ओमप्रकाश वाल्मीकि : एक संस्मरण (भाग-1)
बजरंग बिहारी तिवारी
जुलाई 2004 में ‘दलित प्रश्न’ कॉलम की शुरुआत हुई थी। उदारमना संपादक हरिनारायण जी के कारण इस स्तंभ ने दो दशक की यात्रा पूरी कर ली है। इस यात्रा में साथ बने रहने, साथ देने और ज़रूरत पड़ने पर चेताने वाले आप सभी पाठक मित्रों और शुभचिंतकों का बहुत आभार।
2003 के जनवरी माह में कथादेश में मेरा पहला लेख छपा था- ‘दलित साहित्य विमर्श में स्त्री’। इस लेख में मैंने पहली बार दलित विमर्श में मौज़ूद पितृसत्तात्मक मूल्यों पर खुलकर लिखा था। लेख का तेवर बहुत तल्ख़ था। पूरे वर्ष इस मुद्दे पर ‘कथादेश’ में बहस होती रही। इन बहसों से जो सीखा वह यह था कि मुक्तिकारी होने का दावा करने वाले विमर्शों की अंतःप्रकृति की कड़ाई से छानबीन होनी चाहिए, होती रहनी चाहिए।
अगले साल हरिनारायण जी और उनके सहयोगी श्रीधरम साहब ने कॉलम लिखने का ऑफर दिया। हिंदी दलित साहित्य का लेखा-जोखा पेश करने के मक़सद से मैंने एक वर्ष के लिए यह स्तंभ लिखने का वायदा करते हुए ऑफर स्वीकार किया।
इसके बाद न कभी हरिनारायण जी ने स्तंभ बंद करने के लिए कहा और न कभी मैंने पीछे मुड़कर देखा। कॉलम लिखने के जुनून में भक्तिकाव्य पर चल रहा मेरा पूर्ववर्ती शोध कार्य ठहर गया। यह कार्य ‘तद्भव’ पत्रिका में सिलसिलेवार छपने लगा था और मुझे उस पर बड़े अच्छे प्रतिसाद मिल रहे थे। भक्ति वाला काम रुक जाने से मेरे कई हितैषी नाराज़ भी हो गए।
उनकी नाराज़गी के प्रति मेरे मन में सम्मान है। नाराज़गी तो इस दलित प्रश्न स्तंभ से भी कई लोगों को हुई मगर वह दीगर वज़हों से। कल तक मेरे कई मित्र यह कहा करते थे कि दलित साहित्य पर ग़ैरदलित लिखने से क्यों बचते हैं। वही अब यह कहने लगे कि जब हम लोग लिख रहे हैं तो आपको लिखने की क्या ज़रूरत है।
‘दलित साहित्य में घुसपैठ’ शीर्षक से एक पत्रिका के संपादक ने लेखमाला ही चलाई। इन्हीं सब झंझावातों के बीच ओमप्रकाश वाल्मीकि से मेरे संबंध रूपाकार लेते गए। अपने कॉलम में मैंने उन पर सर्वाधिक लिखा। उनसे लिखवाया भी। स्तंभ के लिए उनसे लिया गया इंटरव्यू खासा चर्चित रहा।
उस सीरीज़ में कई रचनाकारों, दलित चिंतकों और ज़मीनी कार्यकर्ताओं के इंटरव्यू छपे। वाल्मीकि जी अक्सर कॉलम की सामग्री पर अपनी राय देते थे। वे इस बात से सहमत थे कि दूसरी भारतीय भाषाओँ का दलित साहित्य हिंदी पाठकों को उपलब्ध कराया जाना चाहिए। विषमता के विरुद्ध संघर्ष कर रहे रचनाकारों, समाजकर्मियों के कार्यों को एक मंच पर लाया जाना आवश्यक है।
एम.ए. की कक्षाओं में हमारे जागरूक शिक्षक जिन समकालीन लेखकों का उल्लेख करते थे वाल्मीकि जी उनमें से एक थे। वे कवि और कहानीकार के रूप में समादृत हो रहे थे। 1997 में उनकी आत्मकथा ‘जूठन’ छपी। तब तक मैंने एम.फिल. कर लिया था।
