ओमसिंह अशफ़ाक की कहानी- लेखक

कई बार हमें लगता है कि लेखकों का जीवन विशेषकर रचनाकारों-साहित्यकारों का जीवन एकदम निर्बाध होता है और उनके जीवन में सब जगह सुख सुविधा ही होती हैं। यह विचार पश्चिमी देशों के लेखकों के विषय में सही हो सकता है। लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप और उसके साथ लगते अन्य विकासशील देशों के बारे में ऐसा दावा करना निर्विवाद नहीं है। भारत में हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के लेखकों का जीवन भी प्रायः त्रासदीपूर्ण रहा है और कई बार वहां ‘कॉमेडी’ भी ‘ट्रेजडी’ में बदलती दिख जाती है। हमें नहीं पता आलोचक इस स्थिति को कैसे परिभाषित करेंगे। फिलहाल हम इसे ‘कॉमिक-ट्रेजेडी’ समझकर वरिष्ठ कहानीकार ओमसिंह अशफ़ाक की ‘लेखक’ शीर्षक वाली कहानी यहां प्रस्तुत कर रहे हैं: संपादक।

कहानी

लेखक

ओमसिंह अशफ़ाक

 

हर महीने ऐसा ही होता है। दो परस्पर विरोधी घटनाएं साथ-साथ होती हैं। इधर दफ़्तर से उसे तनख्वाह मिलती है उधर कहानी लिखने का मूड बन जाता है। लेकिन ‘लक्ष्मी और सरस्वती’ का मेल कहाँ ? उनमें तो मानो छत्तीस का रिश्ता है? एक का आगमन हुआ नहीं कि दूसरी की विदाई निश्चित है। लेकिन अबकी बार वह ‘धन और विद्या’ की देवियों का मिलाप कराने पर तुला था। उसके पक्के इरादे के पीछे दो कारण थे। एक तो, अतिरिक्त महंगाई भत्ते के एरियर के रूप में वेतन के साथ तीन सौ रुपए और मिल गये थे। दूसरे, ‘डैड स्टाक आर्टीकल्स’ की माहवार रिपोर्टों का झंझट भी निबट गया था। अब वह आजाद था। इसलिए उसने एक उम्दा कहानी लिखने की ठानी थी। एक बेहतरीन रचना रच देने का संकल्प लेकर दफ्तर से लौटा था।

शाम को उसने खाना भी जल्दी ही खाया। अब की बार किसी भी सूरत में वह अवसर हो गंवा देना नहीं चाहता था। तनख्वाह रोज-रोज नहीं मिल सकती- मजबूरी है। इसी तरह कहानी भी रोज-रोज नहीं लिखी जा सकती-मजबूरी है। लेकिन आज उसने निश्चित किया है कि मजबूरी को ‘मरजी’ में बदलना है। उसे कहानी लिखनी ही है। महीने भर की कशमकश से छुट्टी पानी ही है।

वह अपने कागज तलाशता है। दफ़्ती और बालपैन अलमारी में ही मिल गई है। लेकिन, किस पर लिखा जाये ? इस प्रथम किन्तु शाश्वत सवाल से वह टकराता है। मुद्दों की कोई कमी है? उसे अपने आप पर क्रोध आता है। परमाणु युद्ध का खतरा मौजूद है? हां, है- वह खुद ही स्वीकार भी कर लेता है। लेकिन क्या इस मुद्दे पर वह कोई विश्वसनीय रचना दे सकता है ? उसकी भवें चढ़ जाती हैं, माथे की सलवटें तन जाती हैं तो भी अणु-परमाणु के बारे में उसे कुछ याद नहीं आता। वह मस्तिष्क पर पूरा जोर देकर सोचता है…इलैक्ट्रान, प्रोटान, न्यूट्रोन, बस ?…इससे आगे कुछ याद नहीं पड़ता।

उसे एक और उक्ति सूझती है। कहते हैं- साधु-महात्मा समाधिस्थ होकर इस लोक की ही नहीं, परलोक की भी जानकारी हासिल कर लिया करते हैं ? वह आंख मींचकर सोचने लगता है। सोचते ही जाता है। गहरे..और भी गहरे.. उतरकर समाधिस्थ हो जाना चाहता है। तभी किसी आहट से उसकी ‘समाधि’ भंग हो जाती है।… ‘महीना-भर’ सपरेटा पिलाता रहा, और अब कहता है कि साढ़े-तीन रुपये किलो से कम नहीं लगेगा। दूध ना हुआ, डाक्टर की फ़ीस हो गई। कोई मोल-भाव भी ना पूछने देवे।” उसकी पत्नी दूध वाले से उलझ रही थी।..

