डॉ ओमप्रकाश ग्रेवाल प्रोफेसर तो अंग्रेजी साहित्य के रहे, अमेरिका की रोचेस्टर यूनिवर्सिटी से उन्होंने पीएचडी की उपाधि प्राप्त की ; “Henry James and the ideology of culture” शीर्षक से उनका शोध-प्रबंध भी बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। लेकिन समकालीन हिंदी-रचनाकर्म के सूक्ष्म निरीक्षण, तथ्यात्मक आंकलन और यथार्थ दिशा- अन्वेषण में भी उन्होंने एक सूक्ष्मदर्शी आलोचक की महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है। आज से 20 साल पहले 24 जनवरी,2006 को 68 साल की नाकाफ़ी उम्र में ब्रेन-ट्यूमर की लाइलाज बीमारी ने उनको हमसे छीन लिया था। लेकिन वह जब तक जीवित रहे लगातार हरियाणवी और हिंदी समाज को जागरूक करने के अभियान के सक्रिय कार्यकर्ता और मार्गदर्शक बने रहे। इसलिए उनके समर्थकों में उनको “नवजागरण का अग्रदूत” कहा गया है : संपादक।
डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल और ‘आज का सच’ की भूमिका
ओमसिंह अशफ़ाक के प्रथम कहानी संग्रह “आज का सच” का प्रकाशित होना और उनकी रचनाओं का इस प्रकार व्यापक पाठक समुदाय के सामने एक साथ प्रस्तुत होना मेरे लिए व्यक्तिगत रूप में एक अत्यंत सुखद और महत्त्वपूर्ण घटना है। आज के संदर्भ में पाठकों के सामने आने की इस संग्रह की एक विशिष्ट सार्थकता भी है जिसका जिकर आगे चलकर करूंगा। ओमसिंह मेरे उन आत्मीय मित्रों में से हैं जिनके साथ एक शहर में रहते हुए मैंने पिछले बीस-पच्चीस सालों के दौरान अनेक साहित्यिक गोष्ठियों तथा स्थानीय स्तर की सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में भागीदारी की है। इस भागीदारी के जरिए उनके लेखकीय व्यक्तित्व से घनिष्ठ संपर्क स्थापित हो गया और उनकी रचनाशीलता की विकास यात्रा को मैंने बहुत करीब से देखा है। लम्बे दौर की इस घनिष्ठता से यह भी संभव है कि उनकी रचनाशीलता की विकास यात्रा में गलत किस्म के हस्तक्षेप करके हमने कुछ व्यवधान भी पैदा किये हों। अशफ़ाक की कहानियां विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में जब तब छपती रही हैं। उनमें से अधिकांश कहानियों पर छपने से पहले हमने अपनी रचना-गोष्ठियों में विस्तार से और बे-हिचक ढंग से चर्चायें की हैं। सहज-सरल स्वभाव के चलते ओमसिंह अपनी रचनाओं पर हमारी वाजिब और गैरवाजिब टिप्पणियों को ज़रूरत से कुछ ज्यादा ही महत्त्व देते रहे हैं और इस मामले में उन्होंने कभी-कभी अपने रचनात्मक विवेक में ढील देने से भी गुरेज नहीं किया है। अपनी रचनाओं के बारे में ऐसे अतिरिक्त ममत्व की भावना जो कई बार रचना की आंतरिक बुनावट के बारे में किसी भी सुझाव या टिप्पणी को अनुचित छेड़-छाड़ अथवा अवांछित हस्तक्षेप मानने के लिए कुछ लेखकों को बाध्य कर देती है और चर्चा के दौरान उन्हें सुरक्षात्मक कवच पहने रहने की स्थिति में ला खड़ा कर देती है, अशफ़ाक के अन्दर लेशमात्र भी नहीं है। यह मुमकिन है कि इस संग्रह की कहानियों की काया पर हमारे