अपने शहर लौटना, दरअसल अपने भीतर लौटना है

अपने शहर लौटना, दरअसल अपने भीतर लौटना है

डॉ रीटा अरोड़ा

 

आज मैं अपने पैतृक शहर गया।

वही शहर जहाँ मेरा बचपन बीता था।

कोई विशेष काम नहीं था। बस मन हुआ कि उन गलियों से होकर गुजरूँ, जहाँ कभी मेरी छोटी-छोटी टाँगें दौड़ा करती थीं।

कार से उतरकर जब पहली गली में कदम रखा तो लगा जैसे समय ने मुझे पहचान लिया हो।

सड़क वही थी, लेकिन वैसी नहीं थी।

पुरानी टूटी सड़क की जगह अब पक्की सड़क थी।

कुछ कच्चे मकान अब बहुमंजिला इमारतों में बदल चुके थे।

कुछ घर ऐसे भी मिले जो अब खंडहर बन चुके थे।

उनकी टूटी दीवारें और झुकी छतें जैसे चुपचाप बता रही थीं कि समय किसी को नहीं बख्शता।

एक जगह मैं रुक गया। यह वही घर था जहाँ कभी मेरे मित्र का परिवार रहता था।

हम घंटों साथ खेलते थे।

आज दरवाजे पर ताला था।

खिड़कियों पर धूल जमी थी।

मुझे लगा जैसे घर नहीं, कोई याद बूढ़ी होकर बैठी हो।

थोड़ा आगे बढ़ा तो एक पुरानी दुकान दिखाई दी।

दुकान का नाम वही था।

बस दुकान चलाने वाला चेहरा बदल गया था।

जिस बुजुर्ग को बचपन में देखा था, अब उनकी जगह उनका बेटा बैठा था।

समय ने पीढ़ी बदल दी थी, लेकिन दुकान की पहचान बची हुई थी।

जीवन भी शायद ऐसा ही होता है।

लोग बदलते रहते हैं, लेकिन कुछ मूल्य, कुछ परंपराएँ और कुछ पहचानें बनी रहती हैं।

चलते-चलते मैं उस मंदिर तक पहुँच गया जहाँ बचपन में हर परीक्षा से पहले माथा टेकने जाता था।

मंदिर का एक हिस्सा अब जर्जर हो चुका था।

दीवारों पर समय की दरारें साफ दिखाई दे रही थीं।

लेकिन उसी मंदिर का दूसरा हिस्सा नए पत्थरों से सजाया गया था।

उसे देखकर लगा कि आस्था भी जीवन की तरह होती है।

कुछ हिस्सा समय के साथ टूटता है, कुछ हिस्सा नए विश्वास से फिर खड़ा हो जाता है।

गली में आगे बढ़ते हुए अचानक एक मोड़ आया।

यहीं कभी हम क्रिकेट खेला करते थे।

यहीं पहली बार साइकिल से गिरा था।

यहीं पहली बार किसी दोस्त से झगड़ा हुआ था।

और शायद यहीं पहली बार जीवन ने हार और जीत दोनों का अर्थ समझाया था।

उस जगह खड़े होकर मैं मुस्कुरा भी रहा था और भीतर कहीं हल्का-सा दर्द भी महसूस कर रहा था।

क्योंकि उन घटनाओं के पात्र अब वहाँ नहीं थे।

दोस्त अपने-अपने जीवन में दूर निकल गए।

कुछ लोग इस दुनिया में भी नहीं रहे।

लेकिन यादें अब भी वहीं खड़ी थीं।

जैसे मेरा इंतजार कर रही हों।

मुझे लगा कि बचपन की सबसे बड़ी खूबी यही होती है।

वह कभी पूरी तरह हमारा साथ नहीं छोड़ता।

वह हमारे भीतर कहीं छिपकर बैठा रहता है और सही समय आने पर फिर से बाहर आ जाता है।

उस शहर की गलियों में चलते हुए मुझे यह भी एहसास हुआ कि हम अक्सर आगे बढ़ने की इतनी जल्दी में रहते हैं कि पीछे छूटे रास्तों को देखना भूल जाते हैं।

हम नए घर बना लेते हैं, नई पहचान बना लेते हैं, नए रिश्ते बना लेते हैं।

लेकिन हमारी जड़ों का पता अब भी उसी पुराने शहर के पास रहता है।

शाम होने लगी थी।

मैं वापस लौटने लगा।

लेकिन सच कहूँ तो लौट सिर्फ मेरा शरीर रहा था।

मन अभी भी उन्हीं गलियों में टहल रहा था।

उन्हीं मंदिरों की घंटियाँ सुन रहा था।

उन्हीं दोस्तों के साथ क्रिकेट खेल रहा था।

उन्हीं दुकानों से टॉफी खरीद रहा था। और उन्हीं रास्तों पर दौड़ रहा था जहाँ कभी जिंदगी बहुत सरल हुआ करती थी।

घर लौटते समय मेरे मन में एक विचार बार-बार आ रहा था।

हम अपनी कार की सर्विस कराते हैं।

मोबाइल अपडेट करते हैं।

घर की मरम्मत करवाते हैं।

लेकिन अपने मन की मरम्मत करना भूल जाते हैं।

कभी-कभी अपने पैतृक शहर जाना मन की सर्विसिंग जैसा होता है। वह हमें याद दिलाता है कि हम कहाँ से आए हैं।

हमारी असली पहचान क्या है।

और जीवन की दौड़ में हम क्या-क्या पीछे छोड़ आए हैं।

अगर आप बहुत दिनों से अपने पैतृक शहर नहीं गए हैं, तो एक बार जरूर जाइए।

किसी काम से नहीं।

किसी मजबूरी से नहीं।

बस यूँ ही।

उन गलियों में टहलने के लिए।

उन मंदिरों में सिर झुकाने के लिए।

उन पुरानी दुकानों को देखने के लिए।

और सबसे ज़रूरी—अपने उस बचपन से मिलने के लिए, जो आज भी वहीं आपका इंतजार कर रहा है।

क्योंकि कभी-कभी अपने शहर लौटना, दरअसल अपने भीतर लौटना होता है।

और यकीन मानिए, दुनिया की सबसे सुकून देने वाली यात्राओं में से एक वही होती है।

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