इसे भी आज ही कहानी में खलल डालना था। उसने सोचा, “ये कमबख़्त दूध वाला तो रोज आता है…” अनायास ही उसके मुंह से निकलकर ये शब्द हवा में तैर गये थे।

“दूध वाला तो रोज आता है, पर हिसाब तो रोज-रोज ना होवे है ?..क्यूं जी, डेढ़ किलो रोज़ाना के हिसाब से एक महीने का पैन्तालिस किलो ना बने है? ये मरा टीटू डेढ़ किलो ज्यादा किस तरियां बतावे है ?” -हे भगवान, उसने लम्बा निःश्वास छोड़ते हुए कहा, “अरै भागवान जनवरी का महीना इकतीस दिन का होवे है।” और वह परमाणु युद्ध का मोर्चा छोड़कर दूध के हिसाब के मोर्चे पर जुट गया…तीस डेढ़ पैन्तालिस प्लस डेढ़ बराबर साढ़े छियालिस जरबे साढ़े-तीन, बराबर…एक सौ बासठ रुपये पचहत्तर पैसे। पहले छुट्टे रुपयों का झगड़ा और फिर पचहत्तर पैसे की खरीज का।

ये दोनों मुद्दे भी तो महत्वपूर्ण हो सकते हैं, उसने सोचा। दूध का और खरीज का। दूध में सपरेटा की मिलावट का मुद्दा, पानी की मिलावट का मुद्दा, क्रीम की खिंचाई का मुद्दा, सिंघाडेन की गिरी के आट्टे की पिसाई का मुद्दा। उसके सामने मुद्दों की फ़ौज खड़ी हो गई। उसने मुद्दों को समेटना चाहा। लेकिन क्या इस मुद्दे पर वह कोई विश्वसनीय रचना दे सकता है ? उसकी भवें चढ़ जाती हैं, माथे की सलवटें तन जाती हैं तो भी अणु-परमाणु के बारे में उसे कुछ याद नहीं आता। वह मस्तिष्क पर पूरा जोर देकर सोचता है… इलैक्ट्रान, प्रोटान, न्यूट्रोन, बस ?… इससे आगे कुछ याद नहीं पड़ता।

उसे एक और उक्ति सूझती है। कहते हैं- साधु-महात्मा समाधिस्थ होकर इस लोक की ही नहीं, परलोक की भी जानकारी हासिल कर लिया करते हैं ? वह आंख मींचकर सोचने लगता है। सोचते ही जाता है। गहरे, और भी गहरे उतरकर समाधिस्थ हो जाना चाहता है। तभी किसी आहट से उसकी ‘समाधि’ भंग हो जाती है। ‘महीना-भर’ सपरेटा पिलाता रहा, और अब कहता है कि साढ़े तीन रुपये किलो से कम नहीं लगेगा। दूध ना हुआ, डाक्टर की फीस हो गई। कोई मोल-भाव भी ना पूछने देवे।” उसकी पत्नी दूध वाले से उलझ रही थी।

इसे भी आज ही कहानी में खलल डालना था। उसने सोचा, “ये कमबख्त दूध वाला तो रोज आता है…” अनायास ही उसके मुंह से निकलकर ये शब्द हवा में तैर गये थे।

“दूध वाला तो रोज आता है, पर हिसाब तो रोज-रोज ना होवे है ?… क्यूं जी, डेढ़ किलो रोजाना के हिसाब से एक महीने का पैन्तालिस किलो ना बने है? ये मरा ऊदल डेढ़ किलो ज्यादा किस तरियां बतावे है ?” – हे भगवान, उसने लम्बा निःश्वास छोड़ते हुए कहा, “अरी भागवान जनवरी का महीना इकतीस दिन का होवे है।” और वह परमाणु युद्ध का मोर्चा छोड़कर दूध के हिसाब के मोर्चे पर जुट गया… तीस डेढ़ पैन्तालिस और डेढ़, साढ़े छियालिस जरबे साढ़े-तीन, बराबर… एक सौ बासठ रुपये पचहत्तर पैसे। पहले छुट्टे रुपयों का झगड़ा और फिर पचहत्तर पैसे की खरीज का।

