मिला और तब लगा कि रचनाकार किस प्रकार सूक्ष्मता व सरलता से हमारे सामने समाज की सच्चाइयों को चित्रित कर देते हैं। जिज्ञासाओं व कलम की शक्ति को दर्शाते हुए पूरे युग को पुनः सोचने पर मजबूर कर देते हैं।

दिल्ली से पहुंचे जसपाल ने भावना की ही बातों में अपने कुछ विचार जोड़ते हुए कहा कि प्रेमचंद ने समाज के सभी बिंदुओं को उठाया है। शुरूआत में उन पर गांधी का प्रभाव था। आदर्शवाद की वकालत से उन्होंने समाज को जाग्रत करने का काम किया। बाद में जब लगा आदर्श से काम नही चलेगा तो उन्होंने यथार्थवादी साहित्य रचा – ठाकुर का कुंआ, गोदान, कफ़न आदि।

केरल विश्वविद्यालय के छात्र रामनरेश ने प्रेमचंद की रचनाओं को आचार्य शुक्ल की मान्यता (साहित्य जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब है) के रूप में देखते हुए कहा कि पहले आदर्शवाद के जरिये सोच बदलने का प्रयास और यथार्थवाद में किसान की पीड़ा व्यक्त हुई जो मजदूर व किसान की क्रांतिकारी चेतना से प्रेरित है। शोधार्थी दोषणा का प्रेमचंद की रचनाओं से परिचय स्नातक के पाठ्यक्रम में लगी रचनाओं से हुआ।

उन्होंने प्रेमचंद के कथा साहित्य से प्राप्त अनुभव को साझा करते हुए कहा कि इनके साहित्य में वर्णित किसान समस्या व संघर्ष आज भी जारी है। इसे हाल में हुए किसान आंदोलन या जंतर मंतर पर चल रहे आंदोलन में देखा जा सकता है। इनकी प्रासंगिकता आज भी कई लेखकों को प्रेरित करती है। डॉ. बजरंग बिहारी टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रेमचंद विजनरी लेखक हैं। उनका साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है।

दिल्ली विश्वविद्यालय से गये अभय कुमार ने आकांक्षा के वक्तव्य से असहमति प्रकट करते हुए कहा कि पुलिस को ही चोर मानकर निश्चिंत हो जाना ठीक नहीं। उसके पीछे का पूरा तंत्र जो ऊँचे से ऊँचे कुर्सी तक फैला है। ‘बड़े घर की बेटी’ कहानी के माध्यम से उन्होंने प्रेमचंद पर अपनी बात रखते हुए संयुक्त परिवार में स्त्री की भूमिका को उदाहरण देकर समझाया। ‘‘हमें बोलिए मायके को नहीं” कहकर स्त्री प्रतिवाद करती आई है जो इस कहानी में भी दिखता है। स्वाभिमानी व्यक्ति केवल अपने तक नहीं बल्कि अपने साथ साथ-साथ आने वाले सभी के बारे में सोचता है। भारतीय परिवेश में परिवार को बांधे रखने में स्त्री हमेशा प्रासंगिक रही है।

पहले सत्र का समापन करते हुए विभागाध्यक्ष हरमन पी०जे० ने कहा कि जब भी प्रेमचंद पर बात करते हैं तो नए-नए विचार आ जाते हैं। उन्होंने ‘रंगभूमि’ उपन्यास को अन्य कृतियों से भिन्न बताते हुए कहा कि किस प्रकार विकास के नाम पर जमीनें कब्जा की जाती हैं। वे इस उपन्यास में प्रेमचंद को अर्थशास्त्री के रूप में देखते हैं। पहले प्रकृति के अनुसार खेती होती थी लेकिन अब व्यापार के अनुसार होती है।

