रणबीर सिंह दहिया की दो रागनी
रागनी..1
बदेशी पूंजी जो हम ल्याण लागरे
नकेल बिना बदेशी पूंजी देश मैं धुम्मा ठा देगी।।
खान जल जंगल जमीन सबनै चूसकै बगा देगी।।
सौ रुपये लगावैगी तो पांच हजार लूटकै लेज्यागी
खून पसीने की कमाई नै बैरण चूट कै लेज्यागी
अमीर गरीब की खाई या दिन ब दिन बढ़ा देगी।।
नकेल बिना……..
अपणे दलाल बणा कै गामां ताहिं या पहोंच गई
कर दारू नशे तैँ हमला इज़्ज़त म्हारी नोच लई
पोर्नोग्राफी मोबाईल मैं घर घर मैं पहोंचा देगी।।
नकेल बिना ……
मुठ्ठी भर नै देकै नौकरी पालतू पशु बनावैं सैं
जात पात पै बाँट कै कारपोरेट मौज उड़ावैं सैं
दंगे करवाकै देश मैं मानस घणे मरवा देगी।।
नकेल बिना …….
गरीब और गरीब होवें अमीरां की चाँदी होज्यागी
देश की घनखरी जनता या इसकी बांदी होज्यागी
कहै रणबीर भका भका कै म्हारै सांस चढ़ा देगी।।
17 मई 2015
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रागनी..2
वास्तव में हिन्दुस्तान तरक्की पर है। क्या बताया भला:
जमीन जल और जंगल पै अमीर कब्जा बढ़ावै सै।
गरीब लाचार खड़या आसमान तरफ लखावै सै।।
1
जमीन पै कब्जा करकै हाईटैक सिटी बनाते आज
उजड़ कै जमीन तै कित जावै ना खोल बताते आज
बीस लाख मैं ले कै किल्ला बीस करोड़ कमाते आज
इनके बालक तै ऐश करैं म्हारे ज्यान खपाते आज
आदिवासी नै जंगल मां तै हांगा करकै हटावै सै।।
गरीब लाचार खड़या आसमान तरफ लखावै सै।।
2
जंगल काट-काट कै गेरे ये मुनापफा घणा कमागे रै
आदिवासी दिये भजा उड़ै तै बहुत से ज्यान खपागे रै
मान सम्मान खातर लड़े वे ज्यान की बाजी लागे रै
देशी लुटेरे बदेशी डाकुआं तै ये चौड़ै हाथ मिलागे रै
किसान की आज मर आगी यो संकट मैं फांसी लावै सै।।
गरीब लाचार खड़या आसमान तरफ लखावै सै।।
3
बिश्लेरी पानी की बोतल बाजार मैं दस की मिलती रै
दूध सस्ता और पानी महंगा बात सही ना जंचती रै
साफ पानी नहीं पीवण नै बढ़ती बीमारी दिखती रै
पानी म्हारा दोहन उनका पीस्से की भूख ना मिटती रै
जमीन जंगल जल गया संकट बढ़ता ए आव सै।।
गरीब लाचार खड़या आसमान तरफ लखावै सै।।
4
औरत दी एक चीज बना बाजार बीच या बिकती रै
म्हंगाई बढ़ती जा कीमत एक जगहां ना टिकती रै
घणा लालची माणस होग्या हवस कदे ना मिटती रै
अमीरी गरीबां नै खाकै बी आज मा ना छिकती रै
रणबीर बरोने आला घणी साची लिखता घबरावै सै।।
गरीब लाचार खड़या आसमान तरफ लखावै सै।।
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