वकीलों के मनोविज्ञान का लिटमस-टेस्‍ट है सुप्रीम कोर्ट बार का चुनाव

वकीलों के मनोविज्ञान का लिटमस-टेस्‍ट है सुप्रीम कोर्ट बार का चुनाव

आंधी-तूफान तेज है, खतरा भाजपा की ढिबरी पर पड़ेगा

भाजपा का प्रवक्ता जीतेगा या वकील की स्वतंत्र आवाज?

सत्ता तक पहुंच या न्यायिक सुधार? मृदुल बनाम भाटिया

मणिपुर हाईकोर्ट के सफल चीफ जस्टिस रहे हैं सिद्धार्थ मृदुल

कुमार सौवीर

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन का चुनाव इस बार सिर्फ अध्यक्ष चुनने का चुनाव नहीं है। यह उस समय हो रहा है जब सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की कार्यप्रणाली को लेकर देश में बहस और बेचैनी दोनों बढ़ रही हैं। न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठाने वालों की आवाज तेज है और सरकार के साथ अदालतों के रिश्तों को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं।

ऐसे माहौल में भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव भाटिया का बार अध्यक्ष पद के लिए उतरना एक असाधारण राजनीतिक और संस्थागत सवाल खड़ा करता है। सवाल सीधा है, लेकिन जवाब आसान नहीं। क्या जो व्यक्ति आज सत्तारूढ़ दल का राष्ट्रीय प्रवक्ता है, वह कल उसी सरकार के खिलाफ खड़े होने वाले सुप्रीम कोर्ट बार एसोसियेशन की स्वतंत्र आवाज बन पाएगा?

गौरव भाटिया के नामांकन के समय बड़ी संख्या में वकीलों की मौजूदगी दिखाई दी और के.के. वेणुगोपाल, राकेश द्विवेदी तथा पूर्व सॉलिटर जनरल रंजीत कुमार जैसे वरिष्ठ कानूनी दिग्गजों का समर्थन उनकी उम्मीदवारी को खासा वजन देता है। भाटिया खुद भी बार के पूर्व सचिव रह चुके हैं और जाहिर है कि राजनीति तथा संगठनात्मक कामकाज से अनजान उम्मीदवार नहीं हैं। लेकिन इस चुनाव की सबसे दिलचस्प बात यही है कि उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन सकती है।

गौरव भाटिया की सार्वजनिक पहचान केवल वरिष्ठ अधिवक्ता की नहीं है। वह भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं और लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीतिक बहस में भाजपा का पक्ष रखते आए हैं। टीवी स्टूडियो से लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस तक उनकी भूमिका स्पष्ट रही है। वह सरकार और भाजपा के बचाव में आक्रामक तर्क रखने वाले प्रमुख चेहरों में शामिल रहे हैं। ऐसे में बार अध्यक्ष के चुनाव में उनके सामने सबसे स्वाभाविक सवाल यही उठेगा कि क्या राजनीतिक भूमिका और बार की संस्थागत स्वतंत्रता के बीच पर्याप्त दूरी बनाई जा सकती है।

बार किसी राजनीतिक दल की इकाई नहीं, का प्रतिनिधि होता है। सरकार की किसी नीति से बार को परेशानी हो सकती है, न्यायपालिका की किसी व्यवस्था पर सवाल उठ सकते हैं, न्यायिक नियुक्तियों, जवाबदेही, अदालतों के प्रशासन, लंबित मुकदमों और वकीलों के अधिकारों पर सरकार से टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है। ऐसे किसी भी मौके पर अध्यक्ष को सरकार से सवाल पूछने पड़ सकते हैं। तब भाटिया किस भूमिका में होंगे, भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता की या बार अध्यक्ष की? यही वह सवाल है जो इस चुनाव को सामान्य बार चुनाव से बड़ा बना देता है।

आज सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के रवैये को लेकर देश में तीखी बहस चल रही है। आलोचकों का एक वर्ग आरोप लगा रहा है कि न्यायपालिका कई मामलों में सरकार के प्रति जरूरत से ज्यादा नरम दिखाई दे रही है और न्यायिक स्वतंत्रता तथा सुधार की बहस कमजोर पड़ रही है। दूसरी ओर न्यायपालिका और सरकार से जुड़े पक्ष इन आरोपों को स्वीकार नहीं करते। लेकिन धारणा चाहे जो हो, यह विवाद अब सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है। ऐसे समय में अध्यक्ष कौन होगा, यह अपने आप में महत्वपूर्ण हो जाता है।

