तीजन बाई को जनवादी लेखक संघ की ओर से श्रद्धांजलि, आखरी सलाम

तीजन बाई को जनवादी लेखक संघ की ओर से श्रद्धांजलि, आखरी सलाम

 

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई अब दुनिया में नहीं है। 5 जुलाई 2026 की सुबह रायपुर एम्स में उनका निधन हो गया। वे कई महीनों से गंभीर रूप से बीमार थीं।

चकित कर देने वाली अभिनय शैली के साथ छत्तीसगढ़ की पंडवानी की प्रस्तुति को उन्होंने लगातार विकसित किया था। लेकिन इन प्रस्तुतियों में उनका रंगीन फुंदने वाला तंबूरा एक स्त्री की हिम्मत और विद्रोह की याद दिलाता रहेगा। उनका तंबूरा कभी दुशासन की बांह बन जाता था. कभी भीम का गदा। कभी अर्जुन का धनुष-बाण। कभी रथ तो कभी द्रौपदी के खुले बाल। जिन लोगों ने तीजन बाई को महाभारत की कथा का वाचन करते हुए देखा है वे जानते हैं कि उनकी प्रस्तुति को जानदार और शानदार बनाने में उनका तंबूरा कितना प्रभावशाली था।

जमीनी ग्रामीण छत्तीसगढ़ी महिला के रूप में कभी हाट-बाज़ारों में दातौन बेचने और गोबर बीनकर कंडे पाथने वाली तीजन बाई का सारा जीवन संघर्षों से भरा रहा है। अपनी पारिवारिक स्थितियों के कारण तीजन बाई के पास शिक्षा की औपचारिक डिग्री नहीं थीं, लेकिन मंच को रणक्षेत्र में बदल देने वाली तीजन बाई कापालिक शैली में महाभारत की कथा की कुछ ऐसी प्रस्तुति करती थीं कि दर्शक हैरत में पड़ जाते थे। उनके द्वारा महाभारत के प्रत्येक प्रसंगों की प्रस्तुति इतनी सजीव होती थी कि लगता था सब कुछ उनकी आंखों के सामने घट रहा है।

उन्होंने देश विदेश की सैकड़ों यात्राएं कीं। बड़े बड़े राजनेताओं का दौर देखा पर अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान, पंडवानी की वैश्विक प्रस्तुतियों और विभिन्न पुरस्कारों के बावजूद उनकी सहजता , विनम्रता और सादगी हमेशा बनी रही।

मंच पर पूरी श्रद्धा से अनुशासित रहते हुए उनकी प्रस्तुतियां मन मोह लेती थीं पर निजी जीवन में अनुशासन को ठेंगा दिखाना उनके लिए सामान्य बात थी। यही उनके व्यक्तित्व की खूबी थी। पंडवानी के पौराणिक व्याख्यान के बीच वर्तमान समय की विसंगतियों पर चोट उन्हें परंपरागत व्याख्याकारों से अलग-थलग करता था। उनका प्रेम… उनका वैवाहिक जीवन….सब कुछ उनकी अपनी मर्जी से निर्धारित था।

कई विश्वविद्यालयों की मानद उपाधियों, पद्मश्री, पद्मभूषण से सम्मानित तीजन बाई भले ही अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी हिम्मत, उनका तंबूरा और जीवन की युद्धभूमि में उसका विद्रोह देश और दुनिया में उनके चाहने वाले कभी विस्मृत नहीं कर पाएंगे। उन्होंने आख्यानों को छत्तीसगढ़ी और हिंदी के मिश्रित संवादों से आम जनता के समझ में आने वाली भाषा में प्रस्तुत करके लोकप्रिय करने का महत्वपूर्ण कार्य किया तथा अपनी शैली विकसित की।

तीजन बाई को जनवादी लेखक संघ की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि।

गहरे दु:ख के साथ इस अनमोल लोक कलाकार को अलविदा ।

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