जंतर मंतर बूझने के मतान्तर

जंतर मंतर बूझने के मतान्तर

 बादल सरोज

राजधानी दिल्ली में जंतर मंतर पर 6 जून को जमा हुए लोग जितने भी रहे हों, मगर उन्हें लेकर शुरू हुयी बहस और विमर्श के पहलू और आयाम, आशंकाएं और अनुमान यक़ीनन उनकी संख्या के अनुपात में इतने हैं कि उन्हें एकजाई करने के लिए कठिन मेहनत की जरूरत है। किसी ने इसे जेन-जी कहा, किसी ने इसे जेन-जेड बताया, किसी ने इसे इतिहास के दोहराव की तीसरी अवस्था, प्रहसन मानकर छुट्टी पा ली। कुल मिलाकर यह कि जाकी रही भावना जैसी; जंतर मंतर देखी तिन तैसी !! इनमें से ज्यादातर ने सिर्फ रूप और आवरण को ही संज्ञान में लिया है। हर हलचल और घटना विकास को समझने के लिए जो सबसे अनिवार्य है वही काम, उसके कारण और सार का निदान करने की कोशिश तक नहीं की।

बहस इस बात पर ज्यादा है कि ये जो भीड़ आई है — इन्स्टाग्राम और सोशल मीडिया पर चली मुहिम ने जो जगार मचाई है, वह कहां तक जायेगी? जोर इस पर ज्यादा है कि कौन हैं ये लोग? कहां से आये हैं? जबकि कायदे से शुरुआत इस बात से होनी चाहिए थी कि मानव समाज की टकसाल से निकले एकदम ताजे और अभी तक गर्मागर्म खरे सिक्कों ने अभिव्यक्ति के अभी तक बचे माध्यमों पर चहककर, सड़क पर उतर कर जो आवाज उठाई है, उसके क्या और क्यों, क्या हैं? उन्होंने जो बोला उसका निहितार्थ क्या है? इस तरह से तनिक गहराई से जांच पड़ताल इसलिए और जरूरी हो जाती है, क्योंकि यह सब करने वाले वे युवा हैं, जिनके विवेक पर पिछले डेढ़-दो दशक से लगातार सवाल उठाये जाते रहे हैं । जिनकी कथित घटती और सिकुड़ती सामाजिक चेतना के मर्सिये लिखे जाते रहे हैं। जिन्हें कैरियरपरस्त और आभासीय मीडिया में मस्त, खुलेपन की कथित सारी बीमारियों से ग्रस्त और नफरती प्रचार से लस्त-पस्त मानकर, उनकी सामाजिक भूमिका को लगभग खारिज किया जाता रहा है।

अभी हाल में नहीं रहे मशहूर शायर बशीर बद्र साहब के शेर ‘‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी / यूं कोई बेवफा नहीं होता’’ के हिसाब से उन विवशताओं को समझा जाना चाहिए था, जिनके चलते वे बिना किसी सांगठनिक ढांचे के इस अजीब से नाम वाली मुहिम के साथ खुद को इस कदर जुड़ा महसूस करने लगे कि सिर्फ आभासीय मीडिया के बुलावे पर, जून की तपती दोपहरी में सड़क पर आ पहुंचे।

बात उस परीक्षा घोटाले पर होनी थी, जिसने एक बार फिर लाखों युवाओं का एक और बेशकीमती साल बर्बाद कर दिया। उनके अभिभावकों के सैकड़ों करोड़ पानी में बहा दिए। देश के रोजगार वंचित युवाओं को तिलचट्टा – कॉकरोच – बताने वाली उस अभद्र, अशिष्ट और अपमानजनक टिप्पणी पर बहस होनी चाहिए थी, जो किसी ऐरे-गैरे, शाखा शृगाल के मुंह से नहीं निकली थी, देश के सुप्रीम कोर्ट के सुप्रीम जज ने की थी और उसके लिए आज तक माफ़ी नहीं मांगी। बात शिक्षा प्रणाली की उस दुर्गति पर होनी चाहिए थी, जिसने उपलब्धता से लेकर विषयवस्तु तक, हर मामले में इसे अब तक की सबसे बुरी दशा में पहुंचा दिया है। पहचान अपराधियों की होनी चाहिए, मगर सुधीजनों की बिरादरी द्वारा शिनाख्त परेड फरियादियों की करवाई जा रही है। लिहाजा अच्छा होगा कि ऐसा करने वालों की चिंताओं – अगर वे हैं तो – पर थोड़ी निगाह डाल ली जाए। बिना किसी अतिरेक या अतिरंजना के उनके नजरिये को समझने की कोशिश कर ली जाए।