जेएनयू कैंपस के सफाईकर्मियों के बीच साक्षरता अभियान चलाते हुए मुझे 5 वर्ष हो चुके थे। दिल्ली जैसे महानगर और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे परम जागरूक कैंपस में जाति और पितृसत्ता किस तरह काम करती है, इसका मुझे किंचित व्यावहारिक ज्ञान हो गया था।
1995 से मैं ‘हंस’ पत्रिका के लिए लिखने लगा था। दरियागंज स्थित राधाकृष्ण प्रकाशन से आई ‘जूठन’ पर मेरी समीक्षा ‘कागद की लेखी का अंतर’ राजेंद्र यादव जी ने सहर्ष छापी। 1997 में आत्मकथा छपी और ‘हंस’ के अक्टूबर 1997 अंक में यह समीक्षा। ‘हंस’ में बहुधा प्रतीक्षा सूची के अनुसार रचनाएं, समीक्षाएँ प्रकाशित होती थीं।
लंबा इंतज़ार करना पड़ता था। किंतु, मेरी समीक्षा को इंतज़ार नहीं कराया गया। संपादक की प्राथमिकताएँ स्पष्ट थीं और सर्वज्ञात भी। वैसे भी, वाल्मीकि जी राजेंद्र जी के निकट लोगों में थे। इस समीक्षा ने कई लोगों से परिचय कराया।
अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान के प्रो. तुलसीराम यह समीक्षा पढ़कर प्रभावित थे। तब मैं साबरमती हॉस्टल में रहता था। तुलसीराम जी ने मुझे बुलवाया और समीक्षा की तारीफ़ की। इस समय तक वे दलित साहित्य के स्पष्ट पक्षधर नहीं हुए थे।
बाद में जब और आत्मकथाएँ छपीं तब उनकी प्रतिकूल टिप्पणी सुनने को मिली कि दलित साहित्य का मतलब आत्मकथा लेखन तक सिमट गया है। यह चमत्कार बाद में हुआ कि उन्होंने स्वयं आत्मकथा लिखी। ‘मुर्दहिया’ नामक इस आत्मकथा ने उन्हें प्रसिद्धि के शिखर तक पहुँचाया। ‘मुर्दहिया’ को मिलने वाली प्रशंसा के मध्य उन्होंने उसके अगले दो भागों की योजना बना ली थी।
दूसरा भाग ‘मणिकर्णिका’ के नाम से छपा और चर्चित हुआ। तीसरा भाग पूरा हो और छपे इसके पहले उनका परिनिर्वाण हो गया। मुझे तुलसीराम जी से संवाद करने का मौका मिला, उनकी निकटता प्राप्त हुई इसका श्रेय ‘जूठन’ पर लिखी मेरी समीक्षा को जाता है। यह ‘जूठन’ की एकदम आरंभिक समीक्षाओं में है।
यह बात 1998-99 की होगी। तब मैं जेएनयू में पीएच. डी. का शोधछात्र था। विश्वविद्यालय में लिटरेरी क्लब हुआ करता था। ख़ासा एक्टिव क्लब था। उस समय इसकी कन्वीनर अर्जुमंद आरा थीं। मैं इसका मेंबर था। रामचंद्र और कुछ अन्य विद्यार्थी भी इसके सदस्य थे। क्लब की बैठक में हमने ओमप्रकाश वाल्मीकि जी को कविता-पाठ और व्याख्यान हेतु आमंत्रित करने का तय किया।
वाल्मीकि जी आए और बड़ा गहमा-गहमी भरा कार्यक्रम हुआ। कार्यक्रम कावेरी हॉस्टल मेस में डिनर के बाद था। मेस श्रोताओं से भर गया था। दलित साहित्य को लेकर हर श्रोता के अपने सवाल थे, शंकाएं थीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. मैनेजर पांडेय जी ने की थी। देर रात तक बहस होती रही। कई साहित्यप्रेमी इस आशंका से दुखी थे कि दलित साहित्य को अलग धारा के रूप में रखने से साहित्य की ‘एकता’ बँट जाएगी।
