हिंदू राष्ट्र का क्या अर्थ है?

हिंदू राष्ट्र का क्या अर्थ है?

प्रभात पटनायक

 

हिंदू राज्य, जैसा कि इसके नाम से प्रतीत होता है, एकाधिकार पूंजी की तानाशाही के अलावा और कुछ नहीं है, जिसे मोदी बेशर्मी से बढ़ावा दे रहे हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का उद्देश्य भारत में एक हिंदू राज्य की स्थापना करना है। लेकिन हिंदू राज्य का वास्तव में क्या अर्थ है? इसका सीधा और स्पष्ट उत्तर यह होगा कि वर्तमान में संविधान द्वारा सभी नागरिकों को धर्म के आधार पर जो समानता प्राप्त है, उसके स्थान पर ऐसे राज्य में हिंदुओं को अन्य धर्मों के अनुयायियों, विशेषकर मुसलमानों (जो देश में सबसे बड़ा धार्मिक अल्पसंख्यक हैं) की तुलना में श्रेष्ठ दर्जा प्राप्त होगा।

हालांकि, इस तरह की असमानता को एक दमनकारी राज्य के बिना कायम नहीं रखा जा सकता। वर्ग-दमनकारी समाज में सभी राज्य दमनकारी होते हैं, लेकिन जो राज्य इस तरह से असमानता को संस्थागत रूप देता है, उसे और भी अधिक दमनकारी होना पड़ेगा। क्या हिंदू राज्य का अर्थ हिंदुओं नामक एक समूह द्वारा अन्य धर्मों के लोगों पर तानाशाही स्थापित करना होगा?

जैसे ही यह सवाल पूछा जाता है, जवाब स्पष्ट रूप से “नहीं” होता है। एक हिंदू राज्य में रिक्शा चालक, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो, रिक्शा चालक ही रहेगा ; एक हिंदू राज्य में चपरासी, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो, चपरासी ही रहेगा ; एक हिंदू राज्य में दिहाड़ी मजदूर, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो, दिहाड़ी मजदूर ही रहेगा।

तथाकथित हिंदू राज्य हिंदुओं के बहुमत के जीवन की भौतिक स्थिति में कोई बदलाव लाने का वादा नहीं करता और न ही ऐसा कर पाएगा ; तो फिर तानाशाही, जो कि ऐसे राज्य का अनिवार्य रूप से हिस्सा होगी, किसके हित में चलाई जाएगी? इसका स्पष्ट उत्तर है : एकाधिकार पूंजी के हित में। हिंदू राज्य, जैसा कि इसके नाम से प्रतीत होता है, वास्तव में एकाधिकार पूंजी की तानाशाही के अलावा कुछ नहीं है।

राज्य के कार्यों से पहले हिंदू रीति-रिवाजों और धार्मिक प्रथाओं का दिखावा तो होगा ही, और नौकरियों के चयन में अन्य लोगों की तुलना में हिंदुओं को प्राथमिकता दी जाएगी ; लेकिन नई नौकरियां तो न केवल आज की तरह न के बराबर होंगी, बल्कि कॉरपोरेट जगत द्वारा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के प्रयोग से मौजूदा नौकरियां भी लुप्त हो जाएंगी। जहां मुसलमान और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों को गंभीर और बहुआयामी उत्पीड़न का सामना करना पड़ेगा, वहीं हिंदुओं को अपने उत्पीड़न से कोई राहत नहीं मिलेगी ।

जिस वर्ग की शक्ति में अत्यधिक वृद्धि होगी, वह एकाधिकारवादी पूंजीपति वर्ग है, और इस वर्ग के भीतर भी एकाधिकारवादी पूंजीपति वर्ग का नया समूह है। दूसरे शब्दों में : एक हिंदू राज्य वह राज्य होगा, जिस पर आम तौर पर भारतीय बड़े निगमों का, और विशेष रूप से अडानी और अंबानी जैसे बड़े निगमों का, प्रभुत्व होगा।

यह 1930 के दशक में जर्मनी की स्थिति की याद दिलाता है, जहां नाजियों ने यहूदियों (नाजियों का मानना ​​था कि किसी व्यक्ति का “आर्यन यहूदी” होना असंभव है) और जिप्सियों (इसी तरह “आर्यन जिप्सी” होना भी असंभव माना जाता था) जैसी “गैर-आर्यन” आबादी को पीड़ित करके “आर्यन श्रेष्ठता” को प्रभावी बनाने का दावा किया था।