6 जून के जमावड़े पर एक तरह की प्रतिक्रिया उनकी है, जो अन्ना की मरीचिका से ऐसे भयभीत हैं कि अब यमुना से नर्मदा तक हर नदी के उभार में इन्हें कालियादह नाग ही दिखता है। ये लोग भले और सदाकांक्षी लोग हैं — तानाशाही की फासिज्म की ओर तेज होती कदमचाल से कुछ घबराये और उसका विकल्प होने की जिन-जिन से उम्मीदें लगाई थीं, उनके शरणागत हो जाने से ठगे और सताए हुए लोग हैं। ‘‘जिनको हाथ समझ पकड़ा था, वे केवल दस्ताने निकले’’ की गत को हासिल होने से अपने आप से ही इतना खीजे हुए हैं कि दूध पीना तो छोड़ ही चुके हैं — छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीने तक का जोखिम नहीं उठाना चाहते हैं। हर चीज पर प्रश्न करना बुरी बात नहीं है, मगर किसी दु:स्वप्न के चलते हर उम्मीद खारिज कर देना भी अच्छी बात नहीं है। ‘डाउट एवरीथिंग’ तो ठीक है, मगर इस आधार पर ‘डिस्कार्ड एवरीथिंग’ तक पहुंच जाना सही नहीं है। अगर जनाक्रोश की हर अभिव्यक्ति अन्ना के पोथन्ने में दर्ज उलटबांसियों की तर्ज में ही पढ़ी और व्याख्यायित की जायेगी, तो रास्ते कम खुलेंगे, मनोगत बाधाएं ज्यादा खड़ी होंगी।

एक दुश्चिंता उनकी है, जो फिलहाल तो अपने कर्मों से ‘मलबे के मालिक’ बन कर रह गए हैं, मगर भरम अभी भी शहर के दरोगा होने का पाले हुए हैं। अपने नेता के शाब्दिक बयानों को ही असहयोग आन्दोलन और दांडी मार्च माने बैठे ये बंधू-बांधव बिना रुमाल बिछाए ही सारी जगह को अपनी माने ‘गर विपक्ष बर-रू-ए ज़मीं अस्त, हमीं अस्तो, हमीं अस्तो, हमीं अस्त’ का मुंगेरीलाली मुगालता पाले बैठे हैं। मैदान में उतरने के दिखावे में भी अव्वल दर्जे की किफायत करते हुए भी उस पर अपने स्वामित्व का बोर्ड लगाए बैठे हैं। सडक़ों पर उतरकर एक कारगर विपक्ष की भूमिका निबाहने की बजाय ज्यादा दम वाम के खिलाफ सतही बयानबाजियों और जनता के दवाब में बनी साझी जाजिम से बाकियों को सरकाने में लगाते हैं। इनकी आपत्ति दिलचस्प है और वह यह है कि हमारे अलावा लडऩे वाला कोई और हो ही नहीं सकता। इसलिए सरकार के खिलाफ बाकियों के संगठित-असंगठित, योजनाबद्ध हों या स्वत:स्फूर्त, हर संघर्ष को ये अपने खिलाफ मानकर उसके इरादे पर संदेह करने लगते हैं।