कुछ का दुख यह था कि प्रेमचंद, निराला, नागार्जुन आदि को दलित साहित्यकार क्यों नहीं माना जा रहा। साहित्य-सौंदर्य में रचे-बसे कुछ रसिक स्वानुभव पर एकांतिक बल देने से संतप्त थे। वाल्मीकि जी और मैनेजर पांडेय सर ने इस प्रश्नों के भरसक जवाब दिए।
वातावरण कुछ ऐसा था कि उनके जवाबों ने विचारोत्तेजना बढ़ाई। सवर्ण मानस के विद्यार्थियों की संख्या ज़्यादा थी। वे साहित्यिक प्रश्नों में उलझने के स्थान पर इस रोष में डूबे थे कि जाति के आधार पर आरक्षण क्यों दिया जा रहा है। मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होने के बाद आरक्षण विरोध के नाम पर जो देशनाशक हिंसक अभियान चला था उसकी लपट अब भी कैंपस में मौज़ूद थी। इस आरक्षण का लाभ पिछड़े वर्ग को मिलना था लेकिन इससे उपजे गुस्से का सामना सबसे ज़्यादा दलित बुद्धिजीवियों और रचनाकारों ने किया। आरक्षण के औचित्य पर उन्हें सबसे अधिक बोलना और झेलना पड़ा।
कार्यक्रम के उपरांत देर रात चली आपसी बातचीत के दौरान वाल्मीकि जी ने मुझसे थोड़ा घुमा-फिराकर मेरी ‘असली’ जाति जाननी चाही। तब वह बात आई-गई हो गई लेकिन वाल्मीकि जी की जिज्ञासा बनी रही। बाद के दिनों में उन्होंने साफ़-साफ़ शब्दों में पूछा कि नाम के साथ ‘तिवारी’ लगाते हो वह तो ठीक है लेकिन असल में किस बिरादरी के हो।
वस्तुतः वाल्मीकि जी ऐसे कई लोगों को जानते थे जो जाति छिपाकर या कोई अनुकूल ‘सरनेम’ लगाकर रह रहे थे। उनकी कुछ कहानियों में ऐसे पात्र दिखाई पड़ जाएंगे। मेरे जवाब पर उन्हें शायद यक़ीन न हुआ। वे अंतिम दिनों तक अपना प्रश्न दुहराते रहे।
इस प्रकरण का दूसरा सिरा यह है कि प्रौढ़ शिक्षा अभियान से जुड़ने के बाद मैंने कई वर्षों तक जेएनयू के सफाईकर्मचारियों के मध्य साक्षरता प्रसार का कार्य किया। भारत सरकार के प्रौढ़ शिक्षा निदेशालय से निकलने वाली पत्रिका ‘साक्षरता मिशन’ के संपादन से भी औपचारिक रूप से जुड़ा रहा।
इस दौरान मेरे जो लेख छपे मैंने उनमें नाम के साथ जातिसूचक शब्द नहीं लगाया। बसपा से जुड़े मेरे ‘मित्रों’ ने इस पर आपत्ति की और इसे भ्रम फैलाने वाला बताया। सोचने-विचारने के बाद मुझे उनका तर्क सही लगा और मैं तदनुसार करने लगा। भ्रम मिटा लेकिन नए भ्रम की संभावना भी बनी। वाल्मीकि जी को संभवतः इस उलटफेर की जानकारी रही हो और वे इसीलिए वस्तुस्थिति मालूम करना चाह रहे हों।
वाल्मीकि जी की हस्तलिपि बड़ी सुंदर थी। वे अक्सर पोस्टकार्ड लिखते थे। कभी कोई लेख छपा तो उसकी सूचना ज़रूर देते थे। कविता-कहानी के प्रकाशन की भी ख़बर देते थे। ‘जूठन’ पर लगातार चर्चा हो रही थी। अरुणप्रभा मुखर्जी द्वारा इसके अंग्रेजी अनुवाद के कारण किताब की अंतरराष्ट्रीय पहुँच हो गई थी। यह अनुवाद पुरस्कृत भी हुआ था।
वाल्मीकि जी इन सबसे ऊर्जस्वित-उत्साहित थे। वे बेहिसाब नहीं लिखते थे। लिखने से पहले योजना बनाते थे। मित्रों से मशविरा करते थे। कई बार ऐसा नहीं भी करते थे।