हालाँकि, नाज़ी राज्य कोई “आर्यन राज्य” नहीं था। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के अध्यक्ष जॉर्जी दिमित्रोव ने 1935 में अपने सातवें सम्मेलन में कहा था कि नाज़ी द्वारा स्थापित तानाशाही, “वित्तीय पूंजी के सबसे प्रतिक्रियावादी, सबसे कट्टरपंथी और सबसे साम्राज्यवादी तत्वों की खुली आतंकवादी तानाशाही” थी।

सत्ताधारियों द्वारा राज्य का जो वर्णन किया जाता है, वह आवश्यक रूप से उसकी वास्तविकता से मेल नहीं खाता। प्रश्न यह है कि कौन-सा वर्ग राज्य का उपयोग अपने स्वार्थों को साधने के लिए कर रहा है? समकालीन समय में वे सभी राज्य, जो लोकतंत्र को कुचलकर और अन्य समूहों को द्वितीय श्रेणी के नागरिक बनाकर किसी जातीय, धार्मिक या भाषाई समूह के हितों को साधने का दावा करते हैं, वास्तव में एकाधिकार पूंजी के हितों को साधने का काम कर रहे हैं, क्योंकि वे तानाशाही स्थापित कर मेहनतकश जनता को जातीय, धार्मिक या भाषाई आधार पर विभाजित करने का प्रयास कर रहे हैं। आधुनिक, बहु-विभागीय समाज में खंडित राज्य की स्थापना वास्तव में एकाधिकार पूंजी की तानाशाही के समान है।

यह सवाल उठ सकता है : जब मौजूदा “धर्मनिरपेक्ष” राज्य भी एकाधिकार पूंजी के प्रभुत्व में है, तो एकाधिकार पूंजी को एक नए, बिल्कुल अलग, हिंदू-प्रधान राज्य की आवश्यकता क्यों होनी चाहिए, जो उसकी तानाशाही का प्रतीक हो, और इसलिए वह इसके गठन में सहायता क्यों करे? इस तरह के बदलाव की आवश्यकता स्पष्ट रूप से तभी उत्पन्न होती है, जब राज्य का पूर्ववर्ती स्वरूप गंभीर खतरे का सामना करता है ; और ऐसा तब होता है, जब अर्थव्यवस्था में ठहराव आ जाता है और बेरोजगारी बहुत बढ़ जाती है। हिंदू राज्य के वेश में एकाधिकार पूंजी की तानाशाही की ओर वर्तमान कदम नव-उदारवादी शासन की विफलता को दर्शाता है, जिसने अर्थव्यवस्था में ठहराव ला दिया है, और मेहनतकश लोगों के विशाल जनसमूह के लिए बेरोजगारी और घोर संकट को बढ़ा दिया है।

लोकतंत्र मेहनतकश जनता को प्रतिरोध और संघर्ष के लिए व्यापक अवसर प्रदान करता है, जिसके कारण किसी भी संकट के दौर में लोकतंत्र को कमजोर करने के प्रयास किए जाते हैं, ताकि एकाधिकार पूंजी के वर्चस्व को खतरे से बचाया जा सके। लेकिन जब संकट लंबा खिंचता है और उसके वर्चस्व को खतरा बना रहता है, तो एकाधिकार पूंजी अधिक चरम उपाय अपनाती है।

वह जनता को विभाजित करने में सबसे सक्षम किसी भी शक्ति के साथ गठबंधन करती है, ताकि एक वैकल्पिक भ्रामक विमर्श उत्पन्न किया जा सके, मेहनतकश जनता को एकजुट होकर संघर्ष करने से रोका जा सके और सांप्रदायिक राज्य की स्थापना के नाम पर लोकतंत्र को कुचलने को उचित ठहराया जा सके, जो भारतीय संदर्भ में प्रतिज्ञाबद्ध हिंदू राज्य है।

आरएसएस-भाजपा के भाषणों का भ्रामक स्वरूप इस समय स्पष्ट है। जब देश का कार्यबल, विशेषकर युवा, बेरोजगारी से जूझ रहा है, जब शिक्षित बेरोजगारी की दर अत्यधिक है, तब भी देश के शासक इस गंभीर समस्या पर एक शब्द भी नहीं कह रहे हैं ; इसके बजाय, वे बांग्लादेश से घुसपैठ का शोर मचा रहे हैं! विडंबना यह है कि भाजपा के अपने ही आकलन के अनुसार, किसी राष्ट्र का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद उसकी प्रगति का सूचकांक है, और बांग्लादेश, जिसकी आईएमएफ के अनुसार, वर्तमान में प्रति व्यक्ति आय भारत से अधिक है, को भारत से अधिक विकसित माना जाना चाहिए। ऐसे में भाजपा एक अधिक विकसित देश से कम विकसित देश में इतनी बड़ी घुसपैठ का दावा कैसे सही ठहरा सकती है?