6 जून के जमावड़े को लेकर सबसे ज्यादा मीन-मेख इन्हीं ने निकाली है। इसके आयोजकों के बारे में संघी आइटी सेल से भी ज्यादा खोद-खोदकर जिरह इन्हीं ने की है। लोकतंत्र में इस तरह के ब्राम्हणवाद की कोई जगह नहीं है — खासतौर से तब जब संकट में खुद लोकतंत्र ही हो। रहा सवाल, आंदोलनकारियों के खोज-खोजकर लाये जा रहे कथित अतीत पर सवाल उठाने का, तो ऐसी कारगुजारियों के बारे में ‘पहला पत्थर वह मारे जिसने कभी कोई गुनाह नहीं किया हो’ की हिदायत, ईसा दो हजार साल पहले दे गए हैं। और इस कसौटी पर तो देश भर में आमतौर से सिर्फ वामपंथी राजनीति और खासतौर से सिर्फ सीपीएम ही है, जो खरी उतरती है।

यह मानकर चलना कि हर आंदोलन शासक वर्गों की इच्छा से नियंत्रित और विकसित होता है, षडयंत्र ढूंढने की मानसिकता — कांस्पिरेसी सिंड्रोम — का परिचायक है। हां, शासकों में अपने खिलाफ होने वाले आंदोलनों और संघर्षों को अपने मुताबिक़ मोड़ने, ढालने की क्षमता पर्याप्त होती है। इन्हें कम करके नहीं आंका जाना चाहिए, किन्तु इसे बढ़ा-चढ़ा कर भी नहीं देखा जाना चाहिए। हर उभार को सिर्फ आशंकाओं की बिनाह पर खारिज नहीं किया जा सकता। बीजेपी और संघ इसका अन्ना जैसा सुथन्ना बनाकर अपनी गोटी तर करने में सफल होंगे कि नहीं? सीजेपी एक संगठित राजनीतिक पार्टी का आकार लेगी कि नहीं, यदि लेगी तो बाकी महत्वपूर्ण सवालों पर उसकी नीति और समझ ठीक-ठाक होगी कि नहीं? इनके लिए इन्तजार किया जाना चाहिए। निदा फाजली के शेर के अंदाज़ में कहें तो ‘एक सितारा है चमकने दो उसे आंखों में / क्या जरूरी है उसे पार्टी बनाकर देखो।’

इन अनपेक्षित प्रतिक्रियाओं के बीच जिन्हें युवाओं के गुस्से में सुलगते चेहरों से डर लगना चाहिए था, वे सच में डरे हुए हैं। इतने ज्यादा डरे हुए हैं कि देश-दुनिया की हाल की सारी चुनौतियों पर मौनव्रत धारण किये रहा आरएसएस सबसे पहले मैदान में कूद पड़ा है। आफत में फंसने पर वह जिसे अपना अखबार मानने से साफ़ मुकर जाता है, उस मुखपत्र ऑर्गनाइजऱ में छपे लेखों में इस आंदोलन को, राष्ट्र-निर्माण के सकारात्मक प्रयासों को कमजोर करने और युवाओं में असंतोष की संस्कृति को बढ़ावा देने का एक प्रायोजित प्रयास और ‘फ्रीबी-केंद्रित, वामपंथी झुकाव वाले राजनीतिक इकोसिस्टम’ का हिस्सा बताया गया है।

