डॉ. रीटा अरोड़ा की लघुकथा – सबसे बड़ा सहारा

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

लघुकथा

सबसे बड़ा सहारा

डॉ. रीटा अरोड़ा

“यार, चलो न, वर्मा जी के घर चलते हैं,” अमित ने कहा।

“अरे, क्या करेंगे जाकर? ऐसे समय में कोई शब्द ही नहीं मिलते,” रोहित ने टालते हुए जवाब दिया।

अमित बोला, “शायद शब्दों की नहीं, साथ की ज़रूरत होती है।”

दोनों पहुँचे। वर्मा जी चुपचाप एक कोने में बैठे थे। पत्नी का कुछ घंटे पहले ही निधन हुआ था।

अमित उनके पास जाकर बिना कुछ कहे बैठ गया। बस उनका हाथ अपने हाथ में ले लिया।

कई मिनट तक तीनों के बीच केवल खामोशी रही।

घर लौटते समय रोहित बोला, “तुमने तो उनसे एक भी बात नहीं की।”

अमित मुस्कुराया, “हर दर्द का जवाब शब्द नहीं होता। कई बार सिर्फ़ किसी का साथ ही सबसे बड़ी सांत्वना बन जाता है।”

कुछ महीनों बाद रोहित स्वयं अस्पताल में अपने पिता के साथ था। सबसे पहले जो चेहरा उसके सामने आया, वह अमित का था।

रोहित की आँखें भर आईं। वह समझ चुका था—मुश्किल समय में लोग यह नहीं याद रखते कि आपने क्या कहा था, बल्कि यह याद रखते हैं कि आप उनके साथ खड़े थे या नहीं।

~ डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल
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