बाज़ार व मुनाफा के अनुसार खेती किसान करने लगे हैं। वह भविष्य प्रेमचंद ने पहले ही सामने रखे दिया था। अभी केरल में किसान बाज़ार व मुनाफे के अनुसार खेती करने लग गए हैं। प्रेमचंद के नायकों की विशेषता बताते हुए हरमन जी ने कहा कि वे सूरदास जैसे व्यक्ति को नायक रूप में लेकर रचना करते हैं।

मध्याह्न अवकाश के बाद दूसरे सत्र के पहले वक्ता दिल्ली से गये निशांत ने प्रेमचंद की कहानी ‘बड़े भाई साहब’ के आधार पर शिक्षा व्यवस्था के कमियों को उजागर करते हुए कहा कि इस कहानी में बड़े भाई योगात्मक प्रक्रिया से शिक्षा ग्रहण करते हैं जबकि छोटे भाई रचनात्मक प्रक्रिया से ग्रहण करते हैं। प्रेमचंद रचनात्मक प्रक्रिया के समर्थक हैं। साथ ही उन्होंने हाल में हुए यूजीसी नेट की परीक्षा के प्रश्न को सामने रखते हुए बताया कि किस प्रकार तर्क के जगह रटने की प्रक्रिया को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे छात्रों की तार्किकता घटती है।

केरल विश्वविद्यालय की विद्यार्थी आद्या ने प्रेमचंद के उपन्यास ‘गबन’ के माध्यम से बताया कि वे प्रेम को महत्व देते हैं। चाहे वे साहित्य जगत हो या व्यावहारिक जगत। जिस तरह उपन्यास में उनके कई पात्र पहले धन के पीछे भागते हैं लेकिन बाद में प्रेम से सब कुछ अर्जित करने का प्रयास करते हैं। प्रेमचंद ने अपने जीवन में धनपत राय की जगह प्रेमचंद नाम से साहित्य का विस्तार किया।

दिल्ली से पहुंचे धर्मेन्द्र पाल ने प्रेमचंद के साहित्य को अनुभव से भरा साहित्य माना। इसके जरिए सभी के जीवन को उन्होंने उभारा है। उनके साहित्य के केन्द्र में ग्रामीण हैं लेकिन शहर भी शामिल है क्योंकि सभी नियम निर्माता वहीं निवास करते हैं। उन्होंने ‘सद्‌गति’ कहानी का जिक्र करते हुए कहा कि देश में विद्यमान जाति व्यवस्था को आग और पानी की जाति के जरिए सूक्ष्मता से वर्णन करते हैं। केरल विश्वविद्यालय की आलिया (बीए प्रथम वर्ष) ने प्रेमचंद के जीवन परिचय देते हुए उनके साहित्य को गांधीवाद से प्रभावित एवं कृषक समस्या पर केंद्रित बताया।

इसी कड़ी में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र अमित ने ‘दो बैलों की कथा ‘ कहानी पर केंद्रित करते हुए कहा कि रचना और रचनाकार दोनों अलग-अलग चीजें हैं। दोनों को अलग-अलग करके पढ़ना चाहिए क्योंकि लेखक का रचना क्षेत्र विस्तृत है। हीरा और मोती के उदाहरण देकर बताया कि प्रेमचंद मुक्ति को प्रमुखता देते हैं। दोनों के विचार विपरीत होने के बाद भी दोनों साथ होकर संघर्ष करते हैं। इसलिए अभी जितने भी संघर्ष हो रहे हैं सभी में हमें साथ होकर संघर्ष करने की जरूरत है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्यार्थी प्रिंसराज ने प्रेमचंद के निबंध ‘महाजनी सभ्यता’ पर विचार करते हुए बताया कि महाजन छोटे किसान को किस तरह गुलाम बनाते हैं। वहीं गोदान में होरी व उनके परिवार बिना इन शोषणकारी के अच्छे से जीवन जी सकते थे लेकिन उसके प्रवेश के साथ ही जीवन नरक हो जाता है। महाजन को कभी घाटा नहीं होता है।