ऑर्गनाइजऱ ने अपने संपादकीय के शीर्षक ‘काकरोच सिंड्रोम : भारत-विरोधी तकनीकी संशयवाद का नया चेहरा’ में ही अपनी मंशा साफ़ कर दी। इसमें आंदोलनकारी युवाओं के घोषित पांच लक्ष्यों, जिनमें चुनाव अधिकारियों के खिलाफ आतंकवाद-रोधी कानून लगाने और दल-बदल करने वाले नेताओं पर प्रतिबंध लगाना शामिल है, पर भी हल्ला बोला गया है। संघ संपादकीय ने इन्हें ‘संस्थागत पतन का वह भयावह खाका’ बताया है, ‘जिसे युवा डिजिटल विद्रोह का रूप दिया गया है’। अडानी ग्रुप और रिलायंस समूहों के स्वामित्व वाले मीडिया घरानों के लाइसेंस रद्द करने की मांग को लेकर तो संघ को इतना गहरा दर्द हुआ कि वह बिलबिला ही गया है। उसे इसमें, स्टालिनवादी कम्युनिस्ट सेंसरशिप’ और ‘घरेलू पूंजी पर एक दुर्भावनापूर्ण, लक्षित हमला’ तक दिखाई दे गया। संघ के इन देशी अभिभावकों की हितरक्षा करते-करते वह अमरीकी कार्पोरेट्स के गुणगान तक जा पहुंचा और लिखा कि ‘पश्चिमी तकनीकी प्रभुत्व विशाल कॉरपोरेट कंपनियों पर आधारित है — ठीक उसी तरह की कंपनियां, जिन्हें सीजेपी खत्म करना चाहती है। एक तरफ सेमीकंडक्टर क्रांति की मांग नहीं कर सकते और दूसरी ओर उन्हीं बड़े औद्योगिक समूहों को खत्म करने की बात नहीं कर सकते, जो ऐसी क्रांति को वित्तपोषित करने में सक्षम हैं।’

संघ का निष्कर्ष स्पष्ट है — इस आंदोलन का वास्तविक उद्देश्य उस पीढ़ी में ‘भीख मांगने वाली व्यापक और अपरिहार्य मानसिकता’ पैदा करना है, जो उनके मुताबिक दुनिया की सबसे संभावनाशील अर्थव्यवस्थाओं में से एक की उत्तराधिकारी है। कुल मिलाकर संघ ने सीजेपी को वास्तविक हताशा से बाहर निकालने का एक ज़रिया (प्रेशर वॉल्व) मानने के बजाय, उसे राष्ट्रीय आत्मविश्वास पर किया गया एक सुनियोजित हमला बताया है।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने तो सीधे धमकी देते हुए कह दिया कि ‘डिजिटल माध्यम का उपयोग देश की युवा क्रांति को नकारात्मक दिशा में ले जाने के लिए कभी नहीं होने दिया जाएगा। ऐसा करने की कोशिशों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।’ नबीन यह बात रांची में ठीक उस समय कह रहे थे, जब जंतर-मंतर पर हजारों युवाओं की भीड़ अपने गुस्से को स्वर दे रही थी। डोनाल्ड ट्रम्प और बेंजामिन नेतन्याहू से सीख कर आने वाली पार्टी के प्रमुख फरमा रहे थे कि, ‘विदेश में बैठे कुछ लोग सोचते हैं कि वे भारत के युवाओं को दिशा देंगे। भारत के युवा किसानों के साथ गांव के चौराहों पर बैठते हैं, गांवों की गलियों में रहते हैं, कोचिंग संस्थानों में पढ़ते हैं और कॉलेजों के परिसरों में रहते हैं। भारत के युवा कुछ लोगों के हाथों की कठपुतली बनकर आगे नहीं बढ़ेंगे।’ मतलब साफ़ है कि भाजपा की निगाह में नीट की परीक्षा या शिक्षा घोटाले पर बोलना, नकारात्मकता है!!

6 जून को और उससे पहले जो उभरा है, वह आक्रोश का एक गुबार है। विक्षोभ और रोष हमेशा एक-सी भाषा में बयान नहीं होता, एक-सी लिपि में नहीं लिखा जाता। एक जैसे पैटर्न में नहीं आता। हर बार इसकी वर्तनी अलग और अक्सर नयी होती है। इन सबको उसके कालखंड से अलग-थलग करके देखना सही तरीके से देखना नहीं है। जिसके बाद यह फूटता है, उस घटना विशेष तक सीमित रखकर समझना भी पूरी तरह से समझना नहीं है। संचित संत्रास और पीड़ा का जब विस्फोट होता है, तो जरूरी नहीं कि वह निदान के साथ व्यवस्थित समाधान भी सूत्रबद्ध करके लाये। इतिहास में ऐसा अनेक बार हुआ है, जब असली कारण कुछ और रहे, उनके सामने आने के तात्कालिक कारण कुछ और ही रहे। मौजूदा घटना विकास के साथ तुलना के लिए नहीं, इसे समझने के संदर्भ के रूप में इनमें कुछ पर निगाह डाली जा सकती है।