‘दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’ किताब के संदर्भ में ऐसा ही हुआ था। ठहरकर लिखी जाती तो यह बेहतर किताब बनती। वाल्मीकि जी की दो किताबें विवाद के घेरे में आईं। सफाई कामगार समुदाय के इतिहास पर उन्होंने जो किताब लिखी उसे संजीव खुदशाह की इसी विषय पर लिखी किताब से बिना क्रेडिट दिए सामग्री लेने वाली किताब कहा गया।
संजीव खुदशाह ने इसे मुद्दा बनाया और उनके समर्थन में कई लोग रहे। इसी तरह कांचा इलैया की आत्मकथा ‘मैं हिंदू क्यों नहीं हूँ’ के अनुवाद को लेकर डॉ. मुकेश मानस ने आरोप लगाया कि वाल्मीकि जी ने उनके अनुवाद के सहारे अपना अनुवाद कर दिया है।
दोनों ही विवादों के संबंध में वाल्मीकि जी का कोई लिखित स्पष्टीकरण हमारे पास नहीं है। उनकी आत्मकथा ‘जूठन’ के दूसरे भाग में (जो उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुआ) इन विवादों पर कुछ नहीं मिलता। निजी बातचीत में भी वे इन पर बोलने से बचते प्रतीत होते थे।
सरकारी कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और अन्य प्रतिष्ठानों में इन दिनों दलित साहित्य को लेकर खामोशी है। शिक्षक और बुद्धिजीवी चुप रहकर समय काट रहे हैं या अतीत का गुणगान करने वाला कार्यक्रम करवा रहे हैं। आलोचनात्मक आवाजों पर अघोषित पाबंदी है।
2015 में कँवल भारती ने लिखा था कि अब तमाम विश्वविद्यालयों में स्थापित आंबेडकर पीठ, फुले अध्ययन केंद्र, इन्क्लुज़न/ एक्सक्लूज़न सेंटर या तो निष्क्रिय कर दिए जाएँगे या वे भजन-कीर्तन के अड्डे बन जाएँगे। उनकी बात क्रमशः सच साबित होती गई।
आज कहीं रस्मी तौर पर इस विषय पर संगोष्ठी होती भी है तो वह निष्प्राण नज़र आती है।
वाल्मीकि जी के समय उच्च शिक्षा संस्थान दहशत के साये में नहीं थे। दलित साहित्य पर खूब गोष्ठियाँ होती थीं। उनमें विषय के विभिन्न पहलुओं पर खुलकर चर्चा होती थी।
प्रसंग आने पर सत्ता और सरकार को भी नहीं बख्शा जाता था। जिस महाविद्यालय में मैं कार्यरत हूँ वहाँ दलित साहित्य पर कई कार्यक्रम आयोजित हुए थे। वाल्मीकि जी कई कार्यक्रमों में आए। उनके कहानी पाठ, कविता पाठ में श्रोताओं का खूब जमावड़ा हुआ करता था। लोग उनकी तक़रीर सुनने के लिए उत्सुक रहा करते थे।
ऐसा भी हुआ कि प्रश्नोत्तर सत्र में वाल्मीकि जी किसी सवाल पर आक्रोशित हो गए और उन्हें बमुश्किल शांत कराया गया। यह उनके स्वभाव में था कि वे बहुत जल्दी तैश में आ जाते थे। लिखते समय वाक्य में कहीं अगर ‘है’ या ‘था’, ‘थी’ आ जाए तो वे तुरंत पूर्ण विराम का चिह्न (।) लगा दिया करते थे।
यह नहीं देखते थे कि अभी वाक्य पूरा नहीं हुआ है। हाँ, किसी विवादित मुद्दे पर जब उनसे राय ली जाती थी तब वे बहुत सोच-समझकर बोलते थे। पूर्वोद्धृत ‘दलित साहित्य विमर्श में स्त्री’ लेख में उनकी भी आलोचना की गई थी। उनकी चर्चित ‘अम्मा’ कहानी को आधार बनाकर मैंने उन्हें पारंपरिक स्त्री विरोधी समझ का पैरोकार बताया था।