अनुचित हस्तक्षेपों की कुछ खरोंचें अभी भी मौजूद हों। लेकिन अशफ़ाक की रचनाशीलता में इस प्रकार की अवांछित शरकत के अलावा उनके कहानीकार के साथ मेरा आत्मीय रिश्ता कुछ अधिक व्यापक और साहित्यिक दृष्टि से ज्यादा अर्थपूर्ण कारणों से भी बना रहा है। दरअसल पाठक के रूप में मेरे संस्कारों और साहित्यिक अभिरुचियों का विकास और अशफ़ाक की रचनाशीलता की संरचना का निर्माण एक ही साहित्यिक आंदोलन के निर्णायक प्रभाव के अंतर्गत हुआ है। यही साहित्यक आंदोलन वह आधार भूमि है जो अशफ़ाक की कहानियों के रचना संसार में पूर्ण सहभागिता के साथ प्रवेश करने के मेरे दावे को एक तरह का औचित्य प्रदान कर देती है।
सत्तर के दशक के आरंभ में हिन्दी कहानी में एक नये प्रकार की रचनाशीलता का उभार हुआ था जिसे आम तौर पर प्रतिबद्ध कहानी अथवा राजनीतिक पक्षधरता की कहानी के रूप में पहचान मिली। इस कहानी में व्यक्त होने वाली रचनाशीलता तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में मूलभूत बदलाव के दृढ़ संकल्प से ऊर्जा हासिल करने का दावा पेश करती है। स्थापित व्यवस्था को कायम रखने वाली प्रशासन परिविधियों की क्रूरताओं का, आम लोगों के साथ की जाने वाली बदसलूकियों का, अपनी आजीविका चलाने के लिए छोटे-बड़े पदों पर काम करने वाले कर्मचारियों की मानवीय गरिमा को आहत करने वाली और उनकी मनुष्यता को विरूपित अथवा खोखला बना देने वाली उसकी कारगुजारियों का तीखा विवरण और विश्लेषण यहां पेश किया जाता है। इसके अलावा स्थापित व्यवस्था के प्रतिरोध में खड़े होने का साहस करने वाले मध्यवर्गीय व्यक्तियों के नैतिक बल को कमजोर करने वाले दबावों का तथा उन दबावों के सामने न झुकने का नैतिक साहस अर्जित करने के दायित्व की अनिवार्यता का यहां कसकदार ढंग से चित्रण किया जाता है। क्योंकि स्थापित व्यवस्था की सबसे गहरी मार आर्थिक दृष्टि से कमजोर और दबे-चिथे लोगों पर पड़ती थी, उनकी जिजीविषा और संघर्षधर्मिता की संभावनाओं को उजागर करने और उनके भीतर मौजूद प्रचुर ऊर्जा का दिग्दर्शन कराने पर भी यहां जोर दिया जाता है। अशफ़ाक की कहानियों में प्रतिबद्ध कहानी की ये सभी विशेषताएं बड़े सहज-सरल ढंग से मौजूद हैं।
मूलभूत सामाजिक रूपांतरण को समर्पित होने के अपने दावों के बावजूद इस कहानी-आंदोलन के मूल में दरअसल मध्य वर्ग के विभिन्न हिस्सों में उस समय व्यापक पैमाने पर तीव्र रूप में मौजूद व्यवस्था विरोध की भावना और अपने हितों की रक्षा करने के लिए सामूहिक संघर्ष का रास्ता अपनाने की तत्परता ही मुख्यतः काम कर रही थी। इसीलिए प्रतिबद्ध कहानी की ताकत एक आदर्शोन्मुखी और सामाजिक सोद्देश्यता से परिपूर्ण मध्यवर्गीय व्यक्ति द्वारा अपनी कमजोरियों से उबरने के लिए किये जाने वाले आत्म-संघर्ष की प्रक्रिया को सधे हुए ढंग से पेश करने में ही मुख्यत: दिखायी देती है। इस पूरी प्रक्रिया के चित्रण में व्यवस्था-विरोध की भावना के वाहक ऐसे व्यक्ति को मध्यवर्ग में मौजूद उन तत्वों