मेरठ की छावनी में 1857 की 10 मई की बगावत, 1919 की 13 अप्रैल को अमृतसर के जलियांवाला बाग़ की जमावट, 18 फरवरी 1946 में बम्बई – अब मुंबई – से कराची तक फैला भारत के नौ-सैनिकों का विद्रोह, 18 मार्च 1974 को बिहार के छात्रों का युगांतरकारी आन्दोलन, उन तात्कालिक कारणों तक ही सीमित नहीं थे — कारतूस में सूअर और गाय की चर्बी, किचलू और सप्रू की गिरफ्तारी, बदबू मारता कीड़ा पड़ा खाना या हॉस्टल की मैस में खाने की दरें बढाया जाना, आदि। इनके पीछे ग्रामीण भारत के तीखे और असहनीय शोषण, गुलामी की घुटन और बेरोजगारी सहित भविष्य के प्रति आशंका से उपजी बेचैनी थी।

महत्वपूर्ण संचित क्षोभ था, नारे और विकल्प उसके बाद की प्रक्रियाओं में उभरे थे। सामाजिक हलचल, विशेषकर स्वत:स्फूर्त उथल-पुथलें इसी तरह उभरती हैं। इस तरह कई बार विकसित होते हुए वे असली कारणों को भी चीन्हते हुए, उनके निराकरण की मांगों और विकल्प के मुद्दे तक पहुंच जाती हैं। पर कई बार नहीं भी पहुंचती हैं। कई बार यह धूर्तों के हत्थे भी चढ़ जाती हैं। मगर सिर्फ इस बिनाह पर कि उसके पास पहले से ही सब कुछ व्यवस्थित और स्पष्ट नहीं है, उसे खारिज कर देना, जिस जन भावना का यह हलचल परिणाम है, उसका ही तिरस्कार करने जैसा है।

जैसे 17 दिसंबर 2010 को सरकार और पुलिस के भ्रष्टाचार से आजिज आकर ट्यूनीशिया में युवा फल विक्रेता मोहम्मद बुआजीजी के खुद पर पेट्रोल छिडक़कर आत्मदाह कर लेने के बाद सिर्फ उसके देश में ही नहीं, कई अरब देशों में उबाल आ गया था। ‘‘अरब स्प्रिंग’’ के नाम से प्रसिद्घ हुई इस लहर ने मिस्र, ट्यूनीशिया, सीरिया, यमन और बहरीन की तानाशाह हुकूमतों को एक बार तो घुटनों पर भी ला दिया। थोड़ा-बहुत लोकतंत्र का विस्तार हुआ भी, हालांकि अंतत: शासक वर्ग ने उसे हजम कर लिया।

6 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर क्या हुआ, क्या नहीं, इसका हिसाब बाद में भी किया जा सकता है। मगर उस दिन जमा हुई युवाओं की भीड़ जब देश के युवाओं, लोकतंत्र और संविधान की हिमायत में निडरता और बेबाकी से अपनी बात रख रही थी, तब और कुछ हो रहा था कि नहीं, रघुवीर सहाय के शब्दों में, ‘‘टूटे न टूटे तिलिस्म सत्ता का, मेरे भीतर का कायर तो टूटेगा’’ — उनका डर टूट रहा था। शोषितों का डर जब टूटता है, तो वह हवा में विलीन होकर गायब नहीं होता है, शोषकों और उत्पीडक़ों के मन में बैठ जाता है।

हालांकि जो हुआ है, वह इससे कहीं अधिक हुआ है, मगर यदि इतना भी हुआ है, तो भी कोई कम बात नहीं है।

लेखक – बादल सरोज

लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।

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