उदारवादी विचारधारा कुछ समय से यह समझाने की कोशिश कर रही है कि हाल ही में भारत में हिंदुत्व का इतना उभार क्यों आया है। लेकिन यह इस बात को नज़रअंदाज़ कर रही है कि भारत में हिंदुत्व का उदय विश्व भर में नव-फासीवाद के उभार का ही एक हिस्सा है, जिसके कारण इस उभार की कोई भी भारत-विशिष्ट व्याख्या पर्याप्त नहीं होगी।

दूसरे शब्दों में, हिंदुत्व का उदय कोई अनोखी घटना नहीं है ; यह काफी हद तक एकाधिकार पूंजी द्वारा वित्तीय और मीडिया समर्थन के माध्यम से संचालित किया जा रहा है, भारत में भी, और पूंजीवादी दुनिया के अन्य हिस्सों में भी, अर्जेंटीना से लेकर अमेरिका, इटली, फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन तक, नवउदारवादी पूंजीवाद द्वारा विश्व अर्थव्यवस्था में लाए गए गतिरोध के संदर्भ में।
आरएसएस ने हाल ही में अपनी शताब्दी मनाई है।

यह तथ्य कि सौ वर्षों तक सत्ता से इसका कोई वास्ता नहीं था, और आज यह दुनिया की “सबसे धनी राजनीतिक पार्टी” होने का दावा कर सकती है, इसका श्रेय वर्तमान में एकाधिकार पूंजी से प्राप्त भारी समर्थन को दिया जा सकता है।

लेकिन केवल एकाधिकार पूंजी ही हिंदुत्व के प्रति अनुकूल नहीं हुई है। हिंदुत्ववादी तत्वों ने भी एकाधिकार पूंजी के प्रति अपना रवैया बदल लिया है। आरएसएस का मुख्य समर्थक आधार मूल रूप से दुकानदारों, छोटे पूंजीपतियों और शहरी मध्यम वर्ग के बीच था, और इसे कुछ सामंती तत्वों का वित्तीय समर्थन प्राप्त था।

बेशक, इसने कभी भी एकाधिकार-विरोधी बयानबाजी नहीं अपनाई, जैसा कि उदाहरण के लिए जर्मनी में हुआ था, जहां नाजियों ने सत्ता में आने से पहले खुले तौर पर एकाधिकार-विरोधी रुख अपनाया था; लेकिन आरएसएस पूरी तरह से एकाधिकार पूंजी समर्थक भी नहीं था। आर्थिक नीति के संबंध में हिंदुत्ववादी खेमे के भीतर वैकल्पिक आवाजें भी थीं, हालांकि आर्थिक नीति स्वयं हिंदुत्ववादी ताकतों के लिए स्पष्ट रूप से चिंता का विषय नहीं थी।

नरेंद्र मोदी का योगदान इन सब को बदलने में रहा है। हिंदुत्व के पदानुक्रम में उनका महत्व इसलिए है, क्योंकि वे कॉरपोरेट-हिंदुत्व गठबंधन के सूत्रधार बने ; और इसी गठबंधन के गठन से हिंदुत्व सत्ता में आया। दरअसल, मोदी को देश के प्रधानमंत्री के रूप में बढ़ावा देने का विचार गुजरात में पूंजीपतियों के एक सम्मेलन में रखा गया था, जब मोदी उस राज्य के मुख्यमंत्री थे। और मोदी एकाधिकार पूंजी, विशेष रूप से इसके भीतर के नए तत्वों के, निर्भीक और बेबाक समर्थक बन गए।

इस प्रक्रिया में वे अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के प्रमोटर भी बन गए, जिसके साथ नवउदारवादी युग में भारतीय एकाधिकार पूंजी का एकीकरण हो गया था। नवउदारवादी पूंजीवाद की गतिरोध की स्थिति में, मोदी अपने नव-फासीवादी एजेंडे के साथ भारतीय एकाधिकार पूंजी के लिए विशेष रूप से उपयोगी संपत्ति बन गए हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं।

लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के आर्थिक अध्ययन एवं योजना केंद्र में प्रोफेसर एमेरिटस हैं।

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