उद्योगपति और व्यापारी हिंदी साहित्य से क्यों विमुख हो गए?

उद्योगपति और व्यापारी हिंदी साहित्य से क्यों विमुख हो गए?

शंभुनाथ

आधुनिक युग के आरंभ में, 19वीं सदी में ही हमने देखा है कि साहित्य मुख्यत: संपन्न मध्यवर्गीय लेखकों का मामला था। भारतेंदु हरिश्चंद्र और उस युग के कई लेखक खुद पत्र-पत्रिकाएं निकालते थे। उनके पास पैसे थे, जुनून था। उस युग के व्यापारी भी अलग धातु के थे। उनकी रुचि कला-साहित्य, शिक्षा, पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन और आधुनिक विचारों के प्रचार में भी थी, केवल मुनाफा कमाने में नहीं। ऐसे कामों से उन्हें सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती थी, उनकी छवि बनती थी।

हिंदी की पहली साहित्यिक संस्था नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना (1893) बनारस के क्वींस कॉलेज के विद्यार्थियों ने की थी। उनमें से एक श्याम सुंदर दास की उम्र तब 18 साल की थी। उस जमाने के मझोले उद्योगपतियों, व्यापारियों, छोटे जमींदारों तथा संपन्न घर के युवाओं में अपनी जातीय भाषा और साहित्य की उन्नति करने के लिए उत्साह था।

टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के साहू शांति प्रसाद जैन ने 1949 में ‘धर्मयुग’ का प्रकाशन शुरू कर दिया। उनकी पत्नी रमा जैन साहित्य प्रेमी थीं। दोनों ने मिलकर 1944 में भारतीय ज्ञानपीठ की स्थापना की। बिड़लाओं के ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ का प्रकाशन 1950 से शुरू हुआ।

पुरुषोत्तम दास हलवासिया ने रवींद्रनाथ की विश्व भारती में हिंदी भवन के निर्माण के लिए धन दिया था। उन्होंने सीताराम सेकसरिया द्वारा स्थापित भारतीय भाषा परिषद को अपना भवन बनाने के लिए एक पॉश इलाके में अपनी जमीन दी। एक संपन्न साहित्यप्रेमी बदरी विशाल पित्ती की ‘कल्पना’ पत्रिका आई। ऐसी कई अन्य पत्रिकाएं भी निकलीं।

उद्योगपतियों और व्यापारियों की पुरानी पीढ़ियां साहित्यकारों का सम्मान करती थीं। वे भारतीय भाषाओं के बीच पुल बनाती थीं। वे केवल अपना मुनाफा और मनोरंजन नहीं देखती थीं।

पश्चिमी देशों के उद्योगपतियों और व्यापारियों की भी साहित्य के संरक्षण में रुचि थी। एंड्रयू कारनेगी ने दुनिया भर में लगभग 2500 पुस्तकालयों के पोषण के लिए अपनी 90 प्रतिशत संपत्ति दान कर दी थी।

हिंदी क्षेत्र के संपन्न वर्ग भी साहित्यिक प्रकाशन, पत्र-पत्रिकाओं और पुरस्कारों में अपने पैसे लगाते थे। अधिक संपत्ति ने उन्हें सांस्कृतिक तौर पर तब उतना खोखला नहीं किया था, जितना आज वे हैं। आज व्यापारियों की साहित्यिक अभिरुचि हास्यास्पद हास्य कवि सम्मेलन और अन्य सतही चीजों की तरफ मुड़ गई है।

चार दशक पहले ही ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘सारिका’, ‘ज्ञानोदय’, ‘दिनमान’ जैसी व्यावसायिक पत्रिकाएं बंद कर दी गईं, हालांकि बांग्ला के आनंदबाजार पत्रिका ग्रुप की पत्रिका ‘देश’ बंद नहीं हुई। ‘मलयालम मनोरमा’ बंद नहीं हुई। केवल हिंदी क्षेत्र में ऐसा माना जाने लगा कि साहित्य अब एक अनुत्पादक खर्च है, पैसे की बर्बादी है।

बाजार का चरित्र बदल गया

बाजार का चरित्र बदल गया और इसका सबसे ज्यादा प्रभाव हिंदी क्षेत्र के लोगों और साहित्यिक बोध पर पड़ा। बड़े घरानों को हिंदी पिछड़ों की भाषा नजर आने लगी। बड़े व्यापारिक घरानों की नई पीढ़ी की रुचि हाई-फाई मनोरंजन, सेलेब्रेटी संस्कृति और विलासितापूर्ण पार्टियों में है। ये उनके प्रतिष्ठा चिह्न होते हैं।

मीडिया से साहित्य गायब हो गया

मीडिया से साहित्य गायब हो गया। उसमें एक तरफ पॉप कल्चर, फैशन पैरेड और उच्चवर्गीय विलास जीवन की छवियां होती हैं, दूसरी तरफ हल्की-फुल्की धार्मिक कथाएं। हिंदी के बड़े समाचार पत्र पार्टी ऑफिस, पान मसाला और ज्वेलरी की दुकान बन गए हैं!

शंभुनाथ के फेसबुक वॉल से साभार

लेखक प्रसिद्ध साहित्यकार, हिंदी के रिटायर्ड प्रोफेसर और साहित्यिक पत्रिका वागर्थ के संपादक हैं।

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