उन्होंने मुझसे तो इस बारे में कुछ नहीं कहा लेकिन जब हम दोनों के किसी कॉमन परिचित ने इस लेख पर उनकी राय जाननी चाही तो उन्होंने कहा कि लेखक ने जो लिखा सो ठीक है लेकिन उसकी निगाह दलित साहित्य के कमज़ोर पक्ष पर ही क्यों गई है।
इससे पहले मेरे दलित साहित्य पर जो लेख छपे थे वे सब अनालोचनात्मक थे। राजेंद्र यादव जी कहा करते थे कि अभी दलित साहित्य को सराहने का वक़्त है। आलोचना का समय बाद में आएगा। मैं उनकी इस बात को स्वीकारता था और दलित साहित्य के पक्ष में माहौल बनाने की गरज़ से लिखा करता था।
2008 की बात होगी जब ‘कथादेश’ के वार्षिक आयोजन में हम दोनों को व्याख्यान देना था। चर्चा के केंद्र में दलित कहानी थी। मैंने अपने पर्चे में यह आपत्ति दर्ज़ कराई थी कि दलित कहानीकार प्रेम को अपनी रचना का थीम नहीं बनाते। वे प्रेम के संबंध में पुरातन सोच से अभी मुक्त नहीं हो पाए हैं।
उन्हें लगता है कि प्रेम और शृंगार पर लिखने से हमारे कलम की ताकत क्षीण हो जाएगी, हम भटक जाएँगे। दलित कहानीकार यह नहीं विचारते कि प्रेम रैडिकल भी हो सकता है। उसके ज़रिए सामाजिक जकड़बंदियों को तोड़ा जा सकता है।
वाल्मीकि जी ने इस स्थापना के विरुद्ध स्टैंड लिया। बड़े आक्रामक तेवर के साथ उन्होंने दलित कहानी की क्रांतिकारी विषयवस्तु पर रोशनी डाली। यह कहा कि आलोचक (बजरंग बिहारी) की इच्छा है कि दलित कहानीकार आंबेडकर की राह छोड़कर गुलशन नंदा की राह पकड़ लें। मेरे तर्कों को छिन्न-भिन्न करने के बाद वे अपनी कुर्सी पर आ गए। मेरी कुर्सी उनके ठीक बगल में थी।
हम दोनों एक दूसरे की तर्क पद्धति का खुलासा करते हुए हँस-हँस कर बातें करने लगे। इस दृश्य ने अगले वक्ता को आक्रोशित कर दिया। आवेश में बोलते हुए वक्ता महोदय ने कहा कि इन दोनों ने काठ के तलवार से पूर्वनियोजित लड़ाई लड़ी है और हमें मूर्ख समझ लिया है।
उनका मंतव्य था कि हम एक दूसरे के विरोधी की तरह व्यवहार करें। वे उम्मीद कर रहे थे कि इस वैचारिक तकरार के बाद हम अलग-अलग दिशाओं में मुँह फुलाए बैठे नज़र आएंगे। खैर, यह विवाद बाद में लिखित रूप में भी प्रकाशित हुआ।
इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफ़ेसर आशुतोष कुमार तब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में थे। उन्होंने एक पत्रिका के प्रेम विशेषांक का अतिथि संपादन किया था। इसमें वाल्मीकि जी के प्रत्युत्तर-लेख के साथ मेरा लेख छापा गया था।
कालांतर में कई नए दलित कथाकारों का उभार हुआ। उन्होंने प्रेम कहानियाँ लिखीं। इन प्रेम कहानियों को संकलित करके (कुछ लिखवा करके) कैलाश चंद्र चौहान ने ‘कदम’ पत्रिका का एक दलित प्रेम कहानी विशेषांक (2015) प्रकाशित किया था।
इस थीम पर तीन विशेष लेख शामिल किए गए- डॉ. जयप्रकाश कर्दम, डॉ. गुलाब सिंह और मेरा। तब तक वाल्मीकि जी होते तो निश्चय ही इस बहस में कुछ नया जोड़ते। यह अंक बड़ा मक़बूल हुआ। अंक की सामग्री के आधार पर हिंदी और मराठी में किताब भी आई। मराठी अनुवाद अरविंद सुरवाड़े ने किया था।