साथ ही उन्होंने ग्राम्शी की सहमति के सिद्धांत का जिक्र करते हुए कहा कि शोषक वर्ग मान चुके हुए हैं कि हम शोषण के लिए ही बने हैं। होरी सामंतवाद का शिकार है तो वहीं गोबर सामंत से छूटने के बाद पूँजीवाद का शिकार। अभी की महाजनी सभ्यता वैश्विक स्तर पर पहुँच गई है लेकिन प्रेमचंद गांधी की यूटोपिया पर कायम हैं जहां सब समान हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र सौरभ ने प्रेमचंद के कथा साहित्य को ऐतिहासिक रूप में देखते हुए बताया कि शुरू की रचनाएं स्वतंत्रता संघर्ष से आदर्शवादी मानवीय मूल्यों की स्थापना करती दिखती है। प्रेमचंद ने यथार्थवाद के जरिए पूरे समाज की सच्चाई का सजीव चित्रण से जोड़ते हुए पूरे कथा साहित्य में संस्कार एवं उसके प्रति विद्रोह के स्वर को रेखांकित किया।

उन्होंने कहा कि “सदगति” में दुखी चमार के संस्कार एवं गोंड के द्वारा विद्रोह; ‘सेवासदन’ में गजाधर सुमन को आदर्श पत्नी/दासी के रूप दिखाना वहीं सुमन का प्रतिवाद तथा ‘कफ़न’ में कैसा बुरा रिवाज़ है कि जिसे जीते-जी तन ढाँकने को चिथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए!

प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी ने कहा कि साहित्य लगातार प्रासंगिक रहता है। इसके सबसे बड़े उदाहरण कबीर हैं। साहित्य हमेशा बना रहता है क्योंकि वह हमारे मूल मनोभाव को छूता है; आधार देता है। इसमें प्रेमचंद कुछ ज्यादा प्रासंगिक हैं क्योंकि उन्होंने जिन मुद्दों को उठाया था वे और भी ज्वलंत हो गए हैं। उनके पोते आलोक राय कहते हैं कि प्रेमचंद का अप्रासंगिक न होना मेरे लिए दु:ख की बात है। कई सवाल और समस्याएँ अभी सामने आनी बाक़ी हैं।

1936 के समय को विशिष्ट बताते हुए कहा कि प्रेमचंद को समझने के लिए प्रगतिशील लेखक संघ प्रथम अधिवेशन में दिए उनके अध्यक्षीय भाषण – ‘साहित्य का उदेश्य ‘ को एक कुंजी की तरह देखा जाना चाहिए। इसमें व्याख्यान की मुख्य तीन बाते रहीं। पहली बात, प्रगतिलेखक संघ भारतीय साहित्य में एक ऐतिहासिक अवसर है। दूसरी बात के तौर हमें सुंदरता की परिभाषा बदलनी होगी, जहां श्रम है वहां सुंदरता है।

तीसरी बात यह कि हम बहुत सो चुके अब और सोना मृत्यु का लक्षण है। हमें ऐसे साहित्य की ज़रूरत है जो हमें जगाए। प्रेमचंद के यहां वो बैचेनी शुरू से ही रही वो हमें छू लेती है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद दुःखों के कथाकार हैं, उनके साहित्य में दुःख व सुख के बीच तनाव है। इन दुःखों के तार को विजिबल रूप में प्रेमचंद अपने पात्रों के द्वारा व्यक्त करते हैं।

डॉ. बजरंग बिहारी ने प्रेमचंद के साहित्य में आए दलित जीवन और आज के दलित विमर्श में अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि ‘ठाकुर का कुआँ’ कहानी की गंगी के हाथ से घड़ा छूट जाता है, फूट जाता है वह पानी लिए बिना खाली हाथ घर चली जाती है लेकिन दलित साहित्य की गंगी को संविधान ने अधिकार दिया है। दलित विमर्श की गंगी घड़ा भरकर आती और ठाकुर को एक थाप भी लगाती। प्रेमचंद का साहित्य ग्लानिबोध का साहित्य है वहीं दलित साहित्य अधिकार-बोध का साहित्य है।