ये दोनों मुद्दे भी तो महत्वपूर्ण हो सकते हैं, उसने सोचा। दूध का और खरीज का। दूध में सपरेटा की मिलावट का मुद्दा, पानी की मिलावट का मुद्दा, क्रीम की खिंचाई का मुद्दा, सिंघाडे की गिरी के आट्टे की पिसाई का मुद्दा। उसके सामने मुद्दों की फ़ौज खड़ी हो गई। उसने मुद्दों को समेटना चाहा और सोचा कि अधिक नहीं तो इन सबको एक जगह मिलाकर “दूध में मिलावट” के मुद्दे पर एक जबरदस्त कहानी लिखी जा सकती है। और “खरीज की समस्या” के मुद्दे को वह आगे किसी कहानी के प्लाट के लिए बचाकर रख सकता है। तभी उसे अपने आप पर गुस्सा आया कि यह भी कोई विषय है? क्या उसकी सोच का सचमुच ही दिवाला निकल गया है ?

आखिर वह लिखना क्या चाहता है? हिन्दुस्तान भर में कौन नहीं जानता कि दूध में मिलावट होती है? क्या यहाँ के बच्चों को दस-सेर दूध में, पांच सेर पानी मिलाकर मुनाफे की प्रतिशत निकालने के सवाल नहीं सिखाये जाते रहे हैं? नानसैन्स ! सब जानते हैं। यहाँ तक कि उसके दफ्तर के चपरासी से लेकर अफसर तक सभी रोजाना दूध खरीदते हैं। उसके सहयोगी क्लर्क भी रोजाना यही रोना रोते हैं।

और दफ्तर की याद आते ही उसे अपने अफ़सर श्री शिवमोहन की याद आई। भ्रष्टाचार की साक्षात् मूर्ति-श्री शिवमोहन।..अब उसका इरादा बदलने लगा। उसने अपने मन को तसल्ली दी कि सन् 1985 आ चुका है। मिलावट तो अब तक आम बात हो चुकी है। यहाँ तक कि ‘ऐंटी-एडलटरेशन ऐक्ट’ तथा ‘प्रिवेंशन आफ फूड एडलटरेशन ऐक्ट’ जैसे-कानून भी सरकार पास कर चुकी है। भले ही उनका कोई असर न हो। अब इस मुद्दे पर कुछ ताज़ा नहीं लिखा जा सकेगा और ना ही कोई पढ़ने के लिए आकर्षित होगा।

क्यूं ना शिवमोहन पर ही…नहीं, नहीं भ्रष्टाचार पर एक सशक्त रचना लिख दी जाए। पहले उसने भ्रष्टाचार को ‘इन्वर्टेड कोमाज़’ में बन्द करके देखा। फिर ‘अन्डरलाइन’ किया। और अब वह इस बात से आश्वस्त हो गया कि शीर्षक के तौर पर भ्रष्टाचार ही माकूल रहेगा। भ्रष्ट (+) आचार- उसने संधि-विच्छेद किया-बराबर (=) भ्रष्टाचार। बराबर भ्रष्टाचार। यानी लगातार भ्रष्टाचार ?

अचानक उसे लगा कि जैसे वह किसी कपड़े धोने के साबुन का विज्ञापन कर रहा है-बार-बार, लगातार…अवश्य कहीं ना कहीं उसका अचेतन मन किसी विज्ञापन से प्रभावित है। उसे खुद अपने आप पर झुंझलाहट हुई कि आखिर उसे क्या होता जा रहा है? क्यों नहीं वह ‘थीम’ पर गंभीरता से केंद्रित होता है ?…और मन को पक्के इरादे की लगाम लगाकर वह सोचने लगा कि हमारी प्रधानमंत्री का भी यही मूलमंत्र था- पक्का इरादा, कठिन परिश्रम और दूर-दृष्टि। उन्होंने कहा था कि देरी भ्रष्टाचार को जन्म देती है।