यदि भाटिया जीतते हैं तो उनके सामने केवल बार की सुविधाओं, कल्याण और पेशेवर समस्याओं का सवाल नहीं होगा। उन्हें न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सुधार से जुड़े उन सवालों पर भी बार का पक्ष रखना पड़ सकता है जिनमें सरकार और न्यायपालिका के बीच मतभेद पैदा होते हैं। और तब भाजपा से उनका रिश्ता निर्णायक हो सकता है।

वकील उनकी राजनीतिक पहचान को सत्ता तक प्रभावी पहुंच की ताकत मानते हैं तो भाटिया को इसका लाभ मिल सकता है। सरकार और प्रशासन के शीर्ष स्तर तक संवाद की क्षमता किसी बार अध्यक्ष के लिए उपयोगी हो सकती है। लेकिन अगर वही वकील यह मानते हैं कि बार को सरकार से पर्याप्त दूरी बनाकर रखनी चाहिए तो भाजपा का राष्ट्रीय प्रवक्ता होना उनके खिलाफ जा सकता है।

गौरव भाटिया के लिए समस्या यह भी है कि अपनी राजनीतिक पहचान को वह छिपा नहीं सकते। वह उनकी सार्वजनिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है। इसलिए उनके लिए सबसे कठिन काम यह साबित करना होगा कि भाजपा का प्रवक्ता और बार का अध्यक्ष दो अलग-अलग भूमिकाएं हैं और एक की राजनीतिक प्रतिबद्धता दूसरे की संस्थागत जिम्मेदारी पर हावी नहीं होगी।

सिद्धार्थ मृदुल तो गौरव भाटिया के लिए बड़ी चुनौती हैं। मणिपुर हाईकोर्ट में 13 महीने तक चीफ जस्टिस रह चुके सिद्धार्थ मृदुल ने अपनी छवि वकीलों की विरोधी नहीं, बल्कि संवाद और संस्थागत सहयोग वाली रही है। लेकिन इसे बहुत सकारात्मक या वकीलों के चहेते जैसे निष्कर्ष तक नहीं समझा जा सकता है।

गौरव के मुकाबले उनकी उनकी छवि अपेक्षाकृत संस्थागत और गैर राजनीतिक है। ऐसे में चुनाव अगर व्यक्तिगत योग्यता से हटकर राजनीतिक पहचान बनाम संस्थागत स्वतंत्रता का मुकाबला बन गया तो समझ लीजिएगा कि भाटिया की खटिया पर बबूल के खतरनाक कांटे बिखर जाएंगे।

लेकिन दूसरी तरफ भाटिया के पास अपना मजबूत आधार है। वह बार की राजनीति को पहले से जानते हैं, राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान है, राजनीतिक संचार में माहिर हैं और उनके साथ खड़े वरिष्ठ वकीलों के नाम उनकी कानूनी स्वीकार्यता को मजबूत करते हैं। नामांकन के समय जुटी भीड़ और वरिष्ठ नेताओं का समर्थन भी चुनाव नहीं जिताता। और यहीं गौरव भाटिया का पूरा चुनाव एक बेहद नाजुक सवाल पर टिक जाता है।

क्या वह सरकार के करीब रहने की अपनी राजनीतिक ताकत को बार के हित में इस्तेमाल कर पाएंगे, या सरकार से स्वतंत्र होकर बार की आवाज उठाने में उनकी राजनीतिक पहचान रास्ते में आ जाएगी? अगर वह जीतते हैं तो इसे सीधे न्यायिक सुधार के अंत की घोषणा कहना अतिशयोक्ति होगी। बार अध्यक्ष के पास देश की न्यायिक सुधार प्रक्रिया को अकेले रोक देने की शक्ति नहीं है।

लेकिन यह जरूर है कि बार का नेतृत्व किस तरह की राजनीतिक और संस्थागत सोच रखता है, उसका असर न्यायपालिका से जुड़े बड़े सार्वजनिक विमर्श पर पड़ सकता है।

इसलिए इस चुनाव की असली कहानी गौरव भाटिया बनाम उनके प्रतिद्वंद्वी नहीं है। असली कहानी यह है कि सुप्रीम कोर्ट का बार इस समय किसे चुनना चाहता है, सत्ता के गलियारों तक मजबूत पहुंच रखने वाला अध्यक्ष या ऐसा अध्यक्ष जिसकी पहली और आखिरी पहचान केवल बार की स्वतंत्र आवाज हो। और इस सवाल का जवाब सुप्रीम कोर्ट के वकीलों के मौजूदा मनोविज्ञान का महत्वपूर्ण संकेत होगा।

कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से साभार

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