से आलगाया जाता है जो अपनी सुविधाभोगी और परजीवी मानसिकता के कारण उच्चवर्ग से चिपके रहते हैं और शोषण और उत्पीड़न पर आधारित व्यवस्था के पुर्जे बन कर अपनी मनुष्यता का हनन करते हुए अंदर से खोखले हो जाते हैं। व्यवस्था विरोध की भावना से अनुप्राणित मध्यवर्गीय व्यक्ति आत्म संघर्ष की प्रक्रिया में अपने आपको इस हश्र से भरसक बचाये रखने की कैसी-कैसी कोशिशें करता है और कई बार पारिवारिक जिम्मेदारियों के बोझ से दबा और व्यवस्था के प्रहारों से आहत होने के कारण वह किस प्रकार आत्मसंघर्ष और व्यक्तिवातंरण की प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ा पाता बल्कि हथियार डाल देता है या विपरीत दिशा में चल पड़ता है. इसे यहां वस्तुपरक तल्लीनता के साथ दिखाया जाता है। मध्यवर्गीय व्यक्तित्वों के भीतर काम कर रही परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों के टकरावों को अशफ़ाक की इस संग्रह में मौजूद अनेक कहानियों में बड़े विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इनमें ‘उनकी राह’, ‘पेंडुलम’, ‘लेखक’ और संग्रह की शीर्षक कहानी ‘आज का सच’ का विशेष रूप से जिकर किया जा सकता है। मेहनतकश लोगों की जीवन-परिस्थितियों से निकट संपर्क स्थापित होने पर अथवा बचपन के समय से मौजूद उनके साथ आत्मीय जुड़ाव के बने रहने से एक संवेदनशील और आत्मसजग मध्यवर्गीय व्यक्ति अपने व्यक्तित्वांतरण के संघर्ष को आगे बढ़ाने में किस प्रकार का आत्मबल और स्फूर्ति हासिल कर सकता है, इसका काफ़ी विश्वसनीय चित्रण हम ‘पलायन’, ‘मां’ और ‘पेंडुलम’ कहानियों में देख सकते हैं। प्रतिबद्ध कहानी में मेहनतकश तबके के लोगों को अमूमन एक सहानुभूतिपूर्ण दृष्टा के द्वारा अलग बने रहकर बाहर से देखा जाता है। इससे उनकी किंचित आदर्शीकृत तस्वीर पेश होने का अंदेशा बना रहता है और उनके जीवन की तलख सच्चाईयां मोटे रूप में ही सामने आ पाती हैं। अशफ़ाक इस संदर्भ में भावुकता से बचने का भरसक प्रयास करते हैं और किसान- मजदूर जीवन से उठाये हुए पात्रों के जीवन-संघर्षों को आदर्शीकृत रूप में पेश करने से बचने की कोशिश करते हैं यद्यपि मध्यवर्गीय दृष्टा की हैसियत से पेश किये जाने के कारण उनके संघर्षों के चित्रण में थोड़ा बहुत सरलीकरण तो अवश्य आ जाता है। छोटे किसान परिवारों और मजदूर वर्ग से उठाये गये इन पात्रों की मुसीबतों का तथा उनकी जिजीविषा का चित्रण करते समय अशफ़ाक किस प्रकार का संयम बरतते हैं और आदर्शीकरण की प्रवृत्ति से बचने की कोशिश करते हैं इसे हम ‘लाजवंती’ ‘मां’ और ‘पेंडुलम’ जैसी कहानियों में देख सकते हैं। प्रतिबद्ध कहानी में कई बार सामाजिक रूपांतरण की प्रक्रिया को मध्यवर्गीय व्यक्ति द्वारा किये जाने वाले आत्मसंघर्ष अथवा व्यक्तित्वांतरण की प्रक्रिया के ही विस्तारित रूप में देखा जाता है। सामाजिक रूपातंरण के लिए आवश्यक संघर्षों की जो तस्वीर इस प्रकार की कहानियों में अक्सर सामने आती है वह या तो काफ़ी अतिरंजित और आतंकित