संस्कारहीन शिक्षा: सिर्फ कागज़ का टुकड़ा
डिग्री से सिर्फ मिलता है रोज़गार, पर इंसान की असली पहचान है उसका व्यवहार
डॉ रीटा अरोड़ा
“सर, मैं इस बड़ी कंपनी का वाइस प्रेसिडेंट हूँ और यह मेरी विदेश की डिग्रियां हैं,” युवक ने रौब झाड़ते हुए होटल के रिसेप्शनिस्ट से कहा।
पास खड़े बुजुर्ग ने टोकते हुए पूछा, “क्या तुम्हारी किसी डिग्री ने तुम्हें इस मासूम कर्मचारी से तमीज़ से बात करना सिखाया है?”
युवक शर्म से पानी-पानी हो गया।
आज का आधुनिक समाज डिग्रियों की अंधी दौड़ में इस कदर शामिल हो चुका है कि शिक्षा के मूल चरित्र और उसके मानवीय उद्देश्यों को ही भूल बैठा है। आधुनिक परिवारों और शिक्षण संस्थानों का पूरा ध्यान छात्रों को केवल ऊंचे अंक दिलाने और करियर उन्मुख डिग्रियां थमाने पर केंद्रित है। इस प्रक्रिया में व्यावहारिक संस्कारों और नैतिक मूल्यों को पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया गया है।
ऐसे में यह गंभीर विमर्श बेहद प्रासंगिक हो जाता है कि यदि कोई व्यक्ति देश-विदेश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों की डिग्रियां हासिल करने के बाद भी समाज में उठने-बैठने, किसी से बात करने का सलीका और बड़ों का आदर करने जैसी बुनियादी तहज़ीब से महरुम है, तो क्या उसकी शिक्षा को वास्तविक माना जा सकता है? कदापि नहीं। ऐसी पढ़ाई महज किताबी सूचनाओं का एक बेजान संग्रह है, जिसे किसी भी रूप में वास्तविक ‘एजुकेशन’ नहीं कहा जा सकता।
वास्तविकता यह है कि शिक्षा का अंतिम ध्येय मनुष्य का मानसिक, बौद्धिक और नैतिक परिष्कार करना है। यदि कोई अकादमिक डिग्री एक व्यक्ति को संवेदनशील, उत्तरदायी और विनम्र नागरिक नहीं बना पाती और उसका पूरा ध्यान सिर्फ पैसा कमाने की मशीन तैयार करने पर रहता है, तो वह डिग्री विश्वविद्यालय के मुहर वाले एक कागज़ के टुकड़े से अधिक और कुछ नहीं है।
सच्ची शिक्षा की सार्थकता इसी बात में है कि वह व्यक्ति को एक बेहतर इंसान में तब्दील करे। किसी भी शिक्षित व्यक्ति का ज्ञान उसके अहंकार में नहीं, बल्कि उसके व्यवहार की शालीनता में प्रतिबिंबित होना चाहिए। ज्ञान को मनुष्य के व्यक्तित्व और ‘बिहेवियर’ को निखारने का माध्यम बनना चाहिए, उसे जीवन जीने की सही कला सिखानी चाहिए और उसमें घमंड के बजाय नम्रता का संचार करना चाहिए।
यह एक अकाट्य सामाजिक सत्य है कि किसी भी व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसकी डिग्रियों या बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि समाज के प्रति उसके व्यवहार से निर्धारित होती है। हमारा व्यवहार ही यह तय करता है कि सामाजिक परिवेश में हमें कितना सम्मान मिलेगा और हमारे अवसान के बाद लोग हमें किस रूप में याद रखेंगे।
जीवन के व्यावहारिक धरातल पर व्यवहार हमेशा किताबी ज्ञान से कहीं ऊपर ठहरता है। जीवन की पाठशाला का पाठ्यक्रम तकनीकी किताबों से सर्वथा भिन्न है। मनुष्य के जीवन में कई बार ऐसी अप्रत्याशित और जटिल परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं, जहां बड़ी से बड़ी डिग्रियां, उच्च पद और तकनीकी विशेषज्ञता धरे के धरे रह जाते हैं। ऐसे संकट काल में केवल व्यक्ति का संयमित व्यवहार, उसका धैर्य और दूसरों के प्रति हमारी सहानुभूति ही विषम परिस्थितियों को संभालने में सक्षम होती है।
इस संदर्भ में, आज की युवा पीढ़ी को अपनी दिशा और प्राथमिकताओं पर आत्ममंथन करने की बहुत आवश्यकता है। करियर की अंधी प्रतिस्पर्धा और वैश्विक पहचान बनाने की ललक में युवा वर्ग को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और नैतिक संस्कारों से विमुख होने से बचना होगा।
युवाओं को यह दृढ़ता से समझना होगा कि उनकी डिग्रियां, तकनीकी कौशल और आर्थिक समृद्धि तब तक पूर्णतः निरर्थक हैं, जब तक कि उनके स्वभाव में विनम्रता और सहिष्णुता का समावेश नहीं होता। जीवन में वास्तविक सफलता केवल आर्थिक संपन्नता से नहीं, बल्कि समाज से अर्जित आदर और अपने उत्तम व्यवहार से ही मापी जाती है।
अक्सर देखा जाता है कि लोग प्रशासनिक ऊंचाइयों और आर्थिक संपन्नता के मद में चूर होकर अपनों और परायों का सम्मान करना भूल जाते हैं।
परंतु इतिहास साक्षी है कि समय चक्र के साथ धन, पद और प्रतिष्ठा सदैव परिवर्तनशील रहे हैं। इस संदर्भ में यह पंक्तियां अत्यंत सटीक और विचारणीय हैं:
“ऊँचा औधा, आर्थिक संपन्नता पर मत करो अभिमान,
दूसरों के दिलों में तो अच्छा व्यवहार ही दिलाता है सम्मान।”
फंडा यह है कि समकालीन समाज को केवल साक्षर या डिग्रीधारियों की एक बड़ी फौज की आवश्यकता नहीं है, बल्कि सुशिक्षित, संवेदनशील और सुसंस्कृत नागरिकों की आवश्यकता है। आपकी डिग्रियां आपको एक बेहतर कॉरपोरेट नौकरी या आजीविका का साधन तो दिला सकती हैं, लेकिन समाज में वास्तविक आदर, स्वीकार्यता और अपनों का आत्मिक स्नेह केवल और केवल आपका उत्कृष्ट व्यवहार ही सुनिश्चित कर सकता है।
अतः वर्तमान समय की यह पुरज़ोर मांग है कि हम साक्षरता के साथ-साथ व्यवहार कुशलता, सामाजिक नैतिकता और मानवीय मूल्यों को अपनी जीवन शैली का अभिन्न हिस्सा बनाएं।
