राजकुमार कुम्भज की कविता – जी रामजी

कविता

जी रामजी

राजकुमार कुम्भज की

 

वंदे मातरम्

वंदे माताराम

वंदे भ्राताराम

वंदे तोताराम

वंदे छोटाराम

वंदे मोटाराम

भारतमाता की जै

राजमाता की जै

संपत्तिराय की जै

चंपतराय की जै

और ये रामजी किधर है भाया?

नहीं मालूम,मैं तो बैंकाक गया था

जी रामजी!

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