2004 का प्रसंग है। समता संदेश ने उदयपुर में दलित साहित्य पर एक कार्यक्रम करवाया था। समाजवादी विचारों को लेकर चलने वाला यह अखबार महावीर जैन और हेमेन्द्र चंडालिया आदि लेखक कार्यकर्ता चलाते थे। जन हितैषी निर्भीक विचारों का वाहक यह पत्र बड़ा गौरवशाली रहा है।
उस साल वार्षिक कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने में हिमांशु पंड्या, पल्लव आदि की भूमिका थी। बाहर से हम तीन वक्ता आमंत्रित थे- प्रो. शिवकुमार मिश्र और ओमप्रकाश वाल्मीकि। वाल्मीकि जी देहरादून से दिल्ली आ गए थे। तय योजना के अनुसार यहाँ से हमने एक साथ उदयपुर के लिए ट्रेन पकड़ी।
हमारा टिकट स्लीपर क्लास में था। वाल्मीकि जी पत्नी (चंदा भाभी) के साथ थे और मेरे साथ दर्ज़ा तीन में पढ़ रही मेरी छोटी बेटी थी। वाल्मीकि जी प्रायः पत्नी के साथ ही यात्रा करते थे, संगोष्ठियों में आते-जाते थे। यह चीज़ उन्हें अन्य दलित लेखकों से अलग करती थी।
इस यात्रा में मैंने वाल्मीकि जी का वत्सल रूप देखा। उन्होंने बहुत जल्दी बेटी से ताऊ का नाता जोड़ लिया। घुलमिल गए। शब्दों को पहचानने और शब्दों को बनाने के कई खेल सिखा दिए। चंदा भाभी आस्थावान स्त्री थीं। वाल्मीकि जी नास्तिक थे। नास्तिक लोगों के साथ जो अहंकार जुड़ा होता है वह उनमें नहीं था।
चित्तौड़गढ़ और उदयपुर में कई मंदिर हैं। भाभी उनमें श्रद्धा भाव से दर्शन के लिए गई थीं। वाल्मीकि जी नहीं गए। न कोई प्रतिकूल टिप्पणी की न मुँह बनाया। वे मंदिर के बाहर रहे। उन दोनों में बड़ी परिपक्व ‘म्यूच्यूअल अंडरस्टैंडिंग’ दिखी।
बाहर रहकर वाल्मीकि जी लोगों से आसपास की आबादी के बारे में पूछते रहे, बात करते रहे। तीन दिन हम लोग साथ रहे। चंदा भाभी ने बेटी की मातृवत देखभाल की। बेटी उन दोनों से खूब घुलमिल गई। इसके पहले मैं उनके व्यक्तित्व के इस पहलू से अनजान था। मन में एक पूर्वग्रह पाले हुए था।
साहित्य अकादमी ने 2007 में भारतीय काव्यशास्त्र पर विश्वकोश तैयार करने के उद्देश्य से शुरू हुई परियोजना में मुझसे संपर्क किया था। उनकी तरफ से वागीश शुक्ल जी ने मुझसे दलित साहित्य चिंतकों और रचनाकारों के नाम मांगे। मैंने जो नाम दिए उनमें वाल्मीकि जी, शरणकुमार लिम्बाले और प्रो. विमल थोरात के नाम थे।
इस संबंध में साहित्य अकादमी में दो-तीन सार्थक बैठकें हुईं। दलित साहित्य विमर्श में प्रयुक्त होने वाले पारिभाषिक शब्दों की सूची बनाई गई। उन पर छोटी-बड़ी प्रविष्टियाँ लिखी जाने लगीं।
इस बीच वह परियोजना ही ठप्प पड़ गई। इन्हीं बैठकों के लिए दिल्ली आने पर वाल्मीकि जी और लिंबाले सर मेरे आवास आए।