करने वाली नज़र आती है या फिर बहुत सहज और आसानी से सम्पन्न होने वाली क्रिया बनकर रह जाती है। ‘लोक-यमलोक’ ‘पलायन’ और ‘उनकी राह’ जैसी कहानियों में अशफ़ाक द्वारा इस दृष्टि से काफी सतर्क रहने के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं, फिर भी संघर्षों की परिकल्पना में अतिरंजना की पुट कुछ हद तक बनी रहती है। दूसरी तरफ़ संघर्ष की प्रक्रिया में शामिल हो जाने से एक साधारण लड़की के व्यक्तित्व में तेजी से आने वाले विस्तार को पूरी आत्मीयता के साथ दिखाने वाली ‘रोशनी’ कहानी में उस अतिरिक्त उत्साह की झलक भी हमें मिलती है जिसके चलते इस प्रकार के संघर्षों में भाग लेने वाले समाज के विभिन्न तबकों के बीच तालमेल स्थापित हो जाने के बारे में हम कई प्रकार की खुशफहमियां पाल लेते हैं।
अशफ़ाक की कहानियों से यह स्पष्ट होता है कि इस प्रकार के प्रतिबद्ध कहानी-लेखन में व्यक्ति की मनोगत दुनिया को अपने आप में पूर्ण और स्वतःचालित मानते हुए उसके बारीक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की भूलभुलैयों में खोये रहने की बजाय सामाजिक जीवन को निर्णायक रूप में प्रभावित करने वाले कारक तत्त्वों को मूर्तरूप में सामने लाने वाली प्रतिनिधिक स्थितियों और प्रातिनिधिक पात्रों के चित्रण पर जोर दिया जाता है। इससे कहानियों में सादगी और ठोसपन का प्रभाव एक साथ दिखायी देने लगता है। सामाजिक यथार्थ के केंद्रीय पक्षों को उभारने वाले लेखन का उत्कृष्ट रूप तो हमें प्रेमचंद की कहानियों में मिलता है। प्रेमचंद के लेखन की प्रखरता और सामाजिक यथार्थ की पैनी समझ तो ज़ाहिर है प्रतिबद्ध कहानी-आंदोलन के तहत सामने आयी किसी भी रचना में नहीं मिलती। अशफाक की कहानियों के बारे में ऐसा दावा करना सरासर हिमाकत होगी, लेकिन इन कहानियों की सरलता और भाषा की रवानगी हमें अवश्य बहुत अच्छी लगती है। अशफ़ाक की कहानियों में एक मंजे हुए रचनाकार की सुघढ़ता भले ही मौजूद न हो, पर अपने सच्चे सीधे खुरदरेपन के बल पर वे हमारी चेतना पर अमिट छाप अवश्य छोड़ती हैं। अशफ़ाक की रचनाओं में गहन चिंतन का कसाव और पैनापन शायद दिखायी न देता हो, पर सामान्य ज्ञान की सहज स्वीकार्य समझदारी, दृढ़ जनपक्षधरता की ताकत और शोषित-पीड़ित जनों की पीड़ाओं-उल्लासों को ईमानदारी से व्यक्त किये जाने की मार्मिकता अवश्य पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं।
जिस सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य के अन्तर्गत प्रतिबद्ध कहानी आंदोलन उभर कर आया था वह आज बहुत पीछे छूट गया लगता है। मध्यवर्ग के विभिन्न हिस्सों में आज हौसला पस्ती छाई हुई है। स्थापित व्यवस्था के कार्यव्यवहारों में अब पहले से कहीं ज्यादा सख़्ती और संवेदनविहीनता आ गयी है और हमारी मनुष्यता को अवरुद्ध करने वाले उसके दबाव ज्यादा तीखे हो गये हैं। पर इसका प्रतिरोध करने में सक्षम जनतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखने वाले लोगों