ओमसिंह अशफ़ाक की दो कविताएं

ओमसिंह अशफ़ाक की दो कविताएं

बाम्बी ऊपर नाग बैठग्या

 

ना रह्या आपस का प्यार रै बाबा !

बहण-भाई में बी तकरार रै बाबा !

 

सवारथ ने कर राख्खे आंधे,

न्यूं दिन में होया अंधकार रै बाबा !

 

अपणे ई अपणों के दुश्मन होगे,

यो बख़त बड़ा दुश्वार रै बाबा !

 

भले बख्तां में जो दिख्या करता,

गया मां का वो लाड़ दुलार रै बाबा!

 

म्हारे दिल में कसूत्ती आग बलै़ सै,

यो होया किसा त्योहार रै बाबा!

 

के सोच्ची थी और या के बणगी,

म्हारे घर में होया धुआंधार रै बाबा!

 

म्हारी बाम्बी ऊपर नाग बैठग्या,

यो हमनेई मारै फुफ़्कार रै बाबा!

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 अमन की दुआएं

 

ज़ख्मों को दिल के कहां लेके जाएं ?

गुजरी जो हम पे किसे हम सुनाएं !

 

यह न पता था वो रहबर बनेंगे,

जिस्मों में जिनके ना थी आत्माएं।

 

हो आखिरी सितम ये जरूरी नहीं है,

है मुमकिन हों बाकी और भी बलाएं?

 

शिकार पर निकले हैं तेल के सौदागर

भला वो क्यूं सुनेंगे हमारी सदाएं!

 

मिट जाए हस्ती बेशक हमारी,

यूं मिट ना सकेंगीं अनोखी अदाएं !

 

झुकना ही पड़ेगा जंगखो़रों को एक दिन,

रंग लाएंगी हमारी अमन की दुआएं !

4 thoughts on “ओमसिंह अशफ़ाक की दो कविताएं

  1. म्हारी बाम्बी ऊपर नाग बैठग्या।
    यो हमनेई मारै फुफ्कार रै बाबा!

    यादगार शे’र (मक़्ता) है।

    दूसरी ग़ज़ल का –
    यह न पता था वो रहबर बनेंगे,
    जिस्मों में जिनके ना थी आत्माएं।

  2. ओमसिंह अशफ़ाक, कुरुक्षेत्र (हरियाणा) says:

    हम डा. बजरंग बिहारी जी का हार्दिक स्वागत और आभार व्यक्त करते हैं कि उन्होंने अपने व्यस्त शिड्यूल् में से समय निकालकर कविताएं पढ़ी, पसंद की, और अपनी पसंदीदा पंक्तियों को उद्धृत भी किया है।
    हम अन्य लेखकों और सुधी-पाठकों से भी आग्रह करना चाहते हैं कि वे भी कविताएं पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया दे सकें तो हमें रचनात्मक सुधार करने का अवसर भी मिलेगा और एक रचनात्मक विमर्श की शुरुआत भी संभव हो सकेगी।

  3. ओमसिंह अशफ़ाक, कुरुक्षेत्र (हरियाणा) says:

    कवि के व्हाट्सएप पर श्री राजकुमार धीमान जी की यह संक्षिप्त टिप्पणी प्राप्त हुई है। अपने लिखे और पाठकों की सुविधा के लिए टिप्पणी हमने यहां प्रस्तुत कर दी है :
    ” वाकई,
    ” झुकना ही पड़ेगा जंगखोरों को एक दिन। ”
    -राजकुमार धीमान, सेवानिवृत्ति प्राध्यापक, राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय लाडवा (कुरुक्षेत्र) हरियाणा।

    1. आपकी लेखनी यूँ ही ज्वलन्त मुद्दे उठाती रहे।

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