फिर उसके दिमाग में कुछ काँध गया। उसे याद आया कि हमारी प्रधानमंत्री ने यह भी तो कहा था कि भ्रष्टाचार अन्तर्राष्ट्रीय प्रक्रिया है- इंटरनेशनल ‘फिनोमिना’ है? तो क्या वह किसी अंतर्राष्ट्रीय मसले पर लिखने की कुव्वत रखता है?-बेशक नहीं। उसने बिना किसी हील-हुज्जत के हथियार डाल दिये और उसे अपने जनरल नालिज के सीमित ज्ञान पर तरस आया। फिर उसे अपनी पत्नी पर गुस्सा आया कि आख़िर क्यों उसने नौकरी लगने से पहले खरीदी गई ‘कम्पीटिशन मास्टर’ की प्रतियाँ अंगीठी में जला डालीं।

यदि आज वे उपलब्ध होतीं तो वह भ्रष्टाचार विषय पर अच्छी जानकारी जुटाने में सफल हो सकता था। पश्चाताप के तनाव को खारिज करने के लिए वह सामने मेज़ पर पड़ा हुआ पहले दिन का अख़बार उठाकर देखने लगा- राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सचिवालय से एक और जासूस गिरफ़्तार।..जासूस ?..भेदिये ?? जयचंद..? ?..जासूसी करते थे ? पहले तो वह सकपकाया। फिर सोचने लगा कि क्यों ना “जासूसी” को विषय बनाकर कुछ लिख दिया जाए।…प्रस्तावना, परिभाषा, परिप्रेक्ष्य, विषय-वस्तु, इतिहास, टैक्निक, आंकड़े आदि आयामों में बांटकर वह गौर करने लगा।

लेकिन यह तो निबन्ध की रूप रेखा हो सकती है; कहानी तो बिल्कुल ही नहीं हो सकती। हां, जासूसी पर रोचक उपन्यास लिखा जा सकता है। लेकिन उपन्यास की भी थोड़ी विधागत जानकारी तो चाहिए ही…उसे याद आया कि उसका साथी, क्लर्क नरेश एक बार ‘जेम्स हेडली चेज़’ का कोई जासूसी उपन्यास पढ़ रहा था…

अब तक रात का एक बजने लगा था और कहानी डूबते-डूबते निबन्ध, उपन्यास और फिर बकवास बनने लगी थी। उसने निश्चय किया कि यूंही वह किसी भी कीमत पर गुड़-गोबर नहीं होने देगा और कहानी के प्लाट पर रोज़ाना कुछ ना कुछ सोच कर लिखता रहेगा। मुमकिन है कि वेतन मिलने की अगली तारीख तक वह इसे पूरी कर ले जाये।

तभी एक परिचित आहट ने उसके पक्के इरादे को झटका दिया। छोटे वाले बच्चे ने नींद में अपनी मम्मी का बिस्तर गीला कर दिया था और पत्नी ने उसे एक चाँटा जड़ दिया था। यह उसी की आवाज थी- “पूरा पांच साल का ढींग हो गया है ओर अब तक खाट में मूतता है…।”

“तो इसमें इस बेचारे का क्या दोष है?” उसने समझाना चाहा, “यह जानबूझकर तो करता नहीं है।”

“तुम बस करो जी- कितनी बार कहा कि किसी अच्छे डाक्टर से दवाई दिलवाओ…पर कोई सुने तब ना?”

“तो क्या चन्द्रप्रभावटी और विषमुष्टादिवटी से आराम नहीं हुआ है?”

“बस, अब जी ना जलाओ जी, दुनिया चाँद पर पहुंच गई और तुम्हारी यही दकियानूसी बातें। भला इन जड़ी-बूटियों से कुछ होता है? क्या ख़बर, इनमें सचमुच जड़ी-बूटियाँ हैं भी या गधे-घोड़े की लीद ही भर रखी है..।”

“मिलावट”? वह एक बार फिर चौंकने लगा, लेकिन यह सोचकर संभल गया कि मिलावट पर तो उसने थोड़ी देर पहले ही सोचकर छोड़ दिया था।

तो फिर वह क्या लिखे ? क्या अंग्रेजी और आयुर्वेदिक चिकित्सा-पद्धतियों के गुण-दोषों पर ही कुछ लिख मारे?