का आत्मविश्वास लड़खड़ाने लगा है। बाजारवाद के विस्तार ने जहां एक तरफ हमारी जीवन-परिस्थितियों को अधिक विकट और कष्टकर बना दिया है, वहीं इसके द्वारा प्रायोजित उपभोक्ता संस्कृति के लुभावने प्रभावों ने हमारे व्यापक सामाजिक सरोकारों को अंदर से कमजोर बना डाला है और हम अपनी क्षुद्र निजी चिंताओं के संकुचित दायरे में सिमट कर जीने लगे हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अर्जित जनतांत्रिक मूल्यों की हमारी विरासत भी अब इतनी ठोस नजर नहीं आती जितनी पहले दिखायी देती थी। हमारे सामाजिक ताने-बाने पर अपनी जकड़न को बढ़ाने की इच्छुक ताकतें नयी उग्रता के साथ अपनी दकियानूसी सोच और अपने पुरातन-पंथी मूल्यों को हम पर थोपने की मुहिम चला रही हैं और नफ़रत, हिंसा और अतार्किकता को बढ़ावा देकर हमारे सामाजिक वातावरण को प्रदूषित कर रही हैं। समाज के उपेक्षित तबकों में गहरा असंतोष है जिसे प्रतिक्रियावादी ताकतें अपने ढंग से इस्तेमाल करने में कामयाब हो रही हैं। ऐसी स्थिति में अपनी मनुष्यता को बचाये रखने की चुनौती पहले से कहीं अधिक जटिल हो गयी है। इस चुनौती का सामना करने वाली रचनाशीलता प्रतिबद्ध कहानी में व्यक्त होने वाली रचनाशीलता से कई अर्थों में भिन्न होगी। लेकिन प्रतिबद्ध कहानी में व्यवस्था विरोध की जो तीव्र भावना मौजूद थी, सामाजिक सोद्देश्यता से उत्पन्न जो उत्साह था, शोषित-पीड़ित जनता से निकट संपर्क स्थापित करके उनकी संघर्षधर्मिता को उभारने का जो संकल्प था, उस सबसे उस प्रकार के कहानी-लेखन के जरिए प्रेरणा लेना आज बहुत प्रासंगिक हो गया है। ज़ाहिर है कि प्रतिबद्ध कहानी की रचनाशीलता अपने मूल रूप को बनाये रखकर आज की स्थितियों से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने में सक्षम पूरी तरह नहीं हो सकती। समकालीन रचनाशीलता सीधे-सीधे राजनैतिक टकरावों को केंद्र में नहीं रख सकती। समकालीन रचनाशीलता के अन्तर्गत यह मानकर चला जाता है कि हमारी संवेदना की संरचना में सूक्ष्म रूपों में व्याप्त कमजोरियों का आलोचनात्मक निरीक्षण करते हुए ही हम आज अपनी मनुष्यता को बचाये रखने की जिम्मेदारी का उचित निर्वाह कर सकते हैं। परन्तु इसके लिए आधारभूमि तैयार करने में वह उत्साह और आत्मविश्वास, वह जनपक्षधरता और मेहनतकश लोगों की संघर्षधर्मिता में वह आस्था, ही काम आयेंगे जो प्रतिबद्ध कहानी की रचनाशीलता में इतनी स्पष्टता के साथ मौजूद हैं। उस रचनाशीलता को प्राथमिक आधार के रूप में इस्तेमाल करना समकालीन रचनाशीलता की निर्माण-प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है। प्रतिबद्ध कहानी-आंदोलन की रचनाशीलता के सकारात्मक पक्षों को सहजग्राह्य रूप में समेट कर चलने वाली इन कहानियों का प्रकाशित होना आज के संदर्भ में इसीलिए एक अतिरिक्त प्रासंगिकता हासिल कर लेता है।
ओमप्रकाश ग्रेवाल
10 दिसम्बर, 2003
724/5 अर्बन एस्टेट,
कुरुक्षेत्र।
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