ज़िंदगी के चंद पन्ने : एक पाठकीय टिप्पणी
त्रिभुवन
दो दिन पहले हाथ में एक कविता-संग्रह आया, ‘ज़िंदगी के चंद पन्ने’। कवयित्री हैं आकृति आज़ाद। नाम ही जैसे अपने भीतर एक निजी आकाश रखता है—आकृति भी और आज़ादी भी।
इस संग्रह को पढ़ते हुए बार-बार यह लगता है कि कविता कई बार किसी बड़े घोषणापत्र से नहीं, जीवन के बहुत छोटे, बहुत निजी, बहुत मौन क्षणों से जन्म लेती है। आकृति ने अपनी पहली कविता दस वर्ष की उम्र में अपने एक सहपाठी के पिता की मृत्यु पर लिखी थी। यह तथ्य केवल जीवनी-सूचना नहीं है; यह उनकी काव्य-यात्रा का पहला नैतिक संकेत भी है। इतनी छोटी उम्र में किसी दूसरे के दुःख को अपने भीतर जगह देना ही कविता की पहली सीढ़ी है।
आकृति संवेदनशील और विद्वान पिता डॉ. महेंद्र आज़ाद की बेटी हैं। यह भी इस संग्रह की पृष्ठभूमि में बहुत अर्थपूर्ण हो जाता है। एक सजग छात्रा की रफ़ कॉपियों में लिखी गई कविताओं को माँ-पिता ने सहेजकर रखा और बाद में जन्मदिन पर उन्हें पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाने का विचार आया—यह प्रसंग स्वयं में अत्यंत सुंदर है। यह केवल बेटी को दिया गया सरप्राइज़ गिफ्ट नहीं था; यह एक कवयित्री के भीतर छिपे संसार को सार्वजनिक जीवन में प्रवेश दिलाने जैसा था। माता-पिता ने रफ़ कॉपियों में बिखरे शब्दों को केवल काग़ज़ नहीं माना, उन्होंने उनमें एक आत्मा की धड़कन पहचानी।
‘ज़िंदगी के चंद पन्ने’ में कुल चौंसठ कविताएँ हैं। शीर्षकों से ही उनकी भावभूमि का अंदाज़ मिलता है—‘लाख बदल लो अपनी शक्ल-सूरत’, ‘दूर अंधेरे में’, ‘कभी-कभी कम पड़ जाते हैं जज़्बात’, ‘दुःख का पहलू’, ‘वो पल मेरे साथ’, ‘शाम थी’, ‘हवा उड़ती’, ‘साए’, ‘ख़ामोशी’, ‘आज हम अपनी आँखों’, ‘मैं इस शोर से दूर’, ‘हवाएँ’, ‘ये ज़िंदगी’, ‘आईने में’ आदि। संग्रह की शुरुआत ‘बरसात में नहाकर, हवाओं से महककर’ जैसी ताज़गी से होती है और वह ‘बंद मुट्ठी में, बंद आँखों में, साँसों में बंद हूँ’ जैसी गहन आत्मसंवेदना तक पहुँचता है।
इन कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे कठिन शब्दों की ओट में नहीं छिपतीं। वे सहज शब्दों में सहज ढंग से लिखी गई कविताएँ हैं। उनमें बनावट नहीं, भीतर से उठती हुई साफ़ आवाज़ है। आकृति जीवन को किसी दार्शनिक भारीपन में नहीं, बल्कि स्मृतियों, उदासियों, हवाओं, शामों, ख़ामोशियों और छोटे-छोटे आत्मसंवादों में पकड़ती हैं। उनकी कविता में एक लड़की का मन है, एक बेटी का संस्कार है, एक विद्यार्थी की बेचैनी है और धीरे-धीरे आकार लेती कवयित्री की अपनी स्वतंत्र दृष्टि भी है।
यह संग्रह इस बात का प्रमाण है कि कविता उम्र से नहीं, संवेदना से बड़ी होती है। आकृति आज़ाद की कविताएँ अपने पाठक से ऊँची आवाज़ में बात नहीं करतीं; वे उसके पास आकर धीरे से बैठती हैं। यही उनकी सुंदरता है, यही उनकी संभावना है।