वाल्मीकि जी ने बातों-बातों में सेवानिवृत्ति के बाद पुणे शहर में बसने की इच्छा प्रकट की और लिंबाले सर से उपयुक्त रिहाइश खोजने को कहा। भारत सरकार के आयुध कारखाने में अपनी ट्रेनिंग के दौरान वाल्मीकि जी चंद्रपुर महाराष्ट्र में रह चुके थे। उन्हें कामचलाऊ मराठी आती थी। उन्होंने मराठी से लोकनाथ यशवंत आदि रचनाकारों के कुछ अनुवाद भी किए थे। पैंथर की गतिविधियों और उपलब्धियों से वे परिचित थे।
हिंदी के अन्य दलित रचनाकारों से उनकी भिन्नता में इस पहलू की भी भूमिका थी। पुणे या सतारा में बसने की इच्छा का इज़हार वे बाद में भी करते रहे। कई सालों बाद रिटायरमेंट के अवसर पर उन्होंने देहरादून में जो पार्टी दी उसमें मुझे भी आमंत्रित किया। बोले कि आओ तो तुम्हें कमल उपाध्याय से मिलवाऊंगा।
कमल उनकी बहुपठित ‘सलाम’ कहानी का एक अविस्मरणीय पात्र है। देहरादून में मैंने उनके थिएटर के दिनों के कुछ संगी-साथियों से मुलाक़ात की और ‘कमल उपाध्याय’ से भी मिला। हरपाल सिंह ‘अरुष’ उन दिनों खूब लिख रहे थे और वाल्मीकि जी के निकट थे।
‘अरुष’ जी ने वाल्मीकि जी की कहानियों पर आलोचनात्मक निबंधों की किताब तैयार की थी। अपनी फैक्ट्री के साथी और साहित्यिक मित्र शिवबाबू मिश्र से उनकी अंतरंगता थी। शिवबाबू पर वे बहुत भरोसा करते थे। यह भरोसा अंत तक बना रहा।
2005 अगस्त महीने के अंतिम दिन तहसील गोहाना (हरियाणा) में जातिवादी हिंसा की एक घटना घटी। वाल्मीकि बस्ती पर हमला करके करीब 60 घरों को लूट लिया गया और फिर तोड़फोड़ करने के बाद उन्हें आग के हवाले कर दिया गया। वस्तुस्थिति जानने के मक़सद से मैं यहाँ गया और लौटकर जो रिपोर्ट लिखी वह अगले महीने ‘कथादेश’ के मेरे कॉलम में छपी।
वाल्मीकि जी इस घटना से व्यथित थे। इससे पहले अक्टूबर 2002 में झज्जर जिले की दुलीना पुलिस चौकी इलाके में पाँच दलित युवकों को पीट-पीट कर मार डाला गया था। उन पर गौ-वध करके खाल उतार लेने का आरोप था। इस हत्याकांड में शामिल अपराधियों ख़ासकर
पुलिसकर्मियों को वाज़िब सज़ा तब मिलती जब प्रशासन और न्याय व्यवस्था ऐसा चाहती।
फिर तो ऐसी हिंसा का हरियाणा में सिलसिला चल पड़ा। (ऐसे, हिंसा पहले से ही चली आ रही थी।) वाल्मीकि जी ने गोहाना कांड पर उपन्यास लिखने की इच्छा जताई। यह उचित ही था।
उन्होंने मुझसे इस घटना से संबंधित विवरण मांगे। मैंने अपनी रिपोर्ट अग्रसारित कर दी। उन्होंने कहा कि ‘कथादेश’ तो उन्हें मिलता ही है, वह डायरी दीजिए जिसमें आपने सारे विवरण दर्ज़ किए हैं।
मेरी शर्त थी कि आप मेरे साथ गोहाना चलें। पीड़ितों से मिले। उनके पुनर्वास की आवाज़ उठाएँ। वाल्मीकि जी इससे सहमत नहीं थे। हम दोनों के बीच यह झगड़ा पहले से था। मेरा मानना था कि रचनाकार को एक्टिविस्ट भी होना चाहिए। वे इस माँग को रचनाकार के साथ ज़्यादती मानते थे। न वे मेरे साथ गोहाना चलने को तैयार हुए और न मैंने उन्हें अपनी नोटबुक दी। उस उपन्यास (आईडिया) का क्या हुआ, पता नहीं।
(क्रमशः) दूसरा पार्ट पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।
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