लोककथा
नया ग़ज़नी और सोने का मंदिर
त्रिभुवन
बहुत पुरानी बा,त है। इतनी पुरानी कि उस समय इतिहास किताबों में नहीं, अफ़वाहों में लिखा जाता था। उन दिनों एक लुटेरा था — महमूद ग़ज़नी। वह घोड़ों पर बैठकर हज़ारों कोस दूर से आता था। रास्ते में रेगिस्तान थे, पहाड़ थे, नदियाँ थीं, सेनाएँ थीं, तलवारें थीं, धूल थी, थकान थी — सब झेलकर वह मंदिर तोड़ता था, सोना लूटता था और लौट जाता था। यही उसका धंधा था। यही उसकी पहचान थी।
लेकिन धंधे में बड़ी मेहनत थी। बहुत खून-खच्चर था।
एक दिन उसे एहसास हुआ कि उसकी उम्र ढल रही है। उसने अपनी तलवार को देखा, घोड़े को देखा और हिसाब लगाया। मन ही मन बोला, “यह काम बहुत घाटे का है। मंदिरों तक पहुँचने में आधी ताक़त जाती है, तोड़ने में बाकी आधी। दो-दो हज़ार किलोमीटर चलना और घोड़ों की पीठ पर लदे रहना। ऊपर से लोग बदनाम करें सो अलग। लूट भी सीमित और यश तो बिल्कुल नहीं। इससे अच्छा कोई नया उपाय खोजो।”
उसी रात उसे एक सपना आया।
सपने में एक सोने की सड़क थी– लंबी, चिकनी, चमकती हुई। सड़क के अंत में एक विशाल मंदिर था, जो टूटा नहीं था, पहले से भी अधिक दीप्तिमान था। उसके चारों ओर भीड़ थी — सिर झुकाए, हाथ जोड़े। कोई चाँदी चढ़ा रहा था, कोई सोना, कोई ज़मीन की रजिस्ट्री, कोई डॉलर में भरा लिफ़ाफ़ा, कोई नकद, कोई चेक, कोई हीरे, कोई जवाहररात। और मंदिर के द्वार पर एक आदमी बैठा था — माथे पर चंदन-तिलक, कंधे पर केसरिया अंगवस्त्र, गले में रुद्राक्ष की माला, और हाथ में एक रसीद-बुक।
गज़नी ने पूछा — “यह कौन है?”
स्वप्न ने उत्तर दिया — “यह तुम ही हो — लेकिन सुधरे हुए।”
गज़नी चौंका — “मैं? लेकिन मैंने तो मंदिर तोड़े थे!”
स्वप्न हँसा — “मूर्ख! मंदिर तोड़ना पुरानी तकनीक थी। असली कला यह है कि मंदिर को अक्षुण्ण रखो और उसकी आत्मा लूट लो। पत्थर से क्या मिलेगा? आस्था से कमाओ।”
उसी रात गज़नी की आँखें खुल गईं।
अब वह घोड़े पर नहीं आया। वह पासपोर्ट पर भी नहीं आया। वह काबुल, कंधार या उज़्बेकिस्तान से भी नहीं आया। समय ने उसे सिखाया कि तू हमारी ही गलियों में पैदा हो। हमारे ही मुहल्ले में पल-बढ़। हमारी ही भाषा बोल, हमारे ही त्योहार मना, हमारे ही देवताओं के नाम रटे।
उसने इतिहास से यह सीखा था कि इस देश में तलवार लेकर आओगे तो लोग पहचान लेंगे। लेकिन अगर माथे पर चंदन, गले में माला और हाथ में आरती की थाली लेकर आओगे तो लोग तुम्हें साधु समझ लेंगे। और साधु से कोई हिसाब नहीं माँगता।
इसलिए वह मंदिर तोड़ने नहीं आया। वह मंदिर बनवाने आया।
उसने एक सभा बुलाई और घोषणा की —”भाइयो और बहनो! मंदिर केवल पत्थर का नहीं होता — वह आस्था का होता है। और आस्था चढ़ावे से ही सिद्ध होती है। यह मंदिर हमारी संस्कृति का, हमारे स्वाभिमान का, हमारे पूर्वजों के सम्मान का प्रतीक होगा।”
भीड़ भावुक हो गई।
किसी ने पूछा — “मंदिर कितना बड़ा बनेगा?”
वह बोला — “इतना बड़ा कि इतिहास छोटा पड़ जाए। और नभ एक मुष्टि दूर रह जाए।”
किसी ने पूछा — “चंदा कितना चाहिए?”
वह बोला — “आस्था की कोई सीमा नहीं होती।”
और फिर जो हुआ, वह देखने वाला था।
एक बूढ़े किसान ने अपनी बची हुई ज़मीन दे दी — बोला, “भगवान के घर से बड़ा घर कौन सा?” एक विधवा ने अपनी सोने की चूड़ियाँ उतार दीं — बोली, “गहना तो माटी है, धर्म असली धन है।” एक दुकानदार ने तिजोरी का आधा हिस्सा खाली कर दिया। एक बच्चे ने महीनों की बचत का गुल्लक फोड़ दिया। एक प्रवासी ने सात समंदर पार से डॉलर भेजे — “बस भगवान का काम पूरा होना चाहिए।”
लोग खुद लाइन लगाकर सोना दे रहे थे।
ग़ज़नी ने मन ही मन कहा — “पुराना ग़ज़नी कितना मूर्ख था। सेना लेकर आता था, लोग प्रतिरोध करते थे, जान जाती थी, यश नहीं मिलता था। यहाँ तो मंदिर भी तुम्हारा, भक्त भी तुम्हारे, चंदा भी तुम्हारा, महिमा भी तुम्हारी। इससे अच्छा व्यापार संसार में क्या होगा?”
धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ता गया।
सेवक से प्रबंधक हुआ। प्रबंधक से संरक्षक। संरक्षक से धर्मरक्षक। धर्मरक्षक से — राजरक्षक।
और फिर एक दिन उसने कहा — “मंदिर की रक्षा के लिए राज्य भी चाहिए।”
लोगों ने राज्य भी दे दिया।
अब वह मंदिर के बाहर नहीं बैठता था। वह मंदिर के भीतर था — कोष में, कथा में, मंच पर, सभा में, घोषणाओं में, इतिहास में। और जो भी उससे सवाल करता, उसके लिए एक नई भाषा थी तैयार —
“जो हमसे सवाल करे — वह आस्था-विरोधी है।
जो हिसाब माँगे — वह धर्म-द्रोही है।
जो रसीद देखना चाहे — वह संस्कृति का शत्रु है।”
कहते हैं, उस देश के बच्चे अब भी यह कहानी सुनते हैं और पूछते हैं — “दादी, पुराना ग़ज़नी और नया गज़नी में क्या फ़र्क़ था?”
दादी कुछ देर चुप रहती हैं।
फिर बोलती हैं — “बेटा, पुराने गज़नी ने मंदिर तोड़े। नए ने मंदिर बनवाए। लेकिन दोनों का काम एक ही था — सोना।”
“तो लोगों ने नए गज़नी को पहचाना क्यों नहीं?”
दादी फिर चुप हो जाती हैं।
और यही इस कहानी का सबसे भारी हिस्सा है।