हिंदी विभाग, केरल विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष प्रो. आर. जयचंद्रन जी ने कहा कि प्रेमचंद जी हिंदी में एक मात्र लेखक हैं जिन पर पर कोई भी घंटो बोल सकता है। इनके कथा साहित्य की विशेषता यह है कि एक बार खोलकर पढ़ना शुरू कर दिये तो खत्म होने के बाद ही बंद होता है। समाज की घटती भूमिका का जिक्र करते हुए जयचंद्रन जी ने ‘निर्मला ‘ एवं ‘कफ़न‘ पर बात की।

प्रेमचंद ‘निर्मला’ में बेमेल विवाह के साथ-साथ अन्य समस्याओं को भी सामने लाते हैं। जहां समाज अपने आप को पीछे रखता है वहीं ‘कफन’ में भी समाज सुधरने की कोशिश नहीं करता है। घीसू और माधव चोरी करके गुजारा करते हैं लेकिन समाज उसे करने देता है।

केरल विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की डॉ. लीना बी० एल० ने कहा कि प्रेमचंद कथा सम्राट हैं। उन्होंने कहा कि जो समस्या पहले थी वह आज भी है। क्या किसान नही मर रहें हैं? केवल स्थितियाँ बदल गई हैं। उनका प्रश्न था कि आखिर इन समस्याओं का समाधान कब होगा?

इसी विभाग के दलित विमर्शकार डॉ. राजन डी ने कहा कि प्रेमचंद के कफ़न कहानी में न दलित जीवन है न ही विचार। दलित विमर्शकारों ने इस कहानी का विरोध किया। प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि को 2004 में इन्हीं विरोधों के कारण जलाया भी गया।

उन्होंने आगे कहा कि कमल किशोर गोयनका उनके वैयक्तिक और साहित्यिक जीवन के भेद का विरोध करते हुए कहा कि प्रेमचंद ने दलित समाज और रोटी-बेटी के बारे में प्रथम प्रयास किया है जो उनकी बड़ी विशेषता है। इसी हिस्से में इंद्रनाथ मदान को याद करते हुए डॉ. राजन ने ग्रामीण ट्रेंड (लोकल कलर) की विशेषता पर बल देते हुए उनकी प्रासंगिकता पर रोशनी डाली।

विभाग की सेवानिवृत्त प्रोफेसर एस.आर. जयश्री ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि इससे पहले जितने भी व्याख्यान हुए, उनमें उत्तर के लेखक के बारे में उत्तर के वक्ता बोलने आते थे जबकि आज की परिचर्चा ऐसी रही जिसमें पहली बार एक साथ उत्तर व दक्षिण विद्यार्थियों ने सहभागिता की।

उनका कहना था कि प्रेमचंद ने हमें सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन एवं आत्म परिष्कार करने का रास्ता दिखाया है। उनके बताए तरीके से नये सोच विचार का पथ प्रशस्त कर सकते हैं एवं विश्लेषण कर सकते हैं। ‘कफ़न’ कहानी पर बहुत चर्चा हुई लेकिन आज परिस्थितियां बदल गई हैं। पूँजीवाद पूरी तरह हावी है इसलिए आज के नजरिये से भी कफ़न को पढ़ा जाना चाहिए।

परिचर्चा के अंत में केरल विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की डॉ. इंदु ने प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी का विस्तार से परिचय दिया। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद का जैसा व्याहारिक जीवन है वैसा ही साहित्यिक जीवन है। प्रेमचंद से वे खुद प्रेरणा ग्रहण करती हैं। उन्होंने उपस्थित श्रोता समुदाय के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हुए परिचर्चा का समापन किया।

– सौरभ कुमार की रिपोर्ट

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