नहीं, यह उसके बस का रोग नहीं। इस पर तो कोई चिकित्सक ही लिख सकता है।

उसकी पत्नी ने सोचा कि नींद तो खराब हो ही गई है, क्यों ना आज कोई काम की बात कर ली जाये। पति महाशय को तनख्वाह तो आज मिली ही है, साथ ही भत्ते-वत्ते के तीन सौ रुपये भी मिले हैं- शायद बात बन ही जाये।

क्यूं जी, आपको याद है ना पिछली गर्मियों में बच्चों को कितनी बेरहमी से मच्छर खा जाया करते थे। सारी-सारी रात हाथ-पैर पीटते रहते थे बेचारे ?… जब भी चैन न पड़ता था? तीन सौ तो भत्ते के मिल ही गए हैं, दो सौ और मिलाकर छत का पंखा ना ले आओ? सर्दियां हैं, कुछ सस्ता भी मिल जाएगा…।” उसकी पत्नी का अन्दाजा ठीक ही साबित हुआ। अगले दिन वह पंखा खरीद लाया। उसकी पत्नी चीनी, दाल, वनस्पति, चाय आदि घर-गृहस्थी का सामान ले आई। पिछले महीने पड़ौसी ओवरसियर की पत्नी से उधार लिए दो सौ रुपए भी सूद-समेत लौटा आई।

उसने महसूस किया कि अब सब झंझट निपट गये हैं। अब वह निश्चित होकर कहानी लिख सकता है। अलबत्ता आज वह कहानी पूरी करके ही सोयेगा। तभी उसे ख्याल आया कि खर्च का एक आइटम और रह गया है-बच्चों की फीस का। उसने रसोई में व्यस्त पत्नी को पुकारा। पत्नी ने बताया कि अबकी बार तो दोनों बच्चों की फीस दो महीने की एक साथ जानी है और उसने सौ रुपए अलग से बचाकर रख दिये हैं। उसके चेहरे पर परम संतोष का भाव छलकने लगा ओर उसने एक लम्बी डकार ली-ठीक उसी अन्दाज में जैसे कोई व्यक्ति मन पसंद भोजन से संतृप्त होकर लिया करता है।

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…बच्चे सो चुके थे। उसकी पत्नी रसोई का काम लगभग समेटने की स्थिति में थी। अगली सुबह के लिए दाल-वगैरह भिगोने लगी थी। वह बीते वर्ष के बारे में सोच रहा था।…1984 के वर्ष में कितने हादसे होते रहे हैं। पंजाब में क़त्ल होते रहे हैं। ‘ब्लूस्टार आप्रेशन’ में अनगिनत लोग मरे हैं। दिल्ली और प्रदेशों में कत्लों-गारद हुए हैं। ‘भोपाल गैस-चैम्बर का कांड’ हुआ है। कितनी हिंसा होती रही है।…ठीक है, वह अपनी कहानी में हिंसा को कोई स्थान नहीं देगा। हिंसा के कारण ही हमारी प्रधानमंत्री की हत्या तक हो चुकी है। वह नये सिरे से कोई ऐसा प्लाट तलाशेगा जिसमें कहीं हिंसा की संभावना अथवा गुंजाईश न हो।

तभी पत्नी ने दिल दहला देने वाली एक सूचना दी…न जाने क्यूं उसे मुगालता था कि ड्रम में अभी कम-से-कम महीने भर का अनाज शेष होना चाहिए। पिछले साल भी उतनी ही गेहूं खरीदी थी जोकि मार्च तक चल गई थी। लेकिन अभी-अभी उसने ढ़क्कन उठाकर देखा तो गेहूं बिल्कुल ख़त्म हो चुकी है। आटा भी तीन-चार दिन से ज्यादा नहीं चल पाएगा…।

उसे पत्नी के गृह कौशल पर गुस्सा आया। वह समझ नहीं पा रहा था कि पिछले साल की बनिस्पत उनकी भूख बढ़ गई है याकि अनाज की भूख मिटाने की ताक़त घट गई है..वह तिलमिला गया।..क्रोध का ज्वार उफनने लगा।..उसकी तर्क-शक्ति जवाब दे चली। उसका गुस्सा अनियंत्रित हो गया।… वह हिंसा से बचना चाहता था लेकिन कामयाब न हो सका। उसकी कहानी को हिंसा निगल गई और वह हैरान था क्योंकि इस हिंसा के कारण पहली हिंसा से बिल्कुल जुदा थे।

(जतन-2, अप्रैल